अमित कुमार | लुधियाना पंजाब सरकार भले ही सरकारी स्कूलों को स्मार्ट स्कूलों में बदलने के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे एकदम उलट है। शुक्रवार को लुधियाना के भामिया गांव स्थित एक सरकारी प्राइमरी स्कूल से एक बच्ची अचानक लापता हो गई। काफी देर की मशक्कत के बाद उसे ढूंढा जा सका, लेकिन इस घटना ने सरकारी स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। जिले में कुल 1527 सरकारी स्कूल हैं, जिनमें से 993 स्कूल प्राइमरी स्तर के हैं। हालांकि सेकेंडरी स्कूलों को पहले फेस में सिक्योरिटी गार्ड मुहैया करवा दिए गए, लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज तक किसी भी प्राइमरी स्कूल को सुरक्षा गार्ड उपलब्ध नहीं कराया गया। शिक्षा विभाग द्वारा सभी स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे लगवाने के आदेश दिए गए हैं, जिनकी मेंटेनेंस के लिए बाकायदा फंड भी जारी किया जाता है, लेकिन कई स्कूलों में कैमरे या तो काम नहीं कर रहे या फिर शोपीस बनकर रह गए हैं। भामिया की घटना के बाद जब स्कूल की जांच की गई तो पता चला कि वहां लगे कुछ कैमरे बंद पड़े थे। सवाल यह है कि जब छोटे बच्चे स्कूल में होते हैं तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है। डीईओ प्राइमरी रविंदर कौर ने स्वीकार किया कि प्राइमरी स्कूलों में सुरक्षा गार्डों की नियुक्ति नहीं है और विभाग को बार-बार डिमांड भेजी जाती रही है। उन्होंने सभी स्कूलों को निर्देश दिए हैं कि सुबह स्कूल खुलते ही गेट बंद कर दिए जाएं और छुट्टी तक न खोले जाएं। केवल पेरेंट्स को ही बच्चे सौंपे जाएं। साथ ही छुट्टी के समय एक टीचर गेट के पास मौजूद रहे। उन्होंने यह भी कहा कि कैमरे काम कर रहे हैं या नहीं, इसकी जिम्मेदारी भी स्कूल टीचर्स की होगी। अगर कोई कैमरा खराब है तो उसे तुरंत ठीक कराया जाए। लोगों का कहना है कि छोटे बच्चों की सुरक्षा के मामले में इतनी ढिलाई बेहद खतरनाक हो सकती है। आज भले ही बच्ची सुरक्षित मिल गई, लेकिन अगर किसी बच्चे को कुछ हो जाए तो इसकी जिम्मेदारी किस पर होगी। जब सरकार स्मार्ट स्कूल का टैग देती है तो उसमें सुरक्षा जैसी बेसिक सुविधा तो होनी ही चाहिए। लोगों का आरोप है कि इस पूरी घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर विभाग और सरकार गंभीर नहीं हैं। लोगों को सिर्फ फाइलों में ही स्मार्ट स्कूल का सपना दिखाया जा रहा है। अमित कुमार | लुधियाना पंजाब सरकार भले ही सरकारी स्कूलों को स्मार्ट स्कूलों में बदलने के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे एकदम उलट है। शुक्रवार को लुधियाना के भामिया गांव स्थित एक सरकारी प्राइमरी स्कूल से एक बच्ची अचानक लापता हो गई। काफी देर की मशक्कत के बाद उसे ढूंढा जा सका, लेकिन इस घटना ने सरकारी स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। जिले में कुल 1527 सरकारी स्कूल हैं, जिनमें से 993 स्कूल प्राइमरी स्तर के हैं। हालांकि सेकेंडरी स्कूलों को पहले फेस में सिक्योरिटी गार्ड मुहैया करवा दिए गए, लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज तक किसी भी प्राइमरी स्कूल को सुरक्षा गार्ड उपलब्ध नहीं कराया गया। शिक्षा विभाग द्वारा सभी स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे लगवाने के आदेश दिए गए हैं, जिनकी मेंटेनेंस के लिए बाकायदा फंड भी जारी किया जाता है, लेकिन कई स्कूलों में कैमरे या तो काम नहीं कर रहे या फिर शोपीस बनकर रह गए हैं। भामिया की घटना के बाद जब स्कूल की जांच की गई तो पता चला कि वहां लगे कुछ कैमरे बंद पड़े थे। सवाल यह है कि जब छोटे बच्चे स्कूल में होते हैं तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है। डीईओ प्राइमरी रविंदर कौर ने स्वीकार किया कि प्राइमरी स्कूलों में सुरक्षा गार्डों की नियुक्ति नहीं है और विभाग को बार-बार डिमांड भेजी जाती रही है। उन्होंने सभी स्कूलों को निर्देश दिए हैं कि सुबह स्कूल खुलते ही गेट बंद कर दिए जाएं और छुट्टी तक न खोले जाएं। केवल पेरेंट्स को ही बच्चे सौंपे जाएं। साथ ही छुट्टी के समय एक टीचर गेट के पास मौजूद रहे। उन्होंने यह भी कहा कि कैमरे काम कर रहे हैं या नहीं, इसकी जिम्मेदारी भी स्कूल टीचर्स की होगी। अगर कोई कैमरा खराब है तो उसे तुरंत ठीक कराया जाए। लोगों का कहना है कि छोटे बच्चों की सुरक्षा के मामले में इतनी ढिलाई बेहद खतरनाक हो सकती है। आज भले ही बच्ची सुरक्षित मिल गई, लेकिन अगर किसी बच्चे को कुछ हो जाए तो इसकी जिम्मेदारी किस पर होगी। जब सरकार स्मार्ट स्कूल का टैग देती है तो उसमें सुरक्षा जैसी बेसिक सुविधा तो होनी ही चाहिए। लोगों का आरोप है कि इस पूरी घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर विभाग और सरकार गंभीर नहीं हैं। लोगों को सिर्फ फाइलों में ही स्मार्ट स्कूल का सपना दिखाया जा रहा है। पंजाब | दैनिक भास्कर
