लखनऊ में महिलाओं के लिए इकलौती मस्जिद है। यह मस्जिद तेलीबाग में है। नाम है- अंबर मस्जिद। यह उस खुद्दार महिला की निशानी बनेगी जिसे 35 साल पहले एक मौलवी ने मस्जिद में घुसने ने मना कर दिया था। वह महिला हैं- शाइस्ता अंबर। उन्हें मौलवी ने सिर्फ इसलिए दुत्कारा कि वह एक महिला हैं। उसके बाद शाइस्ता ने ठान लिया कि एक ऐसी जगह बनाएंगी जहां महिलाएं नमाज अदा कर सकें। इसके लिए उन्होंने अपने गहने बेच डाले। इस मस्जिद को बनवाने की वजह जानने दैनिक भास्कर रिपोर्टर पहुंचे शाइस्ता अंबर के घर। उनसे जब इस मस्जिद को बनवाने की वजह पूछी तो वह भावुक हो गईं। कहती हैं- 35 साल बाद मस्जिद में पहली बार तरावीह की नमाज पढ़ी है। इसे जब बनवाना शुरू किया तो बहुत लोगों ने मजाक बनाया, धमकी दी। आज लोग अपनी मां-बेटियों के साथ यहां नमाज करने पहुंचते हैं। इमाम ने ऐसा बर्ताव किया, मानो अछूत हूं शाइस्ता बताती हैं- पति इदरीस अंबर अलीगढ़ में ADM थे। हम परिवार सहित वहीं थे। 1990 में 7 से 10 दिसंबर को दंगा हुआ था। तब ईद में घर नहीं आ पाए। हम बहुत उदास हुए। स्कूटर चलाकर 3 किलोमीटर दूर 6 साल के बच्चे को नमाज पढ़वाने ले गई। वहां मस्जिद के इमाम ने मेरे साथ ऐसा बर्ताव किया जैसे मैं कोई अछूत हूं। इसका मुझे मलाल हो गया। उसी दिन ठान लिया कि महिलाओं के लिए मस्जिद बनवाऊंगी। इस मस्जिद की बुनियाद 1998 में रखी थी। जमीन खरीदने के लिए जेवर बेचे। रिश्तेदारों और दोस्तों से भी मदद ली। मस्जिद निर्माण करवाने का मुख्य उद्देश्य था कि महिलाएं यहां पर आएं। पुरुषों की तरह नमाज अदा करें। अब मस्जिद के दरवाजे सभी जरूरतमंदों के लिए खुले रहते हैं। पुरुष घर की महिलाओं को साथ लेकर आते हैं इस मस्जिद में पुरुष भी नमाज अदा कर सकते हैं। महिलाओं के लिए भी पूरी आजादी है। उनके लिए अलग इंतजाम हैं। इस मस्जिद का जब निर्माण शुरू किया तो लोग मजाक बना रहे थे। उनका कहना था कि तुम अकेली अजान देना, नमाज अदा करना। आज का समय है जब सैकड़ों की संख्या में लोग यहां नमाज पढ़ने आते हैं। पुरुष नमाजी अपनी बीवी, मां और बहन को साथ लेकर आते हैं। वह भी यहां नमाज अदा करती हैं। यहां मस्जिद की फोटो मस्जिद में सभी धर्मों का सम्मान होता है मस्जिद के इमाम मोहम्मद रेहान ने बताया कि वह पिछले 6 साल से यहां नमाज पढ़ा रहे हैं। उत्तर प्रदेश की विभिन्न मस्जिदों का दौरा किया। मगर कहीं भी ऐसी व्यवस्था नहीं मिली कि औरतें 5 वक्त की नमाज मस्जिद में अदा करती हों। इस मस्जिद से लोगों को मोहब्बत का पैगाम दिया जाता है। यहां विभिन्न धर्म के लोग आते हैं। वे देखते हैं कि मस्जिद में किस प्रकार से सभी धर्म का सम्मान किया जाता है। पीजीआई आई थी, पांच वक्त की नमाज की बिहार से पीजीआई इलाज कराने आईं जोया ने भी अंबर मस्जिद में नमाज अदा की। जोया ने बताया- पीजीआई अस्पताल में इलाज करवाने आई थी। जब इस मस्जिद के बारे में जानकारी मिली तो यहां आकर इफ्तार किया। मस्जिद के अंदर पांच वक्त की नमाज के साथ तरावीह की नमाज भी अदा की। यहां आकर बहुत अच्छा लगा और बेहद सुकून मिला। ऐसी व्यवस्थाएं और भी जगह होनी चाहिए। 60 साल में पहली बार मस्जिद में नमाज अदा की 60 वर्षीय नासिरा ने बताया- पहली बार मस्जिद में नमाज अदा किया है। हम औरतें भी मस्जिद में नमाज पढ़ सकती हैं इसका यकीन नहीं हो रहा है। हमारे लिए हमेशा घर में ही नमाज अदा करने के नियम बने थे। पहली बार मस्जिद में नमाज पढ़कर जो खुशी मिली उसे बयां नहीं कर सकती। हम यही कहेंगे कि ऐसी और भी मस्जिदों का निर्माण होना चाहिए जहां महिलाएं नमाज अदा करें। ट्रिपल तलाक की लड़ाई लड़ी : शाइस्ता शाइस्ता अंबर ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल बोर्ड की अध्यक्ष भी हैं। वह कहती हैं- समाज के विभिन्न मुद्दों की लड़ाई लड़ी। मुस्लिम समाज से जुड़ा सबसे बड़ा मुद्दा ट्रिपल तलाक था। उस लड़ाई को मजबूती से लड़ा। जीती तो ट्रिपल तलाक के खिलाफ सरकार को कानून लाना पड़ा। इसके साथ ही मस्जिद में महिलाओं की जमात शुरू कराई। लखनऊ में महिलाओं के लिए इकलौती मस्जिद है। यह मस्जिद तेलीबाग में है। नाम है- अंबर मस्जिद। यह उस खुद्दार महिला की निशानी बनेगी जिसे 35 साल पहले एक मौलवी ने मस्जिद में घुसने ने मना कर दिया था। वह महिला हैं- शाइस्ता अंबर। उन्हें मौलवी ने सिर्फ इसलिए दुत्कारा कि वह एक महिला हैं। उसके बाद शाइस्ता ने ठान लिया कि एक ऐसी जगह बनाएंगी जहां महिलाएं नमाज अदा कर सकें। इसके लिए उन्होंने अपने गहने बेच डाले। इस मस्जिद को बनवाने की वजह जानने दैनिक भास्कर रिपोर्टर पहुंचे शाइस्ता अंबर के घर। उनसे जब इस मस्जिद को बनवाने की वजह पूछी तो वह भावुक हो गईं। कहती हैं- 35 साल बाद मस्जिद में पहली बार तरावीह की नमाज पढ़ी है। इसे जब बनवाना शुरू किया तो बहुत लोगों ने मजाक बनाया, धमकी दी। आज लोग अपनी मां-बेटियों के साथ यहां नमाज करने पहुंचते हैं। इमाम ने ऐसा बर्ताव किया, मानो अछूत हूं शाइस्ता बताती हैं- पति इदरीस अंबर अलीगढ़ में ADM थे। हम परिवार सहित वहीं थे। 1990 में 7 से 10 दिसंबर को दंगा हुआ था। तब ईद में घर नहीं आ पाए। हम बहुत उदास हुए। स्कूटर चलाकर 3 किलोमीटर दूर 6 साल के बच्चे को नमाज पढ़वाने ले गई। वहां मस्जिद के इमाम ने मेरे साथ ऐसा बर्ताव किया जैसे मैं कोई अछूत हूं। इसका मुझे मलाल हो गया। उसी दिन ठान लिया कि महिलाओं के लिए मस्जिद बनवाऊंगी। इस मस्जिद की बुनियाद 1998 में रखी थी। जमीन खरीदने के लिए जेवर बेचे। रिश्तेदारों और दोस्तों से भी मदद ली। मस्जिद निर्माण करवाने का मुख्य उद्देश्य था कि महिलाएं यहां पर आएं। पुरुषों की तरह नमाज अदा करें। अब मस्जिद के दरवाजे सभी जरूरतमंदों के लिए खुले रहते हैं। पुरुष घर की महिलाओं को साथ लेकर आते हैं इस मस्जिद में पुरुष भी नमाज अदा कर सकते हैं। महिलाओं के लिए भी पूरी आजादी है। उनके लिए अलग इंतजाम हैं। इस मस्जिद का जब निर्माण शुरू किया तो लोग मजाक बना रहे थे। उनका कहना था कि तुम अकेली अजान देना, नमाज अदा करना। आज का समय है जब सैकड़ों की संख्या में लोग यहां नमाज पढ़ने आते हैं। पुरुष नमाजी अपनी बीवी, मां और बहन को साथ लेकर आते हैं। वह भी यहां नमाज अदा करती हैं। यहां मस्जिद की फोटो मस्जिद में सभी धर्मों का सम्मान होता है मस्जिद के इमाम मोहम्मद रेहान ने बताया कि वह पिछले 6 साल से यहां नमाज पढ़ा रहे हैं। उत्तर प्रदेश की विभिन्न मस्जिदों का दौरा किया। मगर कहीं भी ऐसी व्यवस्था नहीं मिली कि औरतें 5 वक्त की नमाज मस्जिद में अदा करती हों। इस मस्जिद से लोगों को मोहब्बत का पैगाम दिया जाता है। यहां विभिन्न धर्म के लोग आते हैं। वे देखते हैं कि मस्जिद में किस प्रकार से सभी धर्म का सम्मान किया जाता है। पीजीआई आई थी, पांच वक्त की नमाज की बिहार से पीजीआई इलाज कराने आईं जोया ने भी अंबर मस्जिद में नमाज अदा की। जोया ने बताया- पीजीआई अस्पताल में इलाज करवाने आई थी। जब इस मस्जिद के बारे में जानकारी मिली तो यहां आकर इफ्तार किया। मस्जिद के अंदर पांच वक्त की नमाज के साथ तरावीह की नमाज भी अदा की। यहां आकर बहुत अच्छा लगा और बेहद सुकून मिला। ऐसी व्यवस्थाएं और भी जगह होनी चाहिए। 60 साल में पहली बार मस्जिद में नमाज अदा की 60 वर्षीय नासिरा ने बताया- पहली बार मस्जिद में नमाज अदा किया है। हम औरतें भी मस्जिद में नमाज पढ़ सकती हैं इसका यकीन नहीं हो रहा है। हमारे लिए हमेशा घर में ही नमाज अदा करने के नियम बने थे। पहली बार मस्जिद में नमाज पढ़कर जो खुशी मिली उसे बयां नहीं कर सकती। हम यही कहेंगे कि ऐसी और भी मस्जिदों का निर्माण होना चाहिए जहां महिलाएं नमाज अदा करें। ट्रिपल तलाक की लड़ाई लड़ी : शाइस्ता शाइस्ता अंबर ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल बोर्ड की अध्यक्ष भी हैं। वह कहती हैं- समाज के विभिन्न मुद्दों की लड़ाई लड़ी। मुस्लिम समाज से जुड़ा सबसे बड़ा मुद्दा ट्रिपल तलाक था। उस लड़ाई को मजबूती से लड़ा। जीती तो ट्रिपल तलाक के खिलाफ सरकार को कानून लाना पड़ा। इसके साथ ही मस्जिद में महिलाओं की जमात शुरू कराई। उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर
लखनऊ में महिलाओं के लिए इकलौती मस्जिद:लोगों ने कहा था- यहां अकेले नमाज पढ़ोगी, आज खुद मां-बेटियों के साथ पहुंचते हैं
