इजराइल पर पाकिस्तान का सख्त रुख कायम, ट्रम्प की अपील भी बेअसर

इजराइल पर पाकिस्तान का सख्त रुख कायम, ट्रम्प की अपील भी बेअसर

इजराइल को मान्यता देने से पाकिस्तान का फिर इनकार, विदेश नीति और फिलिस्तीन मुद्दे पर दोहराया अपना रुख

पाकिस्तान ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि वह इजराइल को आधिकारिक मान्यता देने की अपनी नीति में फिलहाल कोई बदलाव नहीं करने जा रहा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि देश अपनी वैचारिक, राजनीतिक और विदेश नीति से जुड़े मूल सिद्धांतों पर कायम है तथा इस विषय पर उसका रुख कई दशकों से स्पष्ट रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि वर्तमान परिस्थितियों में इजराइल को मान्यता देने का कोई निर्णय विचाराधीन नहीं है।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पश्चिम एशिया में बदलते कूटनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा तेज है। हाल के वर्षों में कई अरब देशों ने इजराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं, जबकि कुछ अन्य देश भी क्षेत्रीय परिस्थितियों के आधार पर अपनी नीतियों की समीक्षा कर रहे हैं। इसी बीच पाकिस्तान के रुख को लेकर भी विभिन्न स्तरों पर अटकलें लगाई जाती रही हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका की ओर से मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ संबंध सामान्य बनाने और अब्राहम अकॉर्ड्स जैसे समझौतों में शामिल होने की अपील की गई थी। इन्हीं चर्चाओं के बीच पाकिस्तान की नीति एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय ध्यान का केंद्र बनी है।

पाकिस्तान का आधिकारिक रुख क्या है

पाकिस्तान लंबे समय से यह कहता रहा है कि वह फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान से पहले इजराइल को आधिकारिक मान्यता नहीं देगा। पाकिस्तान की विदेश नीति में यह रुख कई दशकों से शामिल रहा है और विभिन्न सरकारों ने समय-समय पर इसी नीति को दोहराया है।

सरकारी स्तर पर पाकिस्तान का कहना है कि जब तक 1967 की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना नहीं होती, तब तक इजराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने का प्रश्न नहीं उठता।

इसी कारण पाकिस्तान ने अब तक इजराइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए हैं।

घरेलू राजनीति में फिलिस्तीन मुद्दे का महत्व

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान में फिलिस्तीन का मुद्दा केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध देश की घरेलू राजनीति, सामाजिक भावनाओं और धार्मिक दृष्टिकोण से भी जुड़ा हुआ है।

देश के विभिन्न राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों ने समय-समय पर फिलिस्तीन के समर्थन में अपना पक्ष रखा है। ऐसे में किसी भी सरकार के लिए इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने का निर्णय राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है।

विश्लेषकों का कहना है कि इस विषय पर सार्वजनिक राय भी सरकारों की नीति निर्धारण प्रक्रिया को प्रभावित करती रही है।

अब्राहम अकॉर्ड्स, पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति और पाकिस्तान की रणनीति

क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स

अब्राहम अकॉर्ड्स वर्ष 2020 में सामने आए ऐसे समझौते हैं जिनका उद्देश्य इजराइल और कुछ अरब देशों के बीच राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाना था। इन समझौतों के बाद संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और मोरक्को सहित कुछ देशों ने इजराइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए।

इन समझौतों के समर्थकों का कहना है कि इससे क्षेत्रीय व्यापार, निवेश, तकनीकी सहयोग और सुरक्षा संबंधों को बढ़ावा मिला। वहीं आलोचकों का मानना है कि फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान से पहले इस प्रकार के समझौते कई राजनीतिक और मानवीय प्रश्न भी खड़े करते हैं।

अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका लंबे समय से पश्चिम एशिया में सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विभिन्न देशों के बीच संबंध सामान्य करने की दिशा में प्रयास करता रहा है। इसी व्यापक रणनीति के तहत अब्राहम अकॉर्ड्स को महत्वपूर्ण पहल माना गया था।

अमेरिकी नेतृत्व का तर्क रहा है कि आर्थिक सहयोग, व्यापारिक संपर्क और सुरक्षा साझेदारी बढ़ने से क्षेत्र में दीर्घकालिक स्थिरता को प्रोत्साहन मिल सकता है।

गाजा संघर्ष के बाद बदला क्षेत्रीय माहौल

विशेषज्ञों का कहना है कि गाजा में संघर्ष और मानवीय स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई है। इसके बाद कई देशों में इजराइल-फिलिस्तीन मुद्दा फिर से प्रमुख राजनीतिक और कूटनीतिक विषय बन गया।

कई अरब देशों ने भी यह संकेत दिया है कि भविष्य में किसी भी व्यापक समझौते के लिए फिलिस्तीन से जुड़े मुद्दों पर ठोस प्रगति आवश्यक होगी। इसी बदले हुए माहौल का प्रभाव क्षेत्रीय कूटनीति पर भी देखा जा रहा है।

सऊदी अरब का दृष्टिकोण

हाल के समय में सऊदी अरब ने भी सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि फिलिस्तीनी राज्य की दिशा में सार्थक प्रगति के बिना इजराइल के साथ पूर्ण संबंध सामान्य करने का प्रश्न जटिल बना रहेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया की प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियों के रुख का प्रभाव अन्य मुस्लिम देशों की विदेश नीति पर भी पड़ सकता है।

इमरान खान के कार्यकाल में भी हुई थी चर्चा

पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपने कार्यकाल के दौरान भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि पाकिस्तान अपनी पारंपरिक नीति से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन को पाकिस्तान की आधिकारिक नीति बताया था।

सत्ता से बाहर आने के बाद उन्होंने यह दावा भी किया था कि उनकी सरकार पर इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाया गया था। हालांकि उन्होंने उस समय किसी विशेष देश का नाम सार्वजनिक रूप से नहीं लिया था।

पाकिस्तान की विदेश नीति में फिलिस्तीन का स्थान

पाकिस्तान की विदेश नीति में फिलिस्तीन का समर्थन लंबे समय से प्रमुख विषय रहा है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान ने कई अवसरों पर फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों और दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन की बात दोहराई है।

सरकारी नीति के अनुसार पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुरूप ऐसा समाधान चाहता है जिसमें इजराइल और फिलिस्तीन दोनों के लिए स्थायी एवं शांतिपूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित हो सके।

कश्मीर और फिलिस्तीन के मुद्दों को साथ जोड़कर देखने की नीति

कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर और फिलिस्तीन के मुद्दों का उल्लेख अपने कूटनीतिक बयानों में साथ-साथ करता रहा है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन दोनों विषयों को अपने व्यापक विदेश नीति दृष्टिकोण के हिस्से के रूप में प्रस्तुत करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान अपनी इजराइल नीति में किसी बड़े बदलाव पर विचार करता है, तो उसका प्रभाव उसकी मौजूदा कूटनीतिक रणनीति और अंतरराष्ट्रीय तर्कों पर भी पड़ सकता है। इसी कारण इस विषय पर कोई भी संभावित नीति परिवर्तन अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।

क्षेत्रीय कूटनीति पर बनी रहेगी नजर

पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों, इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष, क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और प्रमुख देशों की विदेश नीति में आने वाले परिवर्तनों का प्रभाव आने वाले समय में दक्षिण एशिया की कूटनीति पर भी पड़ सकता है। फिलहाल पाकिस्तान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि उसकी आधिकारिक नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है और वह अपने घोषित रुख पर कायम है।