नाथ पंथ के बारे में दुनिया को संपूर्ण जानकारी देने के लिए दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर के गुरु गोरखनाथ शोधपीठ विश्वकोश (इनसाइक्लोपीडिया) तैयार कर रहा है। इसमें नाथ पंथ से जुड़ी सभी जानकारियां होंगी। योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर देश भर के 55 विषय विशेषज्ञों की मदद से यह तैयार किया जाएगा। इसके लिए एक कमेटी बनाई गई थी, जिसने काम शुरू कर दिया है। क्या है नाथ संप्रदाय, कैसे और क्यों इसकी शुरुआत हुई, क्या हैं इसके नियम-कानून, भास्कर एक्सप्लेनर में जानिए- सवाल 1- नाथ पंथ या संप्रदाय क्या है? जवाब- नाथ संप्रदाय के पवित्र ग्रंथ गोरखबानी के मुताबिक, नाथ पंथ की शुरुआत आदिनाथ भगवान शिव से हुई थी। इसके अनुसार भगवान शिव ने मत्स्येन्द्रनाथ (मच्छेंद्रनाथ) को ज्ञान दिया और फिर इनके शिष्य हुए गोरखनाथ तक इस पंथ की परंपरा पहुंची। दरअसल, गोरखनाथ भारत में 11वीं से 12वीं सदी के बीच एक सिद्ध संत हुए। गोरखनाथ की वजह से ही नाथ संप्रदाय लोकप्रिय हुआ। उन्हें इस पंथ को आकार देने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने एक बारह पंथी मार्ग बताया, जो नाथ संप्रदाय कहलाया। गोरखनाथ के बाद 13वीं सदी में योगियों का समूह गोरखनाथ के उपदेशों को लेकर एक पंथ का गठन करने लगा। इस संप्रदाय में आस्था रखने वाले लोग अपने नाम के पीछे नाथ लगाते हैं। गोरखनाथ धाम मठ इस संप्रदाय की अध्यक्ष पीठ है, लिहाजा इसका प्रमुख देशभर में नाथ संप्रदाय का अध्यक्ष होता है, जो इस समय योगी आदित्यनाथ हैं। इसी तरह हरियाणा के रोहतक में मस्तनाथ पीठ को उपाध्यक्ष पीठ का दर्जा हासिल है। सवाल 2- गोरखनाथ कौन थे? जवाब- गोरखबानी के मुताबिक, गोरखनाथ को नाथ संप्रदाय को संगठित करने का श्रेय दिया जाता है। वह मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य थे। लंदन के द स्कूल ऑफ ओरियंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज के इंडोलॉजी और योग अध्ययन के प्रोफेसर जेम्स मालिंसन के मुताबिक, आदिनाथ के बाद मत्स्येन्द्रनाथ और फिर गोरक्षनाथ यानी गोरखनाथ उनके शिष्य हुए। गोरखनाथ ने ही नाथ संप्रदाय की स्थापना की। मत्स्येन्द्रनाथ (मच्छेंद्रनाथ) और गोरखनाथ का समय 9वीं से 12वीं सदी के बीच रहा। इसके बाद 17वीं सदी से नाथ संप्रदाय के गुरुओं का क्रम और अधिक संगठित रूप मिलना शुरू होता है। इन दो पंथ योगियों के अलावा जेम्स मालिंसन नौ नाथों का जिक्र करते हैं। 13वीं सदी के तिब्बती स्त्रोतों में नौ नाथों का नाम बताया गया है। 16वीं सदी तक आते-आते नाथ संप्रदाय खुद को हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पंथों से खुद को अलग बताने लगा। वह अपने आप को सिर्फ योगी कहने लगे। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रोफेसर हरि प्रसाद अधिकारी के मुताबिक, गोरखबानी से ही भारत में योग तेजी से चलन में आया। सवाल 3- नाथ संप्रदाय के लोग किन नियमों का पालन करते हैं? जवाब- नाथ संप्रदाय पूजा विधि और नियम में अलग स्थान रखता है। इस पंथ के योगी या तो जीवित रहने पर ही समाधि ले लेते हैं या शरीर छोड़ने पर उन्हें समाधि दी जाती है। ये जलाए नहीं जाते। माना जाता है कि उनका शरीर योग से ही शुद्ध हो जाता है, उसे जलाने की जरूरत नहीं। इस पंथ में मांसाहार और दूसरे तामसी गुण वाले भोजन का निषेध है। जब योगी एक-दूसरे से मिलते हैं तो नमस्कार की जगह आदेश बोलते हैं। यहां आदेश का मतलब होता है आ से आत्मा, द से देवता और श से संत। यानी आप में मौजूद संत को प्रणाम। सवाल 4- नाथ योगी कैसे बनते हैं? जवाब- नाथ पंथ में दीक्षित करने के लिए योगियों की दीक्षा से लेकर पूजा-पाठ और अंतिम संस्कार गोपनीय होता है। किस तरह के योगी दीक्षा ले सकते हैं, इसे लेकर भी नियम है। पंथ में सिर्फ पांच तरह के योगी दीक्षा ले सकते हैं। दीक्षित होने की प्रक्रिया- नाथ बनने के लिए कान छेदन सबसे अहम प्रक्रिया है। कान फाड़ने का मतलब कष्ट सहन की शक्ति, ये दृढ़ता और वैराग्य का बल प्रकट करता है। दीक्षा लेने के बाद योगी लोग अपने परिवार से अलग हो जाते हैं। दीक्षा के उपरांत उन्हें नया नाम दिया जाता है। यह एक ऐसा पंथ है, जिसमें जीते जी पृथ्वी पर दूसरा जन्म होता है। यानी कि पहले वाली जिंदगी, पहले वाली दुनिया, पहले वाले लोग सब त्यागने होते हैं। एक नया जन्म होता है, नए नाम और पहचान के साथ। सवाल 5- नाथ साधु क्या करते हैं? जवाब- नाथ संप्रदाय के योगी दुनिया भर में भ्रमण करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। शर्त इतनी होती है कि जीवन के अंतिम चरण में वो किसी एक स्थान पर रुकें और अखंड धूनी रमाएं। अगर ये ना करना चाहें तो हिमालय में जा सकते हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर क्रिस्टीन मार्रेवा नाथ पंथ को लेकर लिखे एक आर्टिकल में बताती हैं, नाथ योगी मुगल काल से राजनीति में भी दखल देते आए हैं। मुगल बादशाहों पर उनके प्रभाव का जिक्र मिलता है। मुगल बादशाह और हिंदू राजाओं, दोनों ने ही नाथ योगियों को आश्रय दिया। इस समय इन्हें आशीर्वाद के बदले बड़ी मात्रा में जमीनें और दूसरी सुविधाएं दी गईं। मुगलकाल में जाखबर के योगियों और मुगल बादशाह के बीच संबंधों के लिखित प्रमाण मिलते हैं। तब अकबर और जहांगीर ने आशीर्वाद के बदले जाखबर के योगियों को जमीनें और राजस्व अनुदान दिया था। क्रिस्टीन मार्रेवा कहती हैं, मध्यकाल के बाद राजनीति में पंथ योगियों के दखल की शुरुआत गोरखधाम के महंत और योगी आदित्यनाथ के गुरु दिग्विजयनाथ के समय से होती है। इनके समय से ही पंथ संप्रदाय ने खुद हिंदू पहचान के साथ भी जोड़ा। ———————— ये खबर भी पढ़ें… योगी बोले- भूमाफिया को विदा किया:प्रयागराज में 5 साल के बच्चे ने शिव तांडव सुनाया, श्रीराम-निषादराज की प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गुरुवार को प्रयागराज पहुंचे। उन्होंने कहा कि हमने यूपी से माफिया को विदा कर दिया। प्रयागराज अब इलाहाबाद नहीं पूरी तरह से प्रयागराज हो गया है। योगी ने वक्फ बिल के लिए पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का आभार जताया। पढ़ें पूरी खबर नाथ पंथ के बारे में दुनिया को संपूर्ण जानकारी देने के लिए दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर के गुरु गोरखनाथ शोधपीठ विश्वकोश (इनसाइक्लोपीडिया) तैयार कर रहा है। इसमें नाथ पंथ से जुड़ी सभी जानकारियां होंगी। योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर देश भर के 55 विषय विशेषज्ञों की मदद से यह तैयार किया जाएगा। इसके लिए एक कमेटी बनाई गई थी, जिसने काम शुरू कर दिया है। क्या है नाथ संप्रदाय, कैसे और क्यों इसकी शुरुआत हुई, क्या हैं इसके नियम-कानून, भास्कर एक्सप्लेनर में जानिए- सवाल 1- नाथ पंथ या संप्रदाय क्या है? जवाब- नाथ संप्रदाय के पवित्र ग्रंथ गोरखबानी के मुताबिक, नाथ पंथ की शुरुआत आदिनाथ भगवान शिव से हुई थी। इसके अनुसार भगवान शिव ने मत्स्येन्द्रनाथ (मच्छेंद्रनाथ) को ज्ञान दिया और फिर इनके शिष्य हुए गोरखनाथ तक इस पंथ की परंपरा पहुंची। दरअसल, गोरखनाथ भारत में 11वीं से 12वीं सदी के बीच एक सिद्ध संत हुए। गोरखनाथ की वजह से ही नाथ संप्रदाय लोकप्रिय हुआ। उन्हें इस पंथ को आकार देने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने एक बारह पंथी मार्ग बताया, जो नाथ संप्रदाय कहलाया। गोरखनाथ के बाद 13वीं सदी में योगियों का समूह गोरखनाथ के उपदेशों को लेकर एक पंथ का गठन करने लगा। इस संप्रदाय में आस्था रखने वाले लोग अपने नाम के पीछे नाथ लगाते हैं। गोरखनाथ धाम मठ इस संप्रदाय की अध्यक्ष पीठ है, लिहाजा इसका प्रमुख देशभर में नाथ संप्रदाय का अध्यक्ष होता है, जो इस समय योगी आदित्यनाथ हैं। इसी तरह हरियाणा के रोहतक में मस्तनाथ पीठ को उपाध्यक्ष पीठ का दर्जा हासिल है। सवाल 2- गोरखनाथ कौन थे? जवाब- गोरखबानी के मुताबिक, गोरखनाथ को नाथ संप्रदाय को संगठित करने का श्रेय दिया जाता है। वह मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य थे। लंदन के द स्कूल ऑफ ओरियंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज के इंडोलॉजी और योग अध्ययन के प्रोफेसर जेम्स मालिंसन के मुताबिक, आदिनाथ के बाद मत्स्येन्द्रनाथ और फिर गोरक्षनाथ यानी गोरखनाथ उनके शिष्य हुए। गोरखनाथ ने ही नाथ संप्रदाय की स्थापना की। मत्स्येन्द्रनाथ (मच्छेंद्रनाथ) और गोरखनाथ का समय 9वीं से 12वीं सदी के बीच रहा। इसके बाद 17वीं सदी से नाथ संप्रदाय के गुरुओं का क्रम और अधिक संगठित रूप मिलना शुरू होता है। इन दो पंथ योगियों के अलावा जेम्स मालिंसन नौ नाथों का जिक्र करते हैं। 13वीं सदी के तिब्बती स्त्रोतों में नौ नाथों का नाम बताया गया है। 16वीं सदी तक आते-आते नाथ संप्रदाय खुद को हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पंथों से खुद को अलग बताने लगा। वह अपने आप को सिर्फ योगी कहने लगे। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रोफेसर हरि प्रसाद अधिकारी के मुताबिक, गोरखबानी से ही भारत में योग तेजी से चलन में आया। सवाल 3- नाथ संप्रदाय के लोग किन नियमों का पालन करते हैं? जवाब- नाथ संप्रदाय पूजा विधि और नियम में अलग स्थान रखता है। इस पंथ के योगी या तो जीवित रहने पर ही समाधि ले लेते हैं या शरीर छोड़ने पर उन्हें समाधि दी जाती है। ये जलाए नहीं जाते। माना जाता है कि उनका शरीर योग से ही शुद्ध हो जाता है, उसे जलाने की जरूरत नहीं। इस पंथ में मांसाहार और दूसरे तामसी गुण वाले भोजन का निषेध है। जब योगी एक-दूसरे से मिलते हैं तो नमस्कार की जगह आदेश बोलते हैं। यहां आदेश का मतलब होता है आ से आत्मा, द से देवता और श से संत। यानी आप में मौजूद संत को प्रणाम। सवाल 4- नाथ योगी कैसे बनते हैं? जवाब- नाथ पंथ में दीक्षित करने के लिए योगियों की दीक्षा से लेकर पूजा-पाठ और अंतिम संस्कार गोपनीय होता है। किस तरह के योगी दीक्षा ले सकते हैं, इसे लेकर भी नियम है। पंथ में सिर्फ पांच तरह के योगी दीक्षा ले सकते हैं। दीक्षित होने की प्रक्रिया- नाथ बनने के लिए कान छेदन सबसे अहम प्रक्रिया है। कान फाड़ने का मतलब कष्ट सहन की शक्ति, ये दृढ़ता और वैराग्य का बल प्रकट करता है। दीक्षा लेने के बाद योगी लोग अपने परिवार से अलग हो जाते हैं। दीक्षा के उपरांत उन्हें नया नाम दिया जाता है। यह एक ऐसा पंथ है, जिसमें जीते जी पृथ्वी पर दूसरा जन्म होता है। यानी कि पहले वाली जिंदगी, पहले वाली दुनिया, पहले वाले लोग सब त्यागने होते हैं। एक नया जन्म होता है, नए नाम और पहचान के साथ। सवाल 5- नाथ साधु क्या करते हैं? जवाब- नाथ संप्रदाय के योगी दुनिया भर में भ्रमण करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। शर्त इतनी होती है कि जीवन के अंतिम चरण में वो किसी एक स्थान पर रुकें और अखंड धूनी रमाएं। अगर ये ना करना चाहें तो हिमालय में जा सकते हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर क्रिस्टीन मार्रेवा नाथ पंथ को लेकर लिखे एक आर्टिकल में बताती हैं, नाथ योगी मुगल काल से राजनीति में भी दखल देते आए हैं। मुगल बादशाहों पर उनके प्रभाव का जिक्र मिलता है। मुगल बादशाह और हिंदू राजाओं, दोनों ने ही नाथ योगियों को आश्रय दिया। इस समय इन्हें आशीर्वाद के बदले बड़ी मात्रा में जमीनें और दूसरी सुविधाएं दी गईं। मुगलकाल में जाखबर के योगियों और मुगल बादशाह के बीच संबंधों के लिखित प्रमाण मिलते हैं। तब अकबर और जहांगीर ने आशीर्वाद के बदले जाखबर के योगियों को जमीनें और राजस्व अनुदान दिया था। क्रिस्टीन मार्रेवा कहती हैं, मध्यकाल के बाद राजनीति में पंथ योगियों के दखल की शुरुआत गोरखधाम के महंत और योगी आदित्यनाथ के गुरु दिग्विजयनाथ के समय से होती है। इनके समय से ही पंथ संप्रदाय ने खुद हिंदू पहचान के साथ भी जोड़ा। ———————— ये खबर भी पढ़ें… योगी बोले- भूमाफिया को विदा किया:प्रयागराज में 5 साल के बच्चे ने शिव तांडव सुनाया, श्रीराम-निषादराज की प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गुरुवार को प्रयागराज पहुंचे। उन्होंने कहा कि हमने यूपी से माफिया को विदा कर दिया। प्रयागराज अब इलाहाबाद नहीं पूरी तरह से प्रयागराज हो गया है। योगी ने वक्फ बिल के लिए पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का आभार जताया। पढ़ें पूरी खबर उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर
चाकू से कान चीरकर दी जाती है दीक्षा:योगी जिस नाथ संप्रदाय के प्रमुख, उसकी इनसाइक्लोपीडिया 55 एक्सपर्ट बना रहे
