हरियाणा में आलू बीज उत्पादन में नई क्रांति:एआरसी तकनीक से मोरनी हिल्स में तैयार की 10 लाख पौध, अब 12 लाख की डिमांड

हरियाणा में आलू बीज उत्पादन में नई क्रांति:एआरसी तकनीक से मोरनी हिल्स में तैयार की 10 लाख पौध, अब 12 लाख की डिमांड

पंचकूला के मोरनी हिल्स में किसानों के लिए आलू बीज उत्पादन की नई तकनीक एआरसी यानी एपिल रोटेड कटिंग (आलू की पौध) किसी वरदान से कम नहीं है। इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर एवं पोटैटो टेक्नोलॉजी सेंटर शामगढ़ करनाल, उद्यान विभाग के सहयोग से वियतनाम से आई इस तकनीक से किसानों को सस्ता और उच्च गुणवत्ता का बीज मिल रहा है। इस तकनीक के जरिए एक ही प्लांट से 8 से 12 ट्यूबर (मिनी ट्यूबर) निकलते हैं, जिससे किसान तीन से चार साल तक बीज तैयार कर सकते हैं। यह पूरी प्रक्रिया हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट की देखरेख में की जा रही है। पिछले साल मोरनी हिल्स के किसानों ने 10 लाख पौध बेची थी, जबकि इस बार 12 लाख पौध की डिमांड आ चुकी है। कैसे तैयार होती है जी-जीरो जनरेशन एक्सपर्ट के मुताबिक, सबसे पहले सीपीआरआई शिमला में कल्चर ट्यूब आती है, या फिर खुद से भी तैयार करता है। जिसमें एक पौधा होता है। यहां से कल्चर ट्यूब शामगढ़ में पहुंचती है। शामगढ़ की टिशू कल्चर लैब में इसकी मल्टीप्लाई यानी इनको काट-काटकर एक कांच के जार में लगाया जाता है और इस कांच के जार में एमएस मीडिया होता है। कल्चर ट्यूब से करीब 20-21 पौधे निकाले जा सकते हैं। कांच के जार में जब पौधे बढ़ने लग जाते हैं। ग्रोथ के बाद जार में मौजूद पौधों को दोबारा से मल्टीप्लाई किया जाता है। यह प्रक्रिया करीब एक महीने तक टिशू कल्चर लैब में चलती है। फिर इन पौधों को बढ़वार यानी बढ़ने के लिए ग्रोथ रूम में रखा जाता है। ग्रोथ रूम में एसी होता है, लाइट लगी होती है, रैक में जार रखते हैं और टेंपरेचर मेंटेन किया जाता है। एक महीने बाद इनको निकालकर हार्डनिंग के लिए ग्रीन हाउस में ले जाया जाता है। इसके बाद ग्रीन हाउस में हाउस में इनकी कटिंग करके मल्टीप्लाई करते है और सोइल लैस मीडिया या फिर मिट्टी में भी लगाया जा सकता है। उससे ट्यूबर निकलता है जिसको जीरो जनरेशन बोलते हैं। सीपीआरआई शिमला में टेस्ट ट्यूब, करनाल में लैब में होते हैं पौध तैयार डॉ. कृष्ण सैनी बताते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत सीपीआरआई शिमला में होती है, जहां टेस्ट ट्यूब तैयार की जाती है। इसके बाद करनाल के शामगढ़ स्थित पीटीसी की टिशू कल्चर लैब में एमएस मीडिया के जरिए प्लांट को कांच के जार में तैयार किया जाता है। प्लांट के विकसित होने के बाद मोरनी हिल्स में सेंटर पर इसे एआरसी में बदला जाता है। यहां करीब 15-16 किसान अपने पॉलीहाउस में इस तकनीक का इस्तेमाल कर आलू बीज तैयार कर रहे हैं। नवंबर में किसान देते हैं डिमांड, फरवरी में हार्वेस्टिंग एआरसी ऑन डिमांड तैयार की जाती है, यानी किसान नवंबर में इसके लिए डिमांड देते हैं, और बाद में मोरनी हिल्स सेंटर से पौध ले आते हैं। जनवरी के बाद जब इसकी डिहार्मिंग की जाती है, तो फरवरी में हार्वेस्टिंग शुरू हो जाती है और किसानों को जीरो जनरेशन (G-0) आलू बीज मिल जाता है। खास बात यह है कि इस बीज को किसान अपने खेत में तीन से चार साल तक मल्टीप्लाई कर सकते हैं और खुद का बीज तैयार कर सकते हैं। एआरसी तकनीक से किसानों को हो रहा सीधा फायदा डॉ. कृष्ण सैनी बताते हैं कि एआरसी तकनीक से किसानों को जल्दी और उच्च गुणवत्ता का बीज मिल रहा है। यह बीज उन्हें मात्र 2 रुपए में मिल जाता है। ऐसे में किसान अपनी खुद की एआरसी तैयार करवाकर अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए वरदान बनी यह तकनीक मोरनी हिल्स जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे-छोटे खेत होते हैं, जो 100 से 200 मीटर तक फैले होते हैं। ऐसे इलाकों के लिए यह तकनीक बहुत फायदेमंद साबित हो रही है। एआरसी के जरिए वहां के किसान अब अच्छी आमदनी कर रहे हैं। सिर्फ हरियाणा ही नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में भी इस तकनीक से आलू बीज तैयार किए जा रहे हैं। मोरनी हिल्स के किसानों ने 10 लाख पौध बेची, अब 12 लाख की डिमांड मोरनी हिल्स के किसानों ने पिछले साल 10 लाख पौध बेची थी, जो किसानों से किसानों तक पहुंची थी। इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 12 लाख तक पहुंचने वाला है। डॉ. कृष्ण सैनी बताते हैं कि उनका मुख्य उद्देश्य किसानों को आपस में जोड़ना है, ताकि वे खुद ही एक-दूसरे से पौध खरीद सकें और मुनाफा कमा सकें। एआरसी तकनीक से बढ़ेगी किसानों की आय हरियाणा उद्यान विभाग लगातार इस तकनीक को बढ़ावा दे रहा है ताकि किसानों की आय दोगुनी की जा सके। एआरसी किसी भी वैरायटी के आलू बीज के लिए तैयार की जा सकती है, लेकिन यह पूरी तरह से डिमांड पर निर्भर करता है। किसानों के बढ़ते रुझान को देखते हुए आने वाले समय में यह तकनीक देशभर में आलू उत्पादन के लिए नई क्रांति ला सकती है। पंचकूला के मोरनी हिल्स में किसानों के लिए आलू बीज उत्पादन की नई तकनीक एआरसी यानी एपिल रोटेड कटिंग (आलू की पौध) किसी वरदान से कम नहीं है। इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर एवं पोटैटो टेक्नोलॉजी सेंटर शामगढ़ करनाल, उद्यान विभाग के सहयोग से वियतनाम से आई इस तकनीक से किसानों को सस्ता और उच्च गुणवत्ता का बीज मिल रहा है। इस तकनीक के जरिए एक ही प्लांट से 8 से 12 ट्यूबर (मिनी ट्यूबर) निकलते हैं, जिससे किसान तीन से चार साल तक बीज तैयार कर सकते हैं। यह पूरी प्रक्रिया हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट की देखरेख में की जा रही है। पिछले साल मोरनी हिल्स के किसानों ने 10 लाख पौध बेची थी, जबकि इस बार 12 लाख पौध की डिमांड आ चुकी है। कैसे तैयार होती है जी-जीरो जनरेशन एक्सपर्ट के मुताबिक, सबसे पहले सीपीआरआई शिमला में कल्चर ट्यूब आती है, या फिर खुद से भी तैयार करता है। जिसमें एक पौधा होता है। यहां से कल्चर ट्यूब शामगढ़ में पहुंचती है। शामगढ़ की टिशू कल्चर लैब में इसकी मल्टीप्लाई यानी इनको काट-काटकर एक कांच के जार में लगाया जाता है और इस कांच के जार में एमएस मीडिया होता है। कल्चर ट्यूब से करीब 20-21 पौधे निकाले जा सकते हैं। कांच के जार में जब पौधे बढ़ने लग जाते हैं। ग्रोथ के बाद जार में मौजूद पौधों को दोबारा से मल्टीप्लाई किया जाता है। यह प्रक्रिया करीब एक महीने तक टिशू कल्चर लैब में चलती है। फिर इन पौधों को बढ़वार यानी बढ़ने के लिए ग्रोथ रूम में रखा जाता है। ग्रोथ रूम में एसी होता है, लाइट लगी होती है, रैक में जार रखते हैं और टेंपरेचर मेंटेन किया जाता है। एक महीने बाद इनको निकालकर हार्डनिंग के लिए ग्रीन हाउस में ले जाया जाता है। इसके बाद ग्रीन हाउस में हाउस में इनकी कटिंग करके मल्टीप्लाई करते है और सोइल लैस मीडिया या फिर मिट्टी में भी लगाया जा सकता है। उससे ट्यूबर निकलता है जिसको जीरो जनरेशन बोलते हैं। सीपीआरआई शिमला में टेस्ट ट्यूब, करनाल में लैब में होते हैं पौध तैयार डॉ. कृष्ण सैनी बताते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत सीपीआरआई शिमला में होती है, जहां टेस्ट ट्यूब तैयार की जाती है। इसके बाद करनाल के शामगढ़ स्थित पीटीसी की टिशू कल्चर लैब में एमएस मीडिया के जरिए प्लांट को कांच के जार में तैयार किया जाता है। प्लांट के विकसित होने के बाद मोरनी हिल्स में सेंटर पर इसे एआरसी में बदला जाता है। यहां करीब 15-16 किसान अपने पॉलीहाउस में इस तकनीक का इस्तेमाल कर आलू बीज तैयार कर रहे हैं। नवंबर में किसान देते हैं डिमांड, फरवरी में हार्वेस्टिंग एआरसी ऑन डिमांड तैयार की जाती है, यानी किसान नवंबर में इसके लिए डिमांड देते हैं, और बाद में मोरनी हिल्स सेंटर से पौध ले आते हैं। जनवरी के बाद जब इसकी डिहार्मिंग की जाती है, तो फरवरी में हार्वेस्टिंग शुरू हो जाती है और किसानों को जीरो जनरेशन (G-0) आलू बीज मिल जाता है। खास बात यह है कि इस बीज को किसान अपने खेत में तीन से चार साल तक मल्टीप्लाई कर सकते हैं और खुद का बीज तैयार कर सकते हैं। एआरसी तकनीक से किसानों को हो रहा सीधा फायदा डॉ. कृष्ण सैनी बताते हैं कि एआरसी तकनीक से किसानों को जल्दी और उच्च गुणवत्ता का बीज मिल रहा है। यह बीज उन्हें मात्र 2 रुपए में मिल जाता है। ऐसे में किसान अपनी खुद की एआरसी तैयार करवाकर अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए वरदान बनी यह तकनीक मोरनी हिल्स जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे-छोटे खेत होते हैं, जो 100 से 200 मीटर तक फैले होते हैं। ऐसे इलाकों के लिए यह तकनीक बहुत फायदेमंद साबित हो रही है। एआरसी के जरिए वहां के किसान अब अच्छी आमदनी कर रहे हैं। सिर्फ हरियाणा ही नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में भी इस तकनीक से आलू बीज तैयार किए जा रहे हैं। मोरनी हिल्स के किसानों ने 10 लाख पौध बेची, अब 12 लाख की डिमांड मोरनी हिल्स के किसानों ने पिछले साल 10 लाख पौध बेची थी, जो किसानों से किसानों तक पहुंची थी। इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 12 लाख तक पहुंचने वाला है। डॉ. कृष्ण सैनी बताते हैं कि उनका मुख्य उद्देश्य किसानों को आपस में जोड़ना है, ताकि वे खुद ही एक-दूसरे से पौध खरीद सकें और मुनाफा कमा सकें। एआरसी तकनीक से बढ़ेगी किसानों की आय हरियाणा उद्यान विभाग लगातार इस तकनीक को बढ़ावा दे रहा है ताकि किसानों की आय दोगुनी की जा सके। एआरसी किसी भी वैरायटी के आलू बीज के लिए तैयार की जा सकती है, लेकिन यह पूरी तरह से डिमांड पर निर्भर करता है। किसानों के बढ़ते रुझान को देखते हुए आने वाले समय में यह तकनीक देशभर में आलू उत्पादन के लिए नई क्रांति ला सकती है।   हरियाणा | दैनिक भास्कर