प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले महीने करेंगे यूरोप दौरा, जी7 शिखर सम्मेलन में लेंगे हिस्सा; पहली बार स्लोवाकिया की आधिकारिक यात्रा भी कार्यक्रम में शामिल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले महीने यूरोप के महत्वपूर्ण दौरे पर रवाना होंगे। इस दौरे के दौरान वह सबसे पहले फ्रांस में आयोजित होने वाले जी7 (G7) शिखर सम्मेलन में विशेष आमंत्रित नेता के रूप में भाग लेंगे। इसके बाद वह स्लोवाकिया की आधिकारिक यात्रा करेंगे, जो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की इस मध्य यूरोपीय देश की पहली द्विपक्षीय आधिकारिक यात्रा मानी जा रही है।
कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार यह दौरा भारत की विदेश नीति, वैश्विक रणनीतिक साझेदारी और यूरोपीय देशों के साथ आर्थिक सहयोग को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। फ्रांस में होने वाले जी7 सम्मेलन के दौरान जहां वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा होगी, वहीं स्लोवाकिया यात्रा का मुख्य उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार, निवेश, रक्षा, प्रौद्योगिकी और औद्योगिक सहयोग को मजबूत करना रहेगा।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी सक्रिय भूमिका लगातार बढ़ाई है। जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, डिजिटल अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक मुद्दों पर भारत की भागीदारी पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का यह यूरोप दौरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बढ़ती भूमिका को और मजबूती देने वाला माना जा रहा है।
फ्रांस में आयोजित होगा जी7 शिखर सम्मेलन
जी7 शिखर सम्मेलन 15 से 17 जून के बीच फ्रांस के एवियां-ले-बैंस (Évian-les-Bains) शहर में आयोजित किया जाएगा। इस सम्मेलन की मेजबानी फ्रांस कर रहा है और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विशेष आमंत्रित नेता के रूप में शामिल होने का निमंत्रण दिया है।
जी7 विश्व की सात प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और जापान शामिल हैं। हालांकि भारत इस समूह का स्थायी सदस्य नहीं है, लेकिन पिछले कई वर्षों से उसे विशेष आमंत्रित देश के रूप में लगातार बुलाया जा रहा है।
भारत की नियमित भागीदारी यह दर्शाती है कि वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर उसकी भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।
2019 से लगातार जी7 बैठकों में शामिल हो रहा है भारत
भारत को वर्ष 2019 में पहली बार फ्रांस की पहल पर जी7 शिखर सम्मेलन में विशेष आमंत्रित देश के रूप में शामिल किया गया था। इसके बाद से भारत लगातार विभिन्न मेजबान देशों द्वारा आयोजित जी7 सम्मेलनों में भाग लेता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच भारत की बढ़ती आर्थिक क्षमता, विशाल उपभोक्ता बाजार, तकनीकी विकास और वैश्विक कूटनीतिक संतुलन ने उसे इस मंच पर एक महत्वपूर्ण साझेदार बना दिया है।
इन वैश्विक मुद्दों पर हो सकती है चर्चा
इस बार के जी7 सम्मेलन में दुनिया के सामने मौजूद कई प्रमुख चुनौतियों पर व्यापक चर्चा होने की संभावना है। इनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की आपूर्ति, वैश्विक व्यापार व्यवस्था, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और उभरती प्रौद्योगिकियों से जुड़े विषय शामिल हो सकते हैं।
इसके अलावा यूक्रेन संकट, पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े मुद्दे भी एजेंडे का हिस्सा बन सकते हैं।
भारत इन विषयों पर विकासशील देशों के दृष्टिकोण को वैश्विक मंच पर रखने का प्रयास कर सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रहेगा प्रमुख एजेंडा
हाल के वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) दुनिया भर में सबसे तेजी से विकसित होने वाली तकनीकों में शामिल हो चुका है। इसके सुरक्षित उपयोग, नियमन, डेटा सुरक्षा, रोजगार और नवाचार से जुड़े प्रश्नों पर विभिन्न देशों के बीच लगातार चर्चा चल रही है।
भारत भी एआई आधारित तकनीकों के विकास, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) और जिम्मेदार तकनीकी उपयोग पर लगातार काम कर रहा है। ऐसे में सम्मेलन के दौरान इस विषय पर भारत का दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन पर भी रहेगा फोकस
वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की बढ़ती मांग, स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ता रुझान और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियां जी7 देशों के लिए भी प्रमुख विषय बनी हुई हैं।
भारत नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा और ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) के क्षेत्र में कई महत्वाकांक्षी योजनाओं पर काम कर रहा है। ऐसे में इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा होने की संभावना है।
क्या होगी प्रधानमंत्री मोदी और डोनाल्ड ट्रम्प की मुलाकात?
जी7 सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भागीदारी भी संभावित मानी जा रही है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प की संभावित मुलाकात पर भी नजर रहेगी।
हालांकि अभी तक दोनों नेताओं के बीच अलग से द्विपक्षीय बैठक का आधिकारिक कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया है। यदि समय और कार्यक्रम की अनुमति मिलती है, तो सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं के बीच मुलाकात हो सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी और डोनाल्ड ट्रम्प की आखिरी आमने-सामने मुलाकात फरवरी 2025 में हुई थी। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कई बार टेलीफोन के माध्यम से बातचीत होने की जानकारी सामने आई है।
जी7 सम्मेलन भारत के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
हालांकि भारत जी7 का सदस्य नहीं है, लेकिन इस मंच पर लगातार आमंत्रित किए जाने से उसकी वैश्विक भूमिका मजबूत हुई है। जी7 सम्मेलन भारत को प्रमुख विकसित देशों के साथ आर्थिक सहयोग, निवेश, प्रौद्योगिकी, जलवायु वित्त, आपूर्ति श्रृंखला और रणनीतिक साझेदारी जैसे विषयों पर सीधे संवाद का अवसर प्रदान करता है।
इसके अलावा यह मंच वैश्विक दक्षिण (Global South) से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सामने रखने का अवसर देता है।
फ्रांस के बाद स्लोवाकिया का ऐतिहासिक दौरा
फ्रांस में जी7 सम्मेलन समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्लोवाकिया की आधिकारिक यात्रा पर जाएंगे। यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली आधिकारिक स्लोवाकिया यात्रा होगी, इसलिए इसे ऐतिहासिक माना जा रहा है।
भारत और स्लोवाकिया के बीच राजनयिक संबंध वर्ष 1993 में स्थापित हुए थे। पिछले तीन दशकों में दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, औद्योगिक सहयोग और तकनीकी साझेदारी लगातार मजबूत हुई है।
हाल ही में भारत आए थे स्लोवाकिया के राष्ट्रपति
हाल ही में स्लोवाकिया के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी भारत दौरे पर आए थे। इस दौरान उन्होंने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में भाग लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक भी की।
दोनों देशों के नेताओं ने व्यापार, निवेश, तकनीकी सहयोग और उभरते क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाने पर चर्चा की थी। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की आगामी यात्रा के दौरान इन विषयों पर आगे की प्रगति हो सकती है।
भारत-स्लोवाकिया व्यापार लगातार बढ़ रहा है
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत और स्लोवाकिया के बीच द्विपक्षीय व्यापार 1.3 अरब यूरो से अधिक के स्तर पर पहुंच चुका है। दोनों देश व्यापार और निवेश को और विस्तार देने के लिए नई संभावनाओं पर काम कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय बाजार में भारत की बढ़ती उपस्थिति और विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार से दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने के नए अवसर बन सकते हैं।
इन क्षेत्रों में बढ़ सकता है सहयोग
भारत और स्लोवाकिया के बीच कई रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं। इनमें ऑटोमोबाइल निर्माण, रक्षा उत्पादन, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, अंतरिक्ष तकनीक, परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, नवीकरणीय ऊर्जा और अनुसंधान एवं विकास प्रमुख हैं।
दोनों देशों की सरकारें उद्योग, नवाचार और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए नई साझेदारियों पर भी विचार कर सकती हैं।
क्यों कहा जाता है स्लोवाकिया को ‘यूरोप का डेट्रॉइट’?
स्लोवाकिया को अक्सर ‘यूरोप का डेट्रॉइट’ कहा जाता है क्योंकि यह यूरोप के प्रमुख ऑटोमोबाइल निर्माण केंद्रों में शामिल है। यहां प्रति वर्ष लगभग 10 लाख वाहनों का उत्पादन होता है, जो इसकी आबादी के अनुपात में दुनिया के सबसे अधिक वाहन उत्पादन वाले देशों में इसे शामिल करता है।
देश में फॉक्सवैगन, किया, स्टेलेंटिस और जगुआर लैंड रोवर जैसी प्रमुख वैश्विक वाहन निर्माता कंपनियों की उत्पादन इकाइयां संचालित हैं। ऑटोमोबाइल उद्योग स्लोवाकिया की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
भारत के लिए क्या हो सकता है इस दौरे का महत्व?
कूटनीतिक विश्लेषकों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह यूरोप दौरा केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक रणनीतिक साझेदारी, आर्थिक सहयोग, तकनीकी निवेश और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
फ्रांस में जी7 सम्मेलन के माध्यम से भारत को प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर अपनी भूमिका स्पष्ट करने का अवसर मिलेगा, जबकि स्लोवाकिया यात्रा के जरिए मध्य यूरोप के साथ व्यापार, निवेश, रक्षा और विनिर्माण क्षेत्र में नए सहयोग के रास्ते खुल सकते हैं। आने वाले समय में इस दौरे के दौरान होने वाली बैठकों और समझौतों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय और उद्योग जगत की विशेष नजर बनी रहेगी।




