लखनऊ के निर्वाण आश्रय केंद्र में दिव्यांग और बेसहारा बच्चों की मौतों ने व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभी तक पांच बच्चों की मौत हो चुकी है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि इन मासूमों की जान जाने के पीछे की असली वजह क्या है। स्वास्थ्य विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक माइक्रो पोल जल रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है। यह रिपोर्ट 31 मार्च को आएगी। इसी रिपोर्ट से साफ होगा कि बच्चों ने दूषित पानी पिया था, बिना आरओ का पानी उनके लिए जानलेवा बना या फिर आश्रय केंद्र के सेफ्टी टैंक का गंदा पानी उनकी सेहत बिगड़ने की वजह था। फूड प्वाइजनिंग या गंभीर लापरवाही? जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति
आश्रय केंद्र में 21 मार्च से 26 मार्च के बीच पांच बच्चों की मौत हो चुकी है। वहीं, कई अन्य बच्चों की हालत बिगड़ने की भी खबर है। प्रशासनिक अमले ने एसडीएम सरोजनी नगर के नेतृत्व में जांच कमेटी गठित की है, लेकिन चार दिन बीतने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि मासूमों की मौत का असली कारण क्या था? आश्रय केंद्र में हर साल लाखों का खर्च, मासूमों को नहीं मिला इलाज
निर्वाण आश्रय केंद्र में एक बच्चे पर सालभर में 1.78 लाख खर्च किए जाते हैं। फिर भी उन्हें सही पोषण और चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाई। आश्रय केंद्र में कुल 146 बच्चे हैं। इनके लिए स्वास्थ्य विभाग से लेकर सामाजिक कल्याण विभाग तक हर साल भारी अनुदान जारी करता है। बावजूद इसके, जब बच्चों की तबीयत बिगड़ी तो उन्हें समय पर इलाज नहीं मिला। सवाल यह है कि आखिर ये पैसा कहां जा रहा। प्रशासन की मॉनिटरिंग क्यों नाकाम है? पहले दो, फिर चार और अब पांच मौतें छुपाई
पहले दो बच्चों की मौत की खबर सामने आई। फिर चार और अब पांचवीं मौत की पुष्टि हुई है। आरोप लग रहे हैं कि आश्रय केंद्र के जिम्मेदारों ने बच्चों की मौत को छिपाने की कोशिश की और समय पर सही इलाज नहीं कराया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने पांचवीं मौत पर चुप्पी साधे रखी। उच्चाधिकारियों के साथ साथ सीएम को भी सिर्फ चार मौतों की जानकारी दी। पूरे साल नहीं हुआ हेल्थ चेकअप
पीपीपी मॉडल पर संचालित निर्वाण आश्रय केंद्र में पूरे साल किसी भी बच्चे का स्वास्थ्य परीक्षण नहीं हुआ। न तो उन्हें किसी गंभीर बीमारी से बचाने के लिए वैक्सीन दी गई। न ही उनकी सेहत पर ध्यान दिया गया। अब, जब मौतें हो चुकी हैं तब प्रशासन ने डॉक्टरों की टीम गठित की। निर्देश दिए गए कि हर बच्चे का डाइट चार्ट और मेडिकल रिकॉर्ड तैयार किया जाए। यह खबर भी पढ़ें.. 42 की उम्र में 12 बच्चे…बोली, सब अल्लाह की देन:हापुड़ में एक ही कमरे में रहते हैं 11 लोग, सोने के लिए बेड तक नहीं मेरी उम्र 42 साल है और मैंने 28 मार्च को मेरठ में अपने 12वें बच्चे को जन्म दिया है। मेरी बेटी और मैं दोनों ही स्वस्थ हैं। इसे पहले मेरे सारे 11 बच्चे घर पर पैदा हुए थे। इनमें से 2 जुड़वा बच्चों की मौत हो गई थी। 1 बच्चा मैंने अपने जेठ को दे दिया है। अभी मेरे पास 9 बच्चे हैं। आगे और बच्चे होने हैं कि नहीं ये समय बताएगा। सब अल्लाह की देन है। पूरी खबर पढ़ें… लखनऊ के निर्वाण आश्रय केंद्र में दिव्यांग और बेसहारा बच्चों की मौतों ने व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभी तक पांच बच्चों की मौत हो चुकी है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि इन मासूमों की जान जाने के पीछे की असली वजह क्या है। स्वास्थ्य विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक माइक्रो पोल जल रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है। यह रिपोर्ट 31 मार्च को आएगी। इसी रिपोर्ट से साफ होगा कि बच्चों ने दूषित पानी पिया था, बिना आरओ का पानी उनके लिए जानलेवा बना या फिर आश्रय केंद्र के सेफ्टी टैंक का गंदा पानी उनकी सेहत बिगड़ने की वजह था। फूड प्वाइजनिंग या गंभीर लापरवाही? जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति
आश्रय केंद्र में 21 मार्च से 26 मार्च के बीच पांच बच्चों की मौत हो चुकी है। वहीं, कई अन्य बच्चों की हालत बिगड़ने की भी खबर है। प्रशासनिक अमले ने एसडीएम सरोजनी नगर के नेतृत्व में जांच कमेटी गठित की है, लेकिन चार दिन बीतने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि मासूमों की मौत का असली कारण क्या था? आश्रय केंद्र में हर साल लाखों का खर्च, मासूमों को नहीं मिला इलाज
निर्वाण आश्रय केंद्र में एक बच्चे पर सालभर में 1.78 लाख खर्च किए जाते हैं। फिर भी उन्हें सही पोषण और चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाई। आश्रय केंद्र में कुल 146 बच्चे हैं। इनके लिए स्वास्थ्य विभाग से लेकर सामाजिक कल्याण विभाग तक हर साल भारी अनुदान जारी करता है। बावजूद इसके, जब बच्चों की तबीयत बिगड़ी तो उन्हें समय पर इलाज नहीं मिला। सवाल यह है कि आखिर ये पैसा कहां जा रहा। प्रशासन की मॉनिटरिंग क्यों नाकाम है? पहले दो, फिर चार और अब पांच मौतें छुपाई
पहले दो बच्चों की मौत की खबर सामने आई। फिर चार और अब पांचवीं मौत की पुष्टि हुई है। आरोप लग रहे हैं कि आश्रय केंद्र के जिम्मेदारों ने बच्चों की मौत को छिपाने की कोशिश की और समय पर सही इलाज नहीं कराया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने पांचवीं मौत पर चुप्पी साधे रखी। उच्चाधिकारियों के साथ साथ सीएम को भी सिर्फ चार मौतों की जानकारी दी। पूरे साल नहीं हुआ हेल्थ चेकअप
पीपीपी मॉडल पर संचालित निर्वाण आश्रय केंद्र में पूरे साल किसी भी बच्चे का स्वास्थ्य परीक्षण नहीं हुआ। न तो उन्हें किसी गंभीर बीमारी से बचाने के लिए वैक्सीन दी गई। न ही उनकी सेहत पर ध्यान दिया गया। अब, जब मौतें हो चुकी हैं तब प्रशासन ने डॉक्टरों की टीम गठित की। निर्देश दिए गए कि हर बच्चे का डाइट चार्ट और मेडिकल रिकॉर्ड तैयार किया जाए। यह खबर भी पढ़ें.. 42 की उम्र में 12 बच्चे…बोली, सब अल्लाह की देन:हापुड़ में एक ही कमरे में रहते हैं 11 लोग, सोने के लिए बेड तक नहीं मेरी उम्र 42 साल है और मैंने 28 मार्च को मेरठ में अपने 12वें बच्चे को जन्म दिया है। मेरी बेटी और मैं दोनों ही स्वस्थ हैं। इसे पहले मेरे सारे 11 बच्चे घर पर पैदा हुए थे। इनमें से 2 जुड़वा बच्चों की मौत हो गई थी। 1 बच्चा मैंने अपने जेठ को दे दिया है। अभी मेरे पास 9 बच्चे हैं। आगे और बच्चे होने हैं कि नहीं ये समय बताएगा। सब अल्लाह की देन है। पूरी खबर पढ़ें… उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर
आश्रय केंद्र में एक बच्चे का सालाना खर्च 1.78 लाख:जिम्मेदारों ने CM से छिपाया मौत; जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति, जल रिपोर्ट से खुलेगा राज
