जिन कुंज गलियों में श्रीकृष्ण ने लीलाएं कीं, उन्हीं गलियों में प्रेमानंद महाराज भोजन के लिए द्वार-द्वार भटकते थे। भोजन मिल गया तो ठीक, वरना राधारानी की इच्छा मानकर भूखे ही सो जाते थे। ब्रज के भीखचंद वह पहले शख्स थे, जिन्होंने प्रेमानंद महाराज को मधुकुरी (राधे-राधे बोलकर भोजन लेना) करने के लिए कहा। उन्हीं के घर से प्रेमानंद महाराज ने रोटी मांगने का सिलसिला शुरू किया, जोकि 18 साल तक चला। दैनिक भास्कर ऐप की टीम भीखचंद के घर पहुंची। प्रेमानंद महाराज कैसे भीखचंद से मिले? कैसे उन्हें मधुकुरी के बारे में पता चला? आज भीखचंद के परिवार में कौन-कौन है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… वृंदावन के रासाचार्यों को देखकर प्रभावित हुए थे प्रेमानंद
भीखचंद शर्मा के परिवार से मिलने के लिए हम मनीपाणा मोहल्ले पहुंचे। यह बांके बिहारी मंदिर से सिर्फ 100 मीटर की दूरी पर है। संकरी गली में पीले रंग का घर दिखा। इसके मुख्यद्वार पर दीवार के दोनों तरफ गोबर से हाथों की थाप के चिह्न दिखे। घर के अंदर आने पर परिवार में हमारी मुलाकात भीखचंद शर्मा के बेटे अनंत शर्मा से हुई। वह रेलवे से रिटायर्ड हैं। इसके बाद प्रेमानंद महाराज से जुड़े सवालों का दौर शुरू हुआ। अनंत शर्मा ने बताया- प्रेमानंद महाराज कानपुर में अपना घर-परिवार छोड़कर पहले काशी पहुंचे। वहां एक दिन उन्होंने वृंदावन से आए रासाचार्यों को देखा। रासाचार्य मृदंग और हारमोनियम के साथ रास के पद्य गा रहे थे। इन्हें सुनकर, भक्ति में नाचते रासाचार्यों को देखकर प्रेमानंद इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने गायन खत्म होने के बाद उनसे कहा- मुझको भी अपने साथ वृंदावन ले चलिए। रासाचार्य स्वामी श्रीराम ने उनसे कहा- वृंदावन वहीं लोग आ पाते हैं, जिनको खुद राधा रानी और यमुनाजी बुलाती हैं। गोविंद शरण के शिष्य बनकर 3 साल भ्रमण करते रहे प्रेमानंद
इसके बाद प्रेमानंद महाराज वाराणसी को छोड़कर वृंदावन आ गए। यहां कालिदाह इलाके में यमुना किनारे रहने लगे। एक दिन उनकी मुलाकात गोविंद शरण महाराज से हुई। वह उनकी सादगी और विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उनके शिष्य बन गए। इसके बाद ही उन्हें श्रीगोविंद शरणजी प्रेमानंद महाराज का नाम मिला। इसके बाद अगले 3 साल तक प्रेमानंद महाराज ब्रज के अलग-अलग हिस्सों में भ्रमण करते रहे। अनंत शर्मा ने कहा- ये कोई 1999 की बात रही होगी। एक दिन प्रेमानंदजी महाराज की बांके बिहारी मंदिर में ब्रजवासी हमारे पिता भीखचंद शर्मा से मुलाकात हुई। दोनों में बातचीत शुरू हुई। प्रेमानंदजी राधाजी की कोई कथा सुना रहे थे। तब हमारे पिता भीखचंद ने कहा- उन्हीं के जीवन सफल हुए, जिन्होंने राधारानी को सब कुछ मान लिया। प्रेमानंद महाराज बोले- ये भी बताइए कि उदर (पेट) कैसे भरेगा? भीखचंद ने कहा- यहां जितने भी संत आए, उन्होंने ब्रजवासियों के यहां मथुकुरी की। संत प्रेमानंद महाराज ने शुरू की मधुकुरी
ब्रजवासी की बात सुनकर संत प्रेमानंद महाराज प्रभावित हुए। उन्होंने भीखचंद शर्मा से आग्रह किया कि क्या वह उनके घर से भोजन मांग सकते हैं। उन्होंने जवाब दिया- यह मेरा सौभाग्य होगा कि आप जैसे संत की सेवा का अवसर मिले। बस यहीं से संत प्रेमानंद महाराज ने मधुकुरी करना शुरू कर दिया। इसके बाद 18 साल तक हर रोज प्रेमानंदजी महाराज इस घर में भोजन लेने आते रहे। यह सिलसिला कभी नहीं टूटा। जब तबीयत बिगड़ी, तब दूध-रोटी भोजन में लेने लगे
अनंत शर्मा ने बताया- संत प्रेमानंद महाराज शाम के समय आते और दरवाजा पर आकर कहते- राधे…राधे। इसके बाद जो भी भोजन मिलता, उसे वह लेकर प्रेम पूर्वक चले जाते थे। 3 साल तक ऐसा चलता रहा। फिर अचानक एक दिन प्रेमानंद महाराज की तबीयत खराब हो गई। उन्होंने डॉक्टर को दिखाया, तब पता चला कि उनकी किडनी खराब हो रही हैं। बाद में वृंदावन के एक हॉस्पिटल में दिखाने के बाद सामने आया कि बचपन से ही उनकी किडनी खराब थीं। इस बीमारी की वजह से उनके दांतों में दिक्कत होने लगी। तब संत प्रेमानंद महाराज को रोटी को दूध में भिगोकर भोजन में दिया जाने लगा। जिसे वह प्रेम से लेते और राधे-राधे कह कर चले जाते। जन्मदिन पर लौकी की सब्जी और रोटी का भोग
अनंत शर्मा ने बताया- हम लोग बाबा प्रेमानंदजी महाराज का जन्मदिन 29 मार्च को धूमधाम से मनाएंगे। मैं हमेशा संत प्रेमानंद महाराज की तस्वीर अपनी जेब में रखता हूं। जन्मदिन पर प्रभु श्रीकृष्ण को रबड़ी, खीर और अन्य पकवान का भोग लगाएंगे। मगर संत प्रेमानंदजी महाराज को लौकी की सब्जी और रोटी अर्पित करेंगे, क्योंकि उनका स्वास्थ्य सही नहीं है। भीड़ के कारण नहीं होती मुलाकात
हमने जानना चाहा कि जिस प्रेमानंदजी महाराज 18 साल तक उनके घर से भोजन लेते रहे, उनके आज मुलाकात हो पाती है? अनंत शर्मा बताते हैं- महाराजजी जब भी कहीं मिल जाते हैं, उनका अपनत्व वही रहता है, जो घर आने के समय होता था। संत प्रेमानंदजी कहते हैं- मेरी बहुत इच्छा होती है कि आपके घर आएं, मगर भीड़ इतनी आ जाएगी कि संभालना मुश्किल हो जाएगा। यही मजबूरी है कि संत प्रेमानंद महाराज अब हमारे घर नहीं आ पाते हैं। अनुयायियों के बढ़ने पर अनंत शर्मा कहते हैं- महाराजजी प्रवचन तो शुरू से करते आ रहे हैं। वह जीवन को बहुत सरल शब्दों में समझाते हैं, क्योंकि वह खुद सरल व्यक्तित्व रखते हैं। कोई आडंबर नहीं है, कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं हैं। उनकी सरल बातें धीरे-धीरे लोगों को प्रभावित करती चली गईं। अब उनके करोड़ों अनुयायी हैं। ……………………. ये भी पढ़ें : प्रेमानंद महाराज 40 साल से अपने गांव नहीं लौटे:जिस स्कूल में पढ़े, वो जर्जर; दोस्त बोले- संन्यासियों की सेवा के लिए स्कूल छोड़ देते थे गांव के बीच में शिव मंदिर, वहां पूजा करती महिलाएं। खेतों में गेहूं की कटाई चल रही है। लोग चबूतरे पर बैठे देश-दुनिया की बात कर रहे हैं। यह सीन है कानपुर के अखरी गांव का। यहां प्रेमानंद का जिक्र होते ही लोग तपाक से कहते हैं- कौन अनिरुद्ध पांडेय? वो तो यही के रहने वाले हैं। यहीं पास में उनका घर है। ये सामने के शिव मंदिर में ही तो पूजा किया करते थे। पढ़िए पूरी खबर… जिन कुंज गलियों में श्रीकृष्ण ने लीलाएं कीं, उन्हीं गलियों में प्रेमानंद महाराज भोजन के लिए द्वार-द्वार भटकते थे। भोजन मिल गया तो ठीक, वरना राधारानी की इच्छा मानकर भूखे ही सो जाते थे। ब्रज के भीखचंद वह पहले शख्स थे, जिन्होंने प्रेमानंद महाराज को मधुकुरी (राधे-राधे बोलकर भोजन लेना) करने के लिए कहा। उन्हीं के घर से प्रेमानंद महाराज ने रोटी मांगने का सिलसिला शुरू किया, जोकि 18 साल तक चला। दैनिक भास्कर ऐप की टीम भीखचंद के घर पहुंची। प्रेमानंद महाराज कैसे भीखचंद से मिले? कैसे उन्हें मधुकुरी के बारे में पता चला? आज भीखचंद के परिवार में कौन-कौन है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… वृंदावन के रासाचार्यों को देखकर प्रभावित हुए थे प्रेमानंद
भीखचंद शर्मा के परिवार से मिलने के लिए हम मनीपाणा मोहल्ले पहुंचे। यह बांके बिहारी मंदिर से सिर्फ 100 मीटर की दूरी पर है। संकरी गली में पीले रंग का घर दिखा। इसके मुख्यद्वार पर दीवार के दोनों तरफ गोबर से हाथों की थाप के चिह्न दिखे। घर के अंदर आने पर परिवार में हमारी मुलाकात भीखचंद शर्मा के बेटे अनंत शर्मा से हुई। वह रेलवे से रिटायर्ड हैं। इसके बाद प्रेमानंद महाराज से जुड़े सवालों का दौर शुरू हुआ। अनंत शर्मा ने बताया- प्रेमानंद महाराज कानपुर में अपना घर-परिवार छोड़कर पहले काशी पहुंचे। वहां एक दिन उन्होंने वृंदावन से आए रासाचार्यों को देखा। रासाचार्य मृदंग और हारमोनियम के साथ रास के पद्य गा रहे थे। इन्हें सुनकर, भक्ति में नाचते रासाचार्यों को देखकर प्रेमानंद इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने गायन खत्म होने के बाद उनसे कहा- मुझको भी अपने साथ वृंदावन ले चलिए। रासाचार्य स्वामी श्रीराम ने उनसे कहा- वृंदावन वहीं लोग आ पाते हैं, जिनको खुद राधा रानी और यमुनाजी बुलाती हैं। गोविंद शरण के शिष्य बनकर 3 साल भ्रमण करते रहे प्रेमानंद
इसके बाद प्रेमानंद महाराज वाराणसी को छोड़कर वृंदावन आ गए। यहां कालिदाह इलाके में यमुना किनारे रहने लगे। एक दिन उनकी मुलाकात गोविंद शरण महाराज से हुई। वह उनकी सादगी और विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उनके शिष्य बन गए। इसके बाद ही उन्हें श्रीगोविंद शरणजी प्रेमानंद महाराज का नाम मिला। इसके बाद अगले 3 साल तक प्रेमानंद महाराज ब्रज के अलग-अलग हिस्सों में भ्रमण करते रहे। अनंत शर्मा ने कहा- ये कोई 1999 की बात रही होगी। एक दिन प्रेमानंदजी महाराज की बांके बिहारी मंदिर में ब्रजवासी हमारे पिता भीखचंद शर्मा से मुलाकात हुई। दोनों में बातचीत शुरू हुई। प्रेमानंदजी राधाजी की कोई कथा सुना रहे थे। तब हमारे पिता भीखचंद ने कहा- उन्हीं के जीवन सफल हुए, जिन्होंने राधारानी को सब कुछ मान लिया। प्रेमानंद महाराज बोले- ये भी बताइए कि उदर (पेट) कैसे भरेगा? भीखचंद ने कहा- यहां जितने भी संत आए, उन्होंने ब्रजवासियों के यहां मथुकुरी की। संत प्रेमानंद महाराज ने शुरू की मधुकुरी
ब्रजवासी की बात सुनकर संत प्रेमानंद महाराज प्रभावित हुए। उन्होंने भीखचंद शर्मा से आग्रह किया कि क्या वह उनके घर से भोजन मांग सकते हैं। उन्होंने जवाब दिया- यह मेरा सौभाग्य होगा कि आप जैसे संत की सेवा का अवसर मिले। बस यहीं से संत प्रेमानंद महाराज ने मधुकुरी करना शुरू कर दिया। इसके बाद 18 साल तक हर रोज प्रेमानंदजी महाराज इस घर में भोजन लेने आते रहे। यह सिलसिला कभी नहीं टूटा। जब तबीयत बिगड़ी, तब दूध-रोटी भोजन में लेने लगे
अनंत शर्मा ने बताया- संत प्रेमानंद महाराज शाम के समय आते और दरवाजा पर आकर कहते- राधे…राधे। इसके बाद जो भी भोजन मिलता, उसे वह लेकर प्रेम पूर्वक चले जाते थे। 3 साल तक ऐसा चलता रहा। फिर अचानक एक दिन प्रेमानंद महाराज की तबीयत खराब हो गई। उन्होंने डॉक्टर को दिखाया, तब पता चला कि उनकी किडनी खराब हो रही हैं। बाद में वृंदावन के एक हॉस्पिटल में दिखाने के बाद सामने आया कि बचपन से ही उनकी किडनी खराब थीं। इस बीमारी की वजह से उनके दांतों में दिक्कत होने लगी। तब संत प्रेमानंद महाराज को रोटी को दूध में भिगोकर भोजन में दिया जाने लगा। जिसे वह प्रेम से लेते और राधे-राधे कह कर चले जाते। जन्मदिन पर लौकी की सब्जी और रोटी का भोग
अनंत शर्मा ने बताया- हम लोग बाबा प्रेमानंदजी महाराज का जन्मदिन 29 मार्च को धूमधाम से मनाएंगे। मैं हमेशा संत प्रेमानंद महाराज की तस्वीर अपनी जेब में रखता हूं। जन्मदिन पर प्रभु श्रीकृष्ण को रबड़ी, खीर और अन्य पकवान का भोग लगाएंगे। मगर संत प्रेमानंदजी महाराज को लौकी की सब्जी और रोटी अर्पित करेंगे, क्योंकि उनका स्वास्थ्य सही नहीं है। भीड़ के कारण नहीं होती मुलाकात
हमने जानना चाहा कि जिस प्रेमानंदजी महाराज 18 साल तक उनके घर से भोजन लेते रहे, उनके आज मुलाकात हो पाती है? अनंत शर्मा बताते हैं- महाराजजी जब भी कहीं मिल जाते हैं, उनका अपनत्व वही रहता है, जो घर आने के समय होता था। संत प्रेमानंदजी कहते हैं- मेरी बहुत इच्छा होती है कि आपके घर आएं, मगर भीड़ इतनी आ जाएगी कि संभालना मुश्किल हो जाएगा। यही मजबूरी है कि संत प्रेमानंद महाराज अब हमारे घर नहीं आ पाते हैं। अनुयायियों के बढ़ने पर अनंत शर्मा कहते हैं- महाराजजी प्रवचन तो शुरू से करते आ रहे हैं। वह जीवन को बहुत सरल शब्दों में समझाते हैं, क्योंकि वह खुद सरल व्यक्तित्व रखते हैं। कोई आडंबर नहीं है, कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं हैं। उनकी सरल बातें धीरे-धीरे लोगों को प्रभावित करती चली गईं। अब उनके करोड़ों अनुयायी हैं। ……………………. ये भी पढ़ें : प्रेमानंद महाराज 40 साल से अपने गांव नहीं लौटे:जिस स्कूल में पढ़े, वो जर्जर; दोस्त बोले- संन्यासियों की सेवा के लिए स्कूल छोड़ देते थे गांव के बीच में शिव मंदिर, वहां पूजा करती महिलाएं। खेतों में गेहूं की कटाई चल रही है। लोग चबूतरे पर बैठे देश-दुनिया की बात कर रहे हैं। यह सीन है कानपुर के अखरी गांव का। यहां प्रेमानंद का जिक्र होते ही लोग तपाक से कहते हैं- कौन अनिरुद्ध पांडेय? वो तो यही के रहने वाले हैं। यहीं पास में उनका घर है। ये सामने के शिव मंदिर में ही तो पूजा किया करते थे। पढ़िए पूरी खबर… उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर
प्रेमानंद महाराज ने भीखचंद के घर 18 साल खाना खाया:तबीयत बिगड़ी तो दूध में रोटी भिगोकर खाने लगे; बर्थडे पर लौकी की सब्जी बनेगी
