सोनीपत के गांव की एक बेटी को मशरूम की खेती में उत्कृष्ट कार्य करने पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कृषि प्रोत्साहन के रूप में द्वितीय पुरस्कार से नवाजा है। करनाल में आयोजित 11वीं मेगा सब्जी एक्सपो 2025 में उनको ये सम्मान मिला। मशरूम की खेती में सोनिया का सालाना टर्नओवर करीबन 1 करोड़ 20 लाख है। सभी खर्च निकाल कर वह साल में 25 से 30 लाख रुपए बचा लेती है। वो कई पुरस्कार से नवाजी जा चुकी है। सोनीपत जिले के गांव बड़वासनी की बेटी डॉ. सोनिया दहिया महिला उद्यमी होने के साथ-साथ एक शिक्षाविद् भी है। वह सोनीपत के दीनबंधु छोटूराम विज्ञान एवं तकनीकी विश्वविद्यालय (DCRUST), मुरथल में असिस्टेंट प्रोफेसर है और बायोटेक्नोलॉजी में पीएचडी कर चुकी है। उनके पति डॉ. विजय दहिया दिल्ली के महाराजा सूरजमल इंस्टीट्यूट में गणित के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। दोनों पति-पत्नी ने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया बल्कि कृषि क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। सोनिया ने कड़ी मेहनत और लगन से मशरूम की खेती में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। सीएम ने संडे को उनको करनाल में सम्मानित किया। इससे पहले भी उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं, जिसमें जम्मू-कश्मीर में सर्वश्रेष्ठ किसान पुरस्कार, जिला बागवानी विभाग द्वारा राज्य स्तर की कार्यकारी सदस्य के रूप में चयन, 2022 में इंटरनेशनल बायोटेक्नोलॉजी इवेंट में सम्मान, 2023 में हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय द्वारा पुरस्कार, 23 दिसंबर किसान दिवस पर हिसार में सम्मानित किया जा चुका है। सोनिया ने बताया, कैसे हुई शुरुआत
साल 2020 से पहले दोनों ही पति-पत्नी ने मिलकर गांव बड़वासनी में 1 एकड़ जमीन खरीदी थी। इस जमीन पर भी स्कूल बनाना चाहते थे। और स्कूल के माध्यम से गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों के लिए बेहतरीन शिक्षा का एक प्रयास का विचार किया था। लेकिन इस दौरान करोना महामारी का दौर आ गया। इस दौरान जो स्कूल चल रहे थे वह भी बंद हो गए। जिसके चलते स्कूल बनाने का विचार खत्म करके उन्होंने कृषि के क्षेत्र में कदम रखने का विचार बनाया। हालांकि उनके लिए यह बिल्कुल नया करने जैसा था। इससे पहले कृषि का कोई अनुभव उनके पास नहीं था। लेकिन जिद जुनून और हौसले ने उन्हें इस काबिल बना दिया कि उन्होंने गांव बड़वासनी में मशरूम की खेती के लिए मशरूम एसी चैंबर बनवाएं। यहीं से उन्होंने अपनी शुरुआत की। सोनिया को तकनीकी एवं जैव प्रौद्योगिकी में शुरुआत से ही रुचि रही है और जिसका फायदा उसे मशरूम की खेती के दौरान मिला। पहली बार रिस्क लेकर दोनों ने मिलकर 40 लाख रुपए का निवेश करके दो ग्रोइंग रूम के रूप में मशरूम चैंबर की शुरुआत की। जानकारी के मुताबिक के पहली बार उन्होंने करीबन 5600 मशरूम बैग तैयार किए थे। वही इस दौरान ने अच्छी खाद ना मिलने के चलते भी उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा और उसके बाद उन्होंने खुद की कंपोस्ट खाद भी तैयार करने का निर्णय किया। इस प्रकार उनकी शुरुआत आज एक बड़ा कारवां बन चुकी है। करोड़ों का टर्नओवर
डॉ सोनिया दहिया ने बताया कि साल 2020 में सबसे पहले उन्होंने सिविल वर्क के शुरू कराया।फिर 2021 में उन्होंने अपने दो ग्रोइंग रूम तैयार किए। इस समय चार रूम चल रहे हैं और सभी में मशरूम की खेती कर रही है। सुबह के समय यूनिवर्सिटी में बच्चों को पड़ता है तो वहीं दोपहर बाद अपनी खेती संभालती है। मशरूम लेडी सोनिया का कहना है कि 12 महीने मशरूम की खेती करते हैं और प्रति महीने 8 से 10 टन की पैदावार करते हैं और साल में करीबन 120 टन तक पहुंच जाती है।
इतना ही नहीं वह 100 तन कंपोस्ट खाद भी तैयार कर लेती हैं। जो बाजार में 7 से 8 रुपए किलो के हिसाब से बिक जाता है।जिसकी क्वालिटी काफी बेहतरीन होती है। और जिसके चलते डिमांड भी पूरी नहीं हो पाती। सालाना टर्नओवर करीबन 1 करोड़ 20 लाख के आसपास है। सभी खर्च निकाल कर बचत सालाना 25 से 30 लाख तक आ जाती है। सोनिया ने बताया कि बाजार में मशरूम की डिमांड के मुताबिक अलग-अलग रेट मिलता है। लेकिन एक एवरेज बात करें तो 12 महीने 120 रु प्रति किलो के हिसाब से मशरूम बिकती है। महिलाओं को भी दिया रोजगार
असिस्टेंट प्रोफेसर सोनिया दहिया ने खुद को तो कामयाब बनाया ही बल्कि 20 महिलाओं के घर में रोजगार का दीपक जला दिया। महिला सशक्तिकरण का मजबूत उदाहरण है और अन्य के लिए प्रेरणा बनकर उभरी है। अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए आधुनिक खेती की तरफ कदम बढ़ाए। मशरूम फॉर्म लगाकर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को मशरूम उत्पादन से लेकर पैकिंग करने सहित अन्य विधियों की जानकारी दी। उनके फॉर्म में करीब 20 महिलाएं 3 साल से परमानेंट रोजगार प्राप्त कर रही हैं। वहीं सीजन पर अतिरिक्त महिलाएं प्रतिदिन दिहाड़ी के हिसाब से बुलाई जाती हैं। कोरोना महामारी में लॉकडाउन के दौरान पैदा हुए विपरीत हालात के बाद मजदूर वर्ग के सामने रोजी-रोटी का संकट आन खड़ा हुआ था। गरीब लोगों को दिहाड़ी भी नहीं मिल रही थी। ऐसे नाजुक हालात में डॉ. सोनिया दहिया महिलाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से मशरूम की खेती में काम देकर मजबूत बनाने निर्णय लिया। यहां काम करने वाली महिलाएं आज मशरूम फॉर्म के हर कार्य में पारंगत होकर अपने साथ परिवार का जीवन संवार रही हैं। घर के नजदीक रोजगार मिलने से ग्रामीण महिलाएं अब अपने बच्चों को भी अच्छे स्कूल में शिक्षा दिला पा रही है। महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देते हुए शैक्षणिक कार्य के साथ ही मशरूम की खेती में अच्छा मुनाफा कमा रही हैं। महिलाओं को दिया रोजगार तो बोली मशरूम फॉर्म में काम करने वाली पिंकी और अन्य महिलाओं ने कहा, पहले घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था, लेकिन डॉ. सोनिया ने हमें अपने पैरों पर खड़ा किया। आज हम आत्मनिर्भर हैं और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में सक्षम हैं। वही उनके बच्चों की शिक्षा भी अच्छे स्कूल में शुरू हो गई है। किसानों को ट्रेनिंग भी दे रहीं डॉ. सोनिया डॉ. सोनिया दहिया न केवल खुद खेती कर रही हैं, बल्कि अन्य किसानों को भी ट्रेनिंग देकर उन्हें मशरूम की खेती में आगे बढ़ने में मदद कर रही हैं।यूपी, हरियाणा समेत कई राज्यों में 10 से ज्यादा किसानों के मशरूम फॉर्म तैयार करवा चुकी हैं। शुरुआती ट्रेनिंग से लेकर चैंबर बनवाने तक की पूरी जानकारी देती हैं। खेती को तकनीक से जोड़कर आधुनिक किसान बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं। डॉ. सोनिया बोली- पति ने पूरा सहयोग डॉ. सोनिया ने कहा, शुरुआत में चुनौतियां आईं, लेकिन मेरे पति डॉ. विजय दहिया का पूरा सहयोग रहा। हम दोनों की हमेशा से शिक्षा के साथ कुछ अलग करने की ललक रही है। अब मैं न केवल छात्रों को पढ़ाती हूं बल्कि किसानों को भी मशरूम खेती की ट्रेनिंग देती हूं। डॉ. सोनिया दहिया की कहानी एक प्रेरणा है, जो दिखाती है कि अगर दृढ़ संकल्प और मेहनत हो तो किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल की जा सकती है। उन्होंने न केवल शिक्षा में योगदान दिया, बल्कि मशरूम की खेती से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनीं और अन्य महिलाओं को भी सशक्त बनाया। मुख्यमंत्री द्वारा हाल ही में उन्हें कृषि प्रोत्साहन पुरस्कार से नवाजना इस बात का प्रमाण है कि उनकी मेहनत को अब राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा जा रहा है। सोनीपत के गांव की एक बेटी को मशरूम की खेती में उत्कृष्ट कार्य करने पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कृषि प्रोत्साहन के रूप में द्वितीय पुरस्कार से नवाजा है। करनाल में आयोजित 11वीं मेगा सब्जी एक्सपो 2025 में उनको ये सम्मान मिला। मशरूम की खेती में सोनिया का सालाना टर्नओवर करीबन 1 करोड़ 20 लाख है। सभी खर्च निकाल कर वह साल में 25 से 30 लाख रुपए बचा लेती है। वो कई पुरस्कार से नवाजी जा चुकी है। सोनीपत जिले के गांव बड़वासनी की बेटी डॉ. सोनिया दहिया महिला उद्यमी होने के साथ-साथ एक शिक्षाविद् भी है। वह सोनीपत के दीनबंधु छोटूराम विज्ञान एवं तकनीकी विश्वविद्यालय (DCRUST), मुरथल में असिस्टेंट प्रोफेसर है और बायोटेक्नोलॉजी में पीएचडी कर चुकी है। उनके पति डॉ. विजय दहिया दिल्ली के महाराजा सूरजमल इंस्टीट्यूट में गणित के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। दोनों पति-पत्नी ने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया बल्कि कृषि क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। सोनिया ने कड़ी मेहनत और लगन से मशरूम की खेती में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। सीएम ने संडे को उनको करनाल में सम्मानित किया। इससे पहले भी उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं, जिसमें जम्मू-कश्मीर में सर्वश्रेष्ठ किसान पुरस्कार, जिला बागवानी विभाग द्वारा राज्य स्तर की कार्यकारी सदस्य के रूप में चयन, 2022 में इंटरनेशनल बायोटेक्नोलॉजी इवेंट में सम्मान, 2023 में हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय द्वारा पुरस्कार, 23 दिसंबर किसान दिवस पर हिसार में सम्मानित किया जा चुका है। सोनिया ने बताया, कैसे हुई शुरुआत
साल 2020 से पहले दोनों ही पति-पत्नी ने मिलकर गांव बड़वासनी में 1 एकड़ जमीन खरीदी थी। इस जमीन पर भी स्कूल बनाना चाहते थे। और स्कूल के माध्यम से गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों के लिए बेहतरीन शिक्षा का एक प्रयास का विचार किया था। लेकिन इस दौरान करोना महामारी का दौर आ गया। इस दौरान जो स्कूल चल रहे थे वह भी बंद हो गए। जिसके चलते स्कूल बनाने का विचार खत्म करके उन्होंने कृषि के क्षेत्र में कदम रखने का विचार बनाया। हालांकि उनके लिए यह बिल्कुल नया करने जैसा था। इससे पहले कृषि का कोई अनुभव उनके पास नहीं था। लेकिन जिद जुनून और हौसले ने उन्हें इस काबिल बना दिया कि उन्होंने गांव बड़वासनी में मशरूम की खेती के लिए मशरूम एसी चैंबर बनवाएं। यहीं से उन्होंने अपनी शुरुआत की। सोनिया को तकनीकी एवं जैव प्रौद्योगिकी में शुरुआत से ही रुचि रही है और जिसका फायदा उसे मशरूम की खेती के दौरान मिला। पहली बार रिस्क लेकर दोनों ने मिलकर 40 लाख रुपए का निवेश करके दो ग्रोइंग रूम के रूप में मशरूम चैंबर की शुरुआत की। जानकारी के मुताबिक के पहली बार उन्होंने करीबन 5600 मशरूम बैग तैयार किए थे। वही इस दौरान ने अच्छी खाद ना मिलने के चलते भी उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा और उसके बाद उन्होंने खुद की कंपोस्ट खाद भी तैयार करने का निर्णय किया। इस प्रकार उनकी शुरुआत आज एक बड़ा कारवां बन चुकी है। करोड़ों का टर्नओवर
डॉ सोनिया दहिया ने बताया कि साल 2020 में सबसे पहले उन्होंने सिविल वर्क के शुरू कराया।फिर 2021 में उन्होंने अपने दो ग्रोइंग रूम तैयार किए। इस समय चार रूम चल रहे हैं और सभी में मशरूम की खेती कर रही है। सुबह के समय यूनिवर्सिटी में बच्चों को पड़ता है तो वहीं दोपहर बाद अपनी खेती संभालती है। मशरूम लेडी सोनिया का कहना है कि 12 महीने मशरूम की खेती करते हैं और प्रति महीने 8 से 10 टन की पैदावार करते हैं और साल में करीबन 120 टन तक पहुंच जाती है।
इतना ही नहीं वह 100 तन कंपोस्ट खाद भी तैयार कर लेती हैं। जो बाजार में 7 से 8 रुपए किलो के हिसाब से बिक जाता है।जिसकी क्वालिटी काफी बेहतरीन होती है। और जिसके चलते डिमांड भी पूरी नहीं हो पाती। सालाना टर्नओवर करीबन 1 करोड़ 20 लाख के आसपास है। सभी खर्च निकाल कर बचत सालाना 25 से 30 लाख तक आ जाती है। सोनिया ने बताया कि बाजार में मशरूम की डिमांड के मुताबिक अलग-अलग रेट मिलता है। लेकिन एक एवरेज बात करें तो 12 महीने 120 रु प्रति किलो के हिसाब से मशरूम बिकती है। महिलाओं को भी दिया रोजगार
असिस्टेंट प्रोफेसर सोनिया दहिया ने खुद को तो कामयाब बनाया ही बल्कि 20 महिलाओं के घर में रोजगार का दीपक जला दिया। महिला सशक्तिकरण का मजबूत उदाहरण है और अन्य के लिए प्रेरणा बनकर उभरी है। अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए आधुनिक खेती की तरफ कदम बढ़ाए। मशरूम फॉर्म लगाकर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को मशरूम उत्पादन से लेकर पैकिंग करने सहित अन्य विधियों की जानकारी दी। उनके फॉर्म में करीब 20 महिलाएं 3 साल से परमानेंट रोजगार प्राप्त कर रही हैं। वहीं सीजन पर अतिरिक्त महिलाएं प्रतिदिन दिहाड़ी के हिसाब से बुलाई जाती हैं। कोरोना महामारी में लॉकडाउन के दौरान पैदा हुए विपरीत हालात के बाद मजदूर वर्ग के सामने रोजी-रोटी का संकट आन खड़ा हुआ था। गरीब लोगों को दिहाड़ी भी नहीं मिल रही थी। ऐसे नाजुक हालात में डॉ. सोनिया दहिया महिलाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से मशरूम की खेती में काम देकर मजबूत बनाने निर्णय लिया। यहां काम करने वाली महिलाएं आज मशरूम फॉर्म के हर कार्य में पारंगत होकर अपने साथ परिवार का जीवन संवार रही हैं। घर के नजदीक रोजगार मिलने से ग्रामीण महिलाएं अब अपने बच्चों को भी अच्छे स्कूल में शिक्षा दिला पा रही है। महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देते हुए शैक्षणिक कार्य के साथ ही मशरूम की खेती में अच्छा मुनाफा कमा रही हैं। महिलाओं को दिया रोजगार तो बोली मशरूम फॉर्म में काम करने वाली पिंकी और अन्य महिलाओं ने कहा, पहले घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था, लेकिन डॉ. सोनिया ने हमें अपने पैरों पर खड़ा किया। आज हम आत्मनिर्भर हैं और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने में सक्षम हैं। वही उनके बच्चों की शिक्षा भी अच्छे स्कूल में शुरू हो गई है। किसानों को ट्रेनिंग भी दे रहीं डॉ. सोनिया डॉ. सोनिया दहिया न केवल खुद खेती कर रही हैं, बल्कि अन्य किसानों को भी ट्रेनिंग देकर उन्हें मशरूम की खेती में आगे बढ़ने में मदद कर रही हैं।यूपी, हरियाणा समेत कई राज्यों में 10 से ज्यादा किसानों के मशरूम फॉर्म तैयार करवा चुकी हैं। शुरुआती ट्रेनिंग से लेकर चैंबर बनवाने तक की पूरी जानकारी देती हैं। खेती को तकनीक से जोड़कर आधुनिक किसान बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं। डॉ. सोनिया बोली- पति ने पूरा सहयोग डॉ. सोनिया ने कहा, शुरुआत में चुनौतियां आईं, लेकिन मेरे पति डॉ. विजय दहिया का पूरा सहयोग रहा। हम दोनों की हमेशा से शिक्षा के साथ कुछ अलग करने की ललक रही है। अब मैं न केवल छात्रों को पढ़ाती हूं बल्कि किसानों को भी मशरूम खेती की ट्रेनिंग देती हूं। डॉ. सोनिया दहिया की कहानी एक प्रेरणा है, जो दिखाती है कि अगर दृढ़ संकल्प और मेहनत हो तो किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल की जा सकती है। उन्होंने न केवल शिक्षा में योगदान दिया, बल्कि मशरूम की खेती से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनीं और अन्य महिलाओं को भी सशक्त बनाया। मुख्यमंत्री द्वारा हाल ही में उन्हें कृषि प्रोत्साहन पुरस्कार से नवाजना इस बात का प्रमाण है कि उनकी मेहनत को अब राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा जा रहा है। हरियाणा | दैनिक भास्कर
