यूपी में कांग्रेस अपने 40 साल पुराने फॉर्मूले पर लौट रही है। कांग्रेस ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित वोटबैंक से 35 साल तक राज करती रही, लेकिन 90 के दशक में मंडल-कमंडल की राजनीति जैसे-जैसे आगे बढ़ी, कांग्रेस का कोर वोटर उससे छिटकता चला गया। कांग्रेस की 134 जिलाध्यक्षों की सूची से साफ है कि पार्टी एक बार फिर अपने पुराने कोर वोटरों को साधने की तैयारी में है। कांग्रेस की सूची में सपा के एमवाई (यादव-मुस्लिम) और बसपा के बीडीएम (ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम) समीकरण की काट भी देखी जा सकती है। कांग्रेस ने सबसे अधिक 33 ओबीसी, 32 मुस्लिम, 27 ब्राह्मण और 20 एससी-एसटी को जिलाध्यक्ष की कमान सौंपी। उसने साफ कर दिया है कि वह बीपीडीए (ब्राह्मण, ओबीसी, दलित व मुस्लिम) फॉर्मूले पर आगे बढ़ेगी। कांग्रेस की जिलाध्यक्षों की सूची और बीपीडीए फॉर्मूले पर एक्सपर्ट और राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस सूची पर राहुल गांधी की जातिगत जनगणना की मांग वाली छाप साफ दिख रही है। कांग्रेस को इस समीकरण का कितना फायदा मिलेगा, क्या फिर से अपने पुराने कोर वोटरों को जोड़ने में सफल रहेगी? पढ़िए ये रिपोर्ट… प्रदेश के जटिल राजनीतिक समीकरण के बीच संतुलन की कोशिश
प्रदेश में अभी कांग्रेस के दो विधायक और छह सांसद हैं। अभी वह सबसे खराब दौर से गुजर रही है। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश सिंह के मुताबिक कांग्रेस ने इस सूची के जरिए जातिगत संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। कांग्रेस ने 33 ओबीसी को मौका दिया है। इसमें 15 पसमांदा मुस्लिमों को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 48 होती है। मुस्लिम समाज में पसमांदा पिछड़े समाज में आते हैं और इनकी आबादी मुस्लिमों में सबसे अधिक है। पीएम मोदी भी मुस्लिमों के पसमांदा समाज को आकर्षित करने पर जोर दे चुके हैं। कांग्रेस ने इस वर्ग को सूची में जगह देकर साफ कर दिया है कि वह अपने इस पुराने मजबूत वोटबैंक को फिर से वापस पाना चाहती है। भाजपा ने अपने जिलाध्यक्षों की सूची में सबसे अधिक 20 ब्राह्मणों को जगह दी है। वहीं कांग्रेस ने 27 ब्राह्मणों को शामिल किया है। कांग्रेस इस बहाने ये संदेश देना चाहती है कि ब्राह्मणों का भविष्य कांग्रेस में ही है। दलित राजनीति करने वाली बसपा की कमजोरी का फायदा उठाने की जुगत भी कांग्रेस की सूची में साफ देखी जा सकती है। पार्टी ने 19 जिलाध्यक्ष दलित समाज से बनाए हैं। वहीं, 1 जिलाध्यक्ष आदिवासी वर्ग का बनाया है। लखनऊ महानगर में दो शहर अध्यक्ष बनाने की रणनीति
कांग्रेस ने 8 महिलाओं सहित 134 जिलाध्यक्षों की सूची में 76 जिलाध्यक्ष और 58 शहर अध्यक्ष नियुक्त किए हैं। पार्टी ने लखनऊ में दो शहर अध्यक्ष बनाए हैं। इसमें एक मुस्लिम समाज से आने वाले डॉ. शहजाद आलम और दूसरे अमित श्रीवास्तव त्यागी हैं। डॉ. शहजाद दूसरी बार, तो पेशे से वकील अमित श्रीवास्तव को तीसरी बार शहर कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। वहीं ग्रामीण से रुद्र दमन सिंह को मौका देकर कांग्रेस ने लखनऊ के जातिगत समीकरण को साधने का प्रयास किया। वहीं, प्रयागराज को यमुना पार व गंगा पार के दो ग्रामीण अध्यक्ष दिए हैं। कांग्रेस की ओर से 18 छोटे जिलों में भी शहर अध्यक्ष नियुक्त किए जाने का प्रस्ताव भेजा गया था। लेकिन इस पर सहमति नहीं बन सकी। इस कारण यहां भी जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं। कांग्रेस के 134 जिलाध्यक्षों में 84 की उम्र 50 वर्ष से कम है। 70 साल से अधिक के सिर्फ दो लोगों को मौका दिया गया है। इस सूची में शामिल कई चेहरे 2027 के विधानसभा चुनाव में बतौर प्रत्याशी भी नजर आ सकते हैं। समीकरण और जाति के आधार पर जिलाध्यक्षों की संख्या कांग्रेस ने इस सूची में विभिन्न जातियों और समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपनाई। पिछड़े वर्ग से लेकर अल्पसंख्यक पर फोकस किया है। पिछड़ा वर्ग: अल्पसंख्यक (मुस्लिम) अनुसूचित जाति/जनजाति सामान्य वर्ग कांग्रेस का राजनीतिक समीकरण समझें बीपीडीए के इस सामाजिक फॉर्मूले पर कांग्रेस का जोर ब्राह्मण वर्ग: पिछड़ा वर्ग: दलित: अल्पसंख्यक: कांग्रेस को कितना फायदा-नुकसान हो सकता है? मजबूत पक्ष 2027 का लक्ष्य साधना कमजोरियां यूपी में 130 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 50 फीसदी कांग्रेस की रणनीति में अल्पसंख्यक प्रदेश में मजबूत नेतृत्व की दरकार
वरिष्ठ पत्रकार सुरेश सिंह के मुताबिक, प्रियंका और राहुल गांधी के अलावा यूपी में कांग्रेस का कोई मजबूत चेहरा नहीं है, जो बीपीडीए को प्रभावी ढंग से लागू कर सके। प्रदेश अध्यक्ष अजय राय की कमजोरी ये है कि उनके समाज का वोटबैंक बहुत अधिक प्रभावी नहीं है। ऐसे में बीपीडीए फॉर्मूला अपनाना कांग्रेस की एक मजबूत रणनीति है, जो यूपी की सामाजिक संरचना को ध्यान में रखकर बनाई गई है। यह सपा के एमवाई और बीजेपी के हिंदुत्व मॉडल के बीच एक वैकल्पिक नरेटिव पेश कर सकता है। हालांकि, इसका सफल होना कांग्रेस के संगठनात्मक मजबूती, स्थानीय नेतृत्व के उभरने और इन समुदायों में विश्वास बहाली पर निर्भर करता है। अगर यह फॉर्मूला जमीन पर उतर जाता है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। कांग्रेस अपने संगठन को नए सिरे से खड़ा करने का लगातार प्रयास कर रही है। प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को संगठन पुनर्गठन का जिम्मा सौंपा गया था। जनवरी में प्रदेश प्रभारी सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं ने जिला व शहर अध्यक्षों के चयन के लिए जोनवार कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार लिए थे। इसके बाद अब जाकर जिलाध्यक्षों की सूची जारी की गई है। इसके बाद कार्यकारिणी सहित अन्य संगठन तैयार करने की चुनौती रहेगी। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में स्थानीय और प्रभावशाली नेताओं को आगे लाना होगा। जिस तरीके से पश्चिमी यूपी में पार्टी ने इमरान मसूद को आगे बढ़ाया है। इसके अलावा जनहित के रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर फोकस कर मुस्लिम युवाओं को जोड़ना होगा। बीजेपी के ‘वोट जिहाद’ जैसे नरेटिव का जवाब देने के लिए सावधानीपूर्वक संदेश तैयार करना, ताकि ध्रुवीकरण का लाभ सपा-बसपा की बजाय कांग्रेस को मिल सके। ———————— यह खबर भी पढ़ें… यूपी BJP में 70 नए जिलाध्यक्षों में 39 सवर्ण:20 ब्राह्मण, 10 ठाकुर; 44 नए चेहरे, सिर्फ 5 महिलाएं; 28 जिलों में चुनाव टालना पड़ा यूपी भाजपा ने ढाई महीने की मशक्कत के बाद आखिरकार रविवार को 70 जिलों में जिलाध्यक्ष की घोषणा कर दी। 28 जिलों में विरोध, गुटबाजी और नेताओं के दबाव के चलते ऐन वक्त पर चुनाव टाल दिया गया। 70 जिलाध्यक्षों में से 44 नए चेहरे हैं। इनमें 5 महिलाएं हैं। 26 को दोबारा मौका दिया गया है। पूरी खबर पढ़ें… यूपी में कांग्रेस अपने 40 साल पुराने फॉर्मूले पर लौट रही है। कांग्रेस ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित वोटबैंक से 35 साल तक राज करती रही, लेकिन 90 के दशक में मंडल-कमंडल की राजनीति जैसे-जैसे आगे बढ़ी, कांग्रेस का कोर वोटर उससे छिटकता चला गया। कांग्रेस की 134 जिलाध्यक्षों की सूची से साफ है कि पार्टी एक बार फिर अपने पुराने कोर वोटरों को साधने की तैयारी में है। कांग्रेस की सूची में सपा के एमवाई (यादव-मुस्लिम) और बसपा के बीडीएम (ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम) समीकरण की काट भी देखी जा सकती है। कांग्रेस ने सबसे अधिक 33 ओबीसी, 32 मुस्लिम, 27 ब्राह्मण और 20 एससी-एसटी को जिलाध्यक्ष की कमान सौंपी। उसने साफ कर दिया है कि वह बीपीडीए (ब्राह्मण, ओबीसी, दलित व मुस्लिम) फॉर्मूले पर आगे बढ़ेगी। कांग्रेस की जिलाध्यक्षों की सूची और बीपीडीए फॉर्मूले पर एक्सपर्ट और राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस सूची पर राहुल गांधी की जातिगत जनगणना की मांग वाली छाप साफ दिख रही है। कांग्रेस को इस समीकरण का कितना फायदा मिलेगा, क्या फिर से अपने पुराने कोर वोटरों को जोड़ने में सफल रहेगी? पढ़िए ये रिपोर्ट… प्रदेश के जटिल राजनीतिक समीकरण के बीच संतुलन की कोशिश
प्रदेश में अभी कांग्रेस के दो विधायक और छह सांसद हैं। अभी वह सबसे खराब दौर से गुजर रही है। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश सिंह के मुताबिक कांग्रेस ने इस सूची के जरिए जातिगत संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। कांग्रेस ने 33 ओबीसी को मौका दिया है। इसमें 15 पसमांदा मुस्लिमों को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 48 होती है। मुस्लिम समाज में पसमांदा पिछड़े समाज में आते हैं और इनकी आबादी मुस्लिमों में सबसे अधिक है। पीएम मोदी भी मुस्लिमों के पसमांदा समाज को आकर्षित करने पर जोर दे चुके हैं। कांग्रेस ने इस वर्ग को सूची में जगह देकर साफ कर दिया है कि वह अपने इस पुराने मजबूत वोटबैंक को फिर से वापस पाना चाहती है। भाजपा ने अपने जिलाध्यक्षों की सूची में सबसे अधिक 20 ब्राह्मणों को जगह दी है। वहीं कांग्रेस ने 27 ब्राह्मणों को शामिल किया है। कांग्रेस इस बहाने ये संदेश देना चाहती है कि ब्राह्मणों का भविष्य कांग्रेस में ही है। दलित राजनीति करने वाली बसपा की कमजोरी का फायदा उठाने की जुगत भी कांग्रेस की सूची में साफ देखी जा सकती है। पार्टी ने 19 जिलाध्यक्ष दलित समाज से बनाए हैं। वहीं, 1 जिलाध्यक्ष आदिवासी वर्ग का बनाया है। लखनऊ महानगर में दो शहर अध्यक्ष बनाने की रणनीति
कांग्रेस ने 8 महिलाओं सहित 134 जिलाध्यक्षों की सूची में 76 जिलाध्यक्ष और 58 शहर अध्यक्ष नियुक्त किए हैं। पार्टी ने लखनऊ में दो शहर अध्यक्ष बनाए हैं। इसमें एक मुस्लिम समाज से आने वाले डॉ. शहजाद आलम और दूसरे अमित श्रीवास्तव त्यागी हैं। डॉ. शहजाद दूसरी बार, तो पेशे से वकील अमित श्रीवास्तव को तीसरी बार शहर कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। वहीं ग्रामीण से रुद्र दमन सिंह को मौका देकर कांग्रेस ने लखनऊ के जातिगत समीकरण को साधने का प्रयास किया। वहीं, प्रयागराज को यमुना पार व गंगा पार के दो ग्रामीण अध्यक्ष दिए हैं। कांग्रेस की ओर से 18 छोटे जिलों में भी शहर अध्यक्ष नियुक्त किए जाने का प्रस्ताव भेजा गया था। लेकिन इस पर सहमति नहीं बन सकी। इस कारण यहां भी जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं। कांग्रेस के 134 जिलाध्यक्षों में 84 की उम्र 50 वर्ष से कम है। 70 साल से अधिक के सिर्फ दो लोगों को मौका दिया गया है। इस सूची में शामिल कई चेहरे 2027 के विधानसभा चुनाव में बतौर प्रत्याशी भी नजर आ सकते हैं। समीकरण और जाति के आधार पर जिलाध्यक्षों की संख्या कांग्रेस ने इस सूची में विभिन्न जातियों और समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपनाई। पिछड़े वर्ग से लेकर अल्पसंख्यक पर फोकस किया है। पिछड़ा वर्ग: अल्पसंख्यक (मुस्लिम) अनुसूचित जाति/जनजाति सामान्य वर्ग कांग्रेस का राजनीतिक समीकरण समझें बीपीडीए के इस सामाजिक फॉर्मूले पर कांग्रेस का जोर ब्राह्मण वर्ग: पिछड़ा वर्ग: दलित: अल्पसंख्यक: कांग्रेस को कितना फायदा-नुकसान हो सकता है? मजबूत पक्ष 2027 का लक्ष्य साधना कमजोरियां यूपी में 130 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 50 फीसदी कांग्रेस की रणनीति में अल्पसंख्यक प्रदेश में मजबूत नेतृत्व की दरकार
वरिष्ठ पत्रकार सुरेश सिंह के मुताबिक, प्रियंका और राहुल गांधी के अलावा यूपी में कांग्रेस का कोई मजबूत चेहरा नहीं है, जो बीपीडीए को प्रभावी ढंग से लागू कर सके। प्रदेश अध्यक्ष अजय राय की कमजोरी ये है कि उनके समाज का वोटबैंक बहुत अधिक प्रभावी नहीं है। ऐसे में बीपीडीए फॉर्मूला अपनाना कांग्रेस की एक मजबूत रणनीति है, जो यूपी की सामाजिक संरचना को ध्यान में रखकर बनाई गई है। यह सपा के एमवाई और बीजेपी के हिंदुत्व मॉडल के बीच एक वैकल्पिक नरेटिव पेश कर सकता है। हालांकि, इसका सफल होना कांग्रेस के संगठनात्मक मजबूती, स्थानीय नेतृत्व के उभरने और इन समुदायों में विश्वास बहाली पर निर्भर करता है। अगर यह फॉर्मूला जमीन पर उतर जाता है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। कांग्रेस अपने संगठन को नए सिरे से खड़ा करने का लगातार प्रयास कर रही है। प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को संगठन पुनर्गठन का जिम्मा सौंपा गया था। जनवरी में प्रदेश प्रभारी सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं ने जिला व शहर अध्यक्षों के चयन के लिए जोनवार कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार लिए थे। इसके बाद अब जाकर जिलाध्यक्षों की सूची जारी की गई है। इसके बाद कार्यकारिणी सहित अन्य संगठन तैयार करने की चुनौती रहेगी। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में स्थानीय और प्रभावशाली नेताओं को आगे लाना होगा। जिस तरीके से पश्चिमी यूपी में पार्टी ने इमरान मसूद को आगे बढ़ाया है। इसके अलावा जनहित के रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर फोकस कर मुस्लिम युवाओं को जोड़ना होगा। बीजेपी के ‘वोट जिहाद’ जैसे नरेटिव का जवाब देने के लिए सावधानीपूर्वक संदेश तैयार करना, ताकि ध्रुवीकरण का लाभ सपा-बसपा की बजाय कांग्रेस को मिल सके। ———————— यह खबर भी पढ़ें… यूपी BJP में 70 नए जिलाध्यक्षों में 39 सवर्ण:20 ब्राह्मण, 10 ठाकुर; 44 नए चेहरे, सिर्फ 5 महिलाएं; 28 जिलों में चुनाव टालना पड़ा यूपी भाजपा ने ढाई महीने की मशक्कत के बाद आखिरकार रविवार को 70 जिलों में जिलाध्यक्ष की घोषणा कर दी। 28 जिलों में विरोध, गुटबाजी और नेताओं के दबाव के चलते ऐन वक्त पर चुनाव टाल दिया गया। 70 जिलाध्यक्षों में से 44 नए चेहरे हैं। इनमें 5 महिलाएं हैं। 26 को दोबारा मौका दिया गया है। पूरी खबर पढ़ें… उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर
यूपी में 40 साल पुराने फॉर्मूले पर लौट रही कांग्रेस:2027 के लिए ब्राह्मण-पिछड़ा-दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर फोकस; जिलाध्यक्षों में इन्हीं की दिखी धमक
