बॉलीवुड स्टार्स को पसंद है काशी का एप्पल पाई:काशी के अस्सी घाट पर मिलती है; 33 साल से स्वाद बिखेर रहा विदेशी जायका

बॉलीवुड स्टार्स को पसंद है काशी का एप्पल पाई:काशी के अस्सी घाट पर मिलती है; 33 साल से स्वाद बिखेर रहा विदेशी जायका

महादेव की नगरी काशी के अस्सी घाट में एप्पल पाई ने अपनी अलग पहचान बनाई है। 33 साल पहले खुले पिज्जारिया वाटिका कैफे में मिलने वाली इस अनोखी डिश की दीवानगी युवाओं के सिर चढ़कर बोलती है। वाराणसी घूमने आए श्रद्धालु और विदेशी पर्यटक एप्पल पाई का स्वाद लेना नहीं भूलते। इतना ही नहीं, काशी में अगर कोई फिल्मी स्टार आता है, तो वह भी एप्पल पाई का जायका चखने पिज्जारिया वाटिका कैफे जरूर जाता है। अजय देवगन जैसे स्टार इस कैफे में एप्पल पाई खा चुके हैं। दैनिक भास्कर की स्पेशल सीरीज जायका में आज जानते हैं काशी के एप्पल पाई के बारे में… वाराणसी जिला मुख्यालय से 2 किलोमीटर दूर अस्सी घाट है। यहीं है पिज्जारिया वाटिका कैफे। यहां लजीज एप्पल पाई मिलता है। दुकान के मालिक गोपाल कृष्ण शुक्ला हैं। वह बताते हैं- हमारे रेस्टोरेंट की शुरुआत 1992 में हुई। तब यहां बहुत सारे विदेशी मेहमान संगीत और संस्कृत का अध्ययन कर रहे थे। उन्हें अपने घर का खाना याद आता था। वे हमारे दोस्त थे। उनकी बातों से चर्चा शुरू हो जाती। फिर हमने चर्चा को नया आयाम दिया और पिज्जारिया वाटिका कैफे की नींव पड़ गई। गोपाल कृष्ण बताते हैं- हमारी एक अमेरिकन सिस्टर थी, जिनका नाम मारिया एस्टोलेन था। उन्होंने एप्पल पाई की शुरुआत की। फिर एक ब्रिटिश रॉयल फैमिली का शेफ आया। उसने हमें इस डिश को बनाने का परफेक्शन दिया। इटली निवासी जेराडो ने बताया कि कैसे इसका स्वाद दिलचस्प होता है। फिल्मी सितारों और विदेशी मेहमान को पसंद है एप्पल पाई अब स्वाद की बात करते हैं…
एप्पल पाई का ऊपरी हिस्सा भट्ठी में पकता है, जिससे इसकी ऊपरी परत क्रंची होती है। यह हल्का मीठा होता है। इसमें एप्पल का स्वाद होता है। नींबू डालने की वजह से इसमें हल्का खट्टापन होता है, जो जुबान में अलग ही स्वाद घोलता है। रेस्टोरेंट सुबह 11 बजे खुलता है और रात में 10 बजे बंद होता है। एप्पल पाई आइसक्रीम के साथ 180 रुपए प्रति पीस मिलता है। गोपाल कृष्ण बताते हैं- रेस्टोरेंट में कई विदेश फूड अवलेबल हैं, लेकिन एप्पल पाई की डिमांड सबसे ज्यादा है। लोग फैमिली के साथ पहुंचते हैं
अस्सी घाट में शाम की आरती के बाद रेस्टोरेंट पूरी तरह गुलजार हो जाता है। यहां लोग फैमिली के साथ पहुंचते हैं। मंत्रों की ध्वनियों के बीच इस रेस्टोरेंट का नजारा देखते ही बनता है। गोपाल शुक्ला ने बताया- इसको बनाने के एक दिन पहले से ही प्रिपरेशन की जाती है। 10 घंटे का वक्त लगता है। सबसे पहले मैदे में मक्खन डालकर इसे मिलाया जाता है। यह मक्खन, मैदा, सेव, चीनी, नीबू से बनता है। इसमें दूध और पानी का प्रयोग नहीं किया जाता। अंत में 100 डिग्री सेल्सियस तापमान पर इसे भट्टी पर पकाते हैं। इसे खाकर आप अंगुलियां चाटते रह जाएंगे, क्योंकि यह बहुत स्वादिष्ट होता है। लोग सादा या आइसक्रीम डालकर खाते हैं। अब जानते हैं, क्या कहते हैं कस्टमर…. ———————- पढ़िए हर गुरुवार पब्लिश होने वाली हमारी ‘जायका’ सीरीज की ये 4 कहानियां… 1.ठग्गू के लड्डू…ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं: 55 साल पुराना कनपुरिया जायका; स्वाद ऐसा कि पीएम मोदी भी मुरीद, सालाना टर्नओवर 5 करोड़ रुपए गंगा नदी के किनारे बसा कानपुर, स्वाद की दुनिया में भी खास पहचान रखता है। यहां का एक जायका 55 साल पुराना है। इसकी क्वालिटी और स्वाद आज भी वैसे ही बरकरार है। यूं तो आपने देश के कई शहरों में लड्डुओं का स्वाद चखा होगा। लेकिन गाय के शुद्ध खोए, सूजी और गोंद में तैयार होने वाले ठग्गू के लजीज लड्डुओं का स्वाद आप शायद ही भूल पाएंगे। पीएम मोदी जब कानपुर मेट्रो का उद्घाटन करने आए थे, तब उन्होंने मंच से इस लड्डू की तारीफ की थी। पढ़िए पूरी खबर… 2. बाजपेयी कचौड़ी…अटल बिहारी से राजनाथ तक स्वाद के दीवाने: खाने के लिए 20 मिनट तक लाइन में लगना पड़ता है, रोजाना 1000 प्लेट से ज्यादा की सेल बात उस कचौड़ी की, जिसकी तारीफ यूपी विधानसभा में होती है। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर राजनाथ सिंह और अखिलेश यादव भी इसके स्वाद के मुरीद रह चुके हैं। दुकान छोटी है, पर स्वाद ऐसा कि इसे खाने के लिए लोग 15 मिनट तक खुशी-खुशी लाइन में लगे रहते हैं। जी हां…सही पहचाना आपने। हम बात कर रहे हैं लखनऊ की बाजपेयी कचौड़ी की। पढ़िए पूरी खबर… 3. ओस की बूंदों से बनने वाली मिठाई: रात 2:30 बजे मक्खन-दूध को मथकर तैयार होती है, अटल से लेकर कल्याण तक आते थे खाने नवाबी ठाठ वाले लखनऊ ने बदलाव के कई दौर देखे हैं, पर 200 साल से भी पुराना एक स्वाद है जो आज भी बरकरार है। लखनऊ की रियासत के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह भी इसके मुरीद थे। अवध क्षेत्र का तख्त कहे जाने वाले लखनऊ के चौक पर आज भी 50 से ज्यादा दुकानें मौजूद हैं, जहां बनती है रूई से भी हल्की मिठाई। दिल्ली वाले इसे ‘दौलत की चाट’ कहते हैं। ठेठ बनारसिया इसे ‘मलइयो’ नाम से पुकारते हैं। आगरा में ‘16 मजे’ और लखनऊ में आकर ये ‘मक्खन-मलाई’ बन जाती है। पढ़िए पूरी खबर… 4. रत्तीलाल के खस्ते के दीवाने अमेरिका में भी: 1937 में 1 रुपए में बिकते थे 64 खस्ते, 4 पीस खाने पर भी हाजमा खराब नहीं होता मसालेदार लाल आलू और मटर के साथ गरमा-गरम खस्ता, साथ में नींबू, लच्छेदार प्याज और हरी मिर्च। महक ऐसी कि मुंह में पानी आ जाए। ये जायका है 85 साल पुराने लखनऊ के रत्तीलाल खस्ते का। 1937 में एक डलिये से बिकना शुरू हुए इन खस्तों का स्वाद आज ऑस्ट्रेलिया,अमेरिका और यूरोप तक पहुंच चुका है। पढ़िए पूरी खबर… महादेव की नगरी काशी के अस्सी घाट में एप्पल पाई ने अपनी अलग पहचान बनाई है। 33 साल पहले खुले पिज्जारिया वाटिका कैफे में मिलने वाली इस अनोखी डिश की दीवानगी युवाओं के सिर चढ़कर बोलती है। वाराणसी घूमने आए श्रद्धालु और विदेशी पर्यटक एप्पल पाई का स्वाद लेना नहीं भूलते। इतना ही नहीं, काशी में अगर कोई फिल्मी स्टार आता है, तो वह भी एप्पल पाई का जायका चखने पिज्जारिया वाटिका कैफे जरूर जाता है। अजय देवगन जैसे स्टार इस कैफे में एप्पल पाई खा चुके हैं। दैनिक भास्कर की स्पेशल सीरीज जायका में आज जानते हैं काशी के एप्पल पाई के बारे में… वाराणसी जिला मुख्यालय से 2 किलोमीटर दूर अस्सी घाट है। यहीं है पिज्जारिया वाटिका कैफे। यहां लजीज एप्पल पाई मिलता है। दुकान के मालिक गोपाल कृष्ण शुक्ला हैं। वह बताते हैं- हमारे रेस्टोरेंट की शुरुआत 1992 में हुई। तब यहां बहुत सारे विदेशी मेहमान संगीत और संस्कृत का अध्ययन कर रहे थे। उन्हें अपने घर का खाना याद आता था। वे हमारे दोस्त थे। उनकी बातों से चर्चा शुरू हो जाती। फिर हमने चर्चा को नया आयाम दिया और पिज्जारिया वाटिका कैफे की नींव पड़ गई। गोपाल कृष्ण बताते हैं- हमारी एक अमेरिकन सिस्टर थी, जिनका नाम मारिया एस्टोलेन था। उन्होंने एप्पल पाई की शुरुआत की। फिर एक ब्रिटिश रॉयल फैमिली का शेफ आया। उसने हमें इस डिश को बनाने का परफेक्शन दिया। इटली निवासी जेराडो ने बताया कि कैसे इसका स्वाद दिलचस्प होता है। फिल्मी सितारों और विदेशी मेहमान को पसंद है एप्पल पाई अब स्वाद की बात करते हैं…
एप्पल पाई का ऊपरी हिस्सा भट्ठी में पकता है, जिससे इसकी ऊपरी परत क्रंची होती है। यह हल्का मीठा होता है। इसमें एप्पल का स्वाद होता है। नींबू डालने की वजह से इसमें हल्का खट्टापन होता है, जो जुबान में अलग ही स्वाद घोलता है। रेस्टोरेंट सुबह 11 बजे खुलता है और रात में 10 बजे बंद होता है। एप्पल पाई आइसक्रीम के साथ 180 रुपए प्रति पीस मिलता है। गोपाल कृष्ण बताते हैं- रेस्टोरेंट में कई विदेश फूड अवलेबल हैं, लेकिन एप्पल पाई की डिमांड सबसे ज्यादा है। लोग फैमिली के साथ पहुंचते हैं
अस्सी घाट में शाम की आरती के बाद रेस्टोरेंट पूरी तरह गुलजार हो जाता है। यहां लोग फैमिली के साथ पहुंचते हैं। मंत्रों की ध्वनियों के बीच इस रेस्टोरेंट का नजारा देखते ही बनता है। गोपाल शुक्ला ने बताया- इसको बनाने के एक दिन पहले से ही प्रिपरेशन की जाती है। 10 घंटे का वक्त लगता है। सबसे पहले मैदे में मक्खन डालकर इसे मिलाया जाता है। यह मक्खन, मैदा, सेव, चीनी, नीबू से बनता है। इसमें दूध और पानी का प्रयोग नहीं किया जाता। अंत में 100 डिग्री सेल्सियस तापमान पर इसे भट्टी पर पकाते हैं। इसे खाकर आप अंगुलियां चाटते रह जाएंगे, क्योंकि यह बहुत स्वादिष्ट होता है। लोग सादा या आइसक्रीम डालकर खाते हैं। अब जानते हैं, क्या कहते हैं कस्टमर…. ———————- पढ़िए हर गुरुवार पब्लिश होने वाली हमारी ‘जायका’ सीरीज की ये 4 कहानियां… 1.ठग्गू के लड्डू…ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं: 55 साल पुराना कनपुरिया जायका; स्वाद ऐसा कि पीएम मोदी भी मुरीद, सालाना टर्नओवर 5 करोड़ रुपए गंगा नदी के किनारे बसा कानपुर, स्वाद की दुनिया में भी खास पहचान रखता है। यहां का एक जायका 55 साल पुराना है। इसकी क्वालिटी और स्वाद आज भी वैसे ही बरकरार है। यूं तो आपने देश के कई शहरों में लड्डुओं का स्वाद चखा होगा। लेकिन गाय के शुद्ध खोए, सूजी और गोंद में तैयार होने वाले ठग्गू के लजीज लड्डुओं का स्वाद आप शायद ही भूल पाएंगे। पीएम मोदी जब कानपुर मेट्रो का उद्घाटन करने आए थे, तब उन्होंने मंच से इस लड्डू की तारीफ की थी। पढ़िए पूरी खबर… 2. बाजपेयी कचौड़ी…अटल बिहारी से राजनाथ तक स्वाद के दीवाने: खाने के लिए 20 मिनट तक लाइन में लगना पड़ता है, रोजाना 1000 प्लेट से ज्यादा की सेल बात उस कचौड़ी की, जिसकी तारीफ यूपी विधानसभा में होती है। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर राजनाथ सिंह और अखिलेश यादव भी इसके स्वाद के मुरीद रह चुके हैं। दुकान छोटी है, पर स्वाद ऐसा कि इसे खाने के लिए लोग 15 मिनट तक खुशी-खुशी लाइन में लगे रहते हैं। जी हां…सही पहचाना आपने। हम बात कर रहे हैं लखनऊ की बाजपेयी कचौड़ी की। पढ़िए पूरी खबर… 3. ओस की बूंदों से बनने वाली मिठाई: रात 2:30 बजे मक्खन-दूध को मथकर तैयार होती है, अटल से लेकर कल्याण तक आते थे खाने नवाबी ठाठ वाले लखनऊ ने बदलाव के कई दौर देखे हैं, पर 200 साल से भी पुराना एक स्वाद है जो आज भी बरकरार है। लखनऊ की रियासत के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह भी इसके मुरीद थे। अवध क्षेत्र का तख्त कहे जाने वाले लखनऊ के चौक पर आज भी 50 से ज्यादा दुकानें मौजूद हैं, जहां बनती है रूई से भी हल्की मिठाई। दिल्ली वाले इसे ‘दौलत की चाट’ कहते हैं। ठेठ बनारसिया इसे ‘मलइयो’ नाम से पुकारते हैं। आगरा में ‘16 मजे’ और लखनऊ में आकर ये ‘मक्खन-मलाई’ बन जाती है। पढ़िए पूरी खबर… 4. रत्तीलाल के खस्ते के दीवाने अमेरिका में भी: 1937 में 1 रुपए में बिकते थे 64 खस्ते, 4 पीस खाने पर भी हाजमा खराब नहीं होता मसालेदार लाल आलू और मटर के साथ गरमा-गरम खस्ता, साथ में नींबू, लच्छेदार प्याज और हरी मिर्च। महक ऐसी कि मुंह में पानी आ जाए। ये जायका है 85 साल पुराने लखनऊ के रत्तीलाल खस्ते का। 1937 में एक डलिये से बिकना शुरू हुए इन खस्तों का स्वाद आज ऑस्ट्रेलिया,अमेरिका और यूरोप तक पहुंच चुका है। पढ़िए पूरी खबर…   उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर