भारत-UK FTA लागू: ब्रिटिश कारों से लेकर स्कॉच तक होगी सस्ती, भारतीय निर्यातकों के लिए खुलेंगे नए अवसर

भारत-UK FTA लागू: ब्रिटिश कारों से लेकर स्कॉच तक होगी सस्ती, भारतीय निर्यातकों के लिए खुलेंगे नए अवसर

भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) के बीच लंबे समय से प्रतीक्षित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) अब आधिकारिक रूप से लागू हो गया है। इस समझौते के साथ दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते एक नए दौर में प्रवेश कर गए हैं। इस डील का सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं, उद्योगों, निर्यातकों और निवेशकों पर दिखाई देगा। जहां एक तरफ भारत में ब्रिटेन से आने वाले कई प्रीमियम उत्पाद पहले के मुकाबले कम कीमत पर उपलब्ध होंगे, वहीं दूसरी तरफ भारतीय कंपनियों को ब्रिटेन के बाजार में अपने उत्पाद बिना या बेहद कम शुल्क के साथ बेचने का अवसर मिलेगा।

करीब साढ़े तीन वर्षों तक चली बातचीत और कई दौर की बैठकों के बाद इस व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया गया था। जुलाई 2025 में दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी में इस पर हस्ताक्षर किए गए थे। अब इसके लागू होने के साथ भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2030 तक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग दोगुना होकर 120 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच सकता है।

इस समझौते के लागू होने से पहले भारत में ब्रिटेन की हाई कमिश्नर लिंडी कैमरन ने इसे दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया था। उन्होंने कहा था कि यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि निवेश, रोजगार और नई तकनीकों के क्षेत्र में भी सहयोग को नई दिशा देगा।

FTA के सबसे बड़े प्रभावों में से एक आयात शुल्क में भारी कमी है। पहले ब्रिटेन से आने वाले कई उत्पादों पर औसतन लगभग 15 प्रतिशत शुल्क लगता था, जो अब घटकर करीब 3 प्रतिशत रह जाएगा। इसके अलावा अगले दस वर्षों में लगभग 85 प्रतिशत ब्रिटिश उत्पाद पूरी तरह शुल्क मुक्त हो जाएंगे। इससे भारतीय बाजार में कई विदेशी उत्पादों की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिल सकती है।

सबसे अधिक चर्चा स्कॉच व्हिस्की और जिन को लेकर हो रही है। पहले इन उत्पादों पर 150 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाया जाता था। अब इसे घटाकर 75 प्रतिशत कर दिया गया है और समझौते के अनुसार अगले दस वर्षों में यह शुल्क 40 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। इसका असर यह होगा कि प्रीमियम स्कॉच की बोतलें पहले की तुलना में हजारों रुपये सस्ती मिल सकती हैं।

लग्जरी ऑटोमोबाइल सेक्टर को भी इस समझौते से बड़ा फायदा मिलने वाला है। जगुआर लैंड रोवर, रोल्स-रॉयस और अन्य ब्रिटिश ब्रांडों पर लगने वाला आयात शुल्क कोटा आधारित व्यवस्था के तहत काफी कम हो जाएगा। पहले जहां इन कारों पर लगभग 100 प्रतिशत तक टैक्स लगता था, वहीं अब यह कई मामलों में 10 प्रतिशत तक सीमित रहेगा। उद्योग विशेषज्ञों का अनुमान है कि इससे कुछ लग्जरी कारों की कीमतों में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।

ब्रिटेन से आयात होने वाले खाद्य पदार्थ भी पहले की तुलना में सस्ते हो सकते हैं। सैल्मन मछली, लैंब, चॉकलेट, बिस्किट और विभिन्न पेय पदार्थों पर शुल्क कम होने से इनकी कीमतों में राहत मिलने की संभावना है। साथ ही ब्रिटिश कॉस्मेटिक्स, मेडिकल डिवाइस, एयरोस्पेस उपकरण, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स और फैशन उत्पाद भी भारतीय ग्राहकों को कम कीमत पर उपलब्ध हो सकेंगे।

हालांकि इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ केवल आयात तक सीमित नहीं है। भारतीय निर्यातकों के लिए ब्रिटेन का बाजार पहले से कहीं अधिक खुल जाएगा। समझौते के अनुसार भारत के लगभग 99 प्रतिशत उत्पाद अब ब्रिटेन में बिना किसी आयात शुल्क के प्रवेश कर सकेंगे। इससे कई उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में मजबूत स्थिति मिलेगी।

टेक्सटाइल उद्योग इस समझौते का सबसे बड़ा लाभार्थी माना जा रहा है। अब भारतीय कपड़े, होम टेक्सटाइल, चादरें, तौलिए और परदों पर ब्रिटेन में पहले लगने वाला 8 से 12 प्रतिशत शुल्क समाप्त हो जाएगा। इससे भारतीय उत्पाद बांग्लादेश, वियतनाम और अन्य प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे। तिरुप्पुर, सूरत और लुधियाना जैसे प्रमुख उत्पादन केंद्रों में उत्पादन और निर्यात दोनों बढ़ने की संभावना है।

रत्न एवं आभूषण उद्योग को भी इस डील से नई ऊर्जा मिलेगी। भारतीय ज्वेलरी, डायमंड और अन्य कीमती आभूषण अब ब्रिटेन में बिना अतिरिक्त शुल्क के पहुंच सकेंगे। चमड़े के बैग, बेल्ट, जूते और अन्य उत्पादों को भी कर राहत का लाभ मिलेगा। इससे विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) के लिए नए अवसर पैदा होंगे।

इंजीनियरिंग और ऑटो कंपोनेंट्स सेक्टर को भी बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। भारतीय मशीनरी, औद्योगिक उपकरण और ऑटो पार्ट्स पर ब्रिटेन ने आयात शुल्क समाप्त कर दिया है। इससे पुणे, चेन्नई, गुरुग्राम और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों से होने वाले निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। साथ ही भारत, ब्रिटेन और यूरोप के बीच सप्लाई चेन को भी मजबूती मिलेगी।

फार्मास्यूटिकल उद्योग के लिए भी यह समझौता अहम साबित होगा। भारतीय जेनेरिक दवाओं के लिए ब्रिटेन में रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को सरल बनाया जाएगा, जिससे वहां की स्वास्थ्य सेवाओं में भारतीय दवाओं की पहुंच आसान होगी। मेडिकल उपकरणों के निर्यात को भी इससे बढ़ावा मिलने की संभावना है।

कृषि और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र भी इस समझौते से लाभान्वित होंगे। बासमती चावल, चाय, मसाले, झींगा और अन्य समुद्री उत्पादों पर ब्रिटेन का आयात शुल्क समाप्त होने से भारतीय किसानों और निर्यातकों को बड़ा बाजार मिलेगा। असम की चाय, गुजरात और केरल के समुद्री उत्पाद तथा पश्चिम बंगाल के निर्यातकों को इससे विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है।

रसायन उद्योग भी इस डील के प्रमुख लाभार्थियों में शामिल है। एग्रोकेमिकल्स, प्लास्टिक और स्पेशलिटी केमिकल्स पर शुल्क कम होने से गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से निर्यात बढ़ सकता है। सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में ब्रिटेन को होने वाले केमिकल निर्यात को दोगुना करना है।

ग्रीन एनर्जी और क्लीन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी यह समझौता महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देश सौर ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक वाहन और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े प्रोजेक्ट्स में संयुक्त निवेश और तकनीकी सहयोग बढ़ाएंगे। इससे भारत में नई तकनीकों का विकास और विदेशी निवेश दोनों को बढ़ावा मिलेगा।

विशेषज्ञों के अनुसार इस समझौते का असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। खासकर टेक्सटाइल, चमड़ा, इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नई नौकरियां सृजित होने की संभावना है। साथ ही भारत के लगभग छह करोड़ MSME को नए बाजार मिलने से उनका कारोबार और मुनाफा दोनों बढ़ सकते हैं।

आर्थिक दृष्टि से भी यह समझौता महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि इससे भारत के निर्यात में लगातार वृद्धि होगी और ब्रिटेन की कंपनियां सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाओं, ग्रीन टेक्नोलॉजी और विनिर्माण क्षेत्रों में भारत में अधिक निवेश करेंगी। इससे देश की आर्थिक वृद्धि को अतिरिक्त गति मिल सकती है।

भारत और ब्रिटेन के बीच FTA पर बातचीत जनवरी 2022 में शुरू हुई थी। कई दौर की चर्चाओं और तकनीकी वार्ताओं के बाद आखिरकार दोनों देशों ने इसे अंतिम रूप दिया। इससे पहले भारत मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) के साथ भी ऐसे समझौते कर चुका है। अब भारत यूरोपीय संघ (EU) और अमेरिका के साथ भी इसी तरह के व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाने पर जोर दे रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की व्यापार नीति अब केवल एशियाई देशों तक सीमित नहीं रह गई है। सरकार पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक साझेदारी मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है ताकि भारतीय निर्यातकों को बड़े और विकसित बाजारों तक आसान पहुंच मिल सके। भारत-UK फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को इसी व्यापक रणनीति की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में व्यापार, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।