स्कॉटलैंड के शहर ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स का भव्य समापन रविवार रात रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और भावनात्मक माहौल के बीच हुआ। 11 दिनों तक चले इस बहु-खेल आयोजन के अंत में दुनिया की निगाहें उस पल पर टिक गईं, जब आधिकारिक तौर पर अगले मेजबान भारत को 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी का प्रतीक मशाल और ध्वज सौंपा गया। इस ऐतिहासिक अवसर ने भारत के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत कर दी, क्योंकि अब अगली बार यह प्रतिष्ठित प्रतियोगिता भारतीय धरती पर आयोजित होगी।
समापन समारोह का आयोजन ग्लासगो के ओवो हाइड्रो एरिना में किया गया, जहां हजारों दर्शकों ने खेल, संस्कृति और संगीत के शानदार संगम का आनंद लिया। समारोह की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया की प्रसिद्ध गायिका डेल्टा गूडरेम की प्रस्तुति से हुई। उनके प्रदर्शन ने पूरे स्टेडियम का माहौल उत्साह से भर दिया और इसके बाद एक-एक कर कई अंतरराष्ट्रीय कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से समारोह को यादगार बना दिया।
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब आया, जब कॉमनवेल्थ स्पोर्ट्स के अध्यक्ष डॉ. डोनाल्ड रुका ने वर्ष 2030 के मेजबान देश भारत को आधिकारिक तौर पर मशाल और ध्वज सौंपा। इस दौरान भारतीय ओलंपिक आंदोलन की प्रमुख हस्तियां मंच पर मौजूद थीं। ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा, इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन की अध्यक्ष पीटी ऊषा और गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने भारत की ओर से यह सम्मान स्वीकार किया। पूरे स्टेडियम में तालियों की गूंज के बीच भारत का स्वागत किया गया।
मशाल हस्तांतरण के बाद मंच पर भारतीय संस्कृति की झलक दिखाई गई। प्रसिद्ध गायक शंकर महादेवन ने अपने सुरों से माहौल को देशभक्ति के रंग में रंग दिया। उन्होंने ‘ऐ वतन’, ‘भाग मिल्खा भाग’ और ‘परचम लहरा दो’ जैसे लोकप्रिय गीतों की प्रस्तुति दी। इस दौरान उनके साथ उनके बेटे सिद्धार्थ और शिवम भी मंच पर मौजूद रहे। गायिका भूमि त्रिवेदी ने भी अपनी आवाज़ से समारोह में भारतीय संगीत की अलग पहचान बनाई।
भारतीय संस्कृति को और प्रभावशाली बनाने के लिए सितार वादक ऋषभ रिखीराम ने अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने शिव तांडव स्तोत्र की संगीतमय प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी धुनों के साथ स्कॉटलैंड के प्रसिद्ध बैगपाइपर रॉस एंसली ने भी जुगलबंदी की। भारतीय शास्त्रीय संगीत और स्कॉटिश लोक संगीत का यह अनूठा संगम समापन समारोह के सबसे यादगार पलों में शामिल रहा।
इसके बाद वर्ष 2017 की मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर ने मंच संभाला। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ की धुन पर भारतीय शास्त्रीय और आधुनिक नृत्य का खूबसूरत मिश्रण प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि भारत केवल खेलों में ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के माध्यम से भी दुनिया को जोड़ने की क्षमता रखता है।
हालांकि समारोह में भारत के स्वागत की झलक प्रमुख रही, लेकिन स्कॉटलैंड ने भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को शानदार तरीके से दुनिया के सामने रखा। मशहूर बैंड एलीफेंट सेशंस ने लोक संगीत, फंक, रॉक और इलेक्ट्रॉनिक डांस म्यूजिक को मिलाकर एक विशेष प्रस्तुति दी। इसके अलावा विभिन्न कलाकारों ने स्कॉटिश परंपराओं और लोक संस्कृति का प्रदर्शन किया, जिससे दर्शकों को मेजबान देश की सांस्कृतिक विविधता देखने का अवसर मिला।
समारोह में नाइजीरिया के कलाकारों ने भी अपनी प्रस्तुति देकर आयोजन को अंतरराष्ट्रीय रंग प्रदान किया। विभिन्न देशों की कला और संगीत ने यह संदेश दिया कि कॉमनवेल्थ गेम्स केवल खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता और वैश्विक मित्रता का भी मंच है।
समापन समारोह के दौरान खेल भावना का सम्मान भी किया गया। पैरा एथलीट मेलानी वुड्स को प्रतिष्ठित डेविड डिक्सन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ-साथ खेल भावना के लिए दिया गया। महिलाओं की टी54 1500 मीटर स्पर्धा में रेस के दौरान धावकों के गिरने की घटना के बाद उन्होंने निष्पक्षता की मांग करते हुए प्रतियोगिता दोबारा कराने की अपील की थी। दोबारा आयोजित रेस में उन्होंने रिकॉर्ड समय के साथ स्वर्ण पदक जीतकर अपने साहस और खेल भावना का शानदार उदाहरण पेश किया।
भारत के लिए यह अवसर कई मायनों में ऐतिहासिक है। वर्ष 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स अपने 100 वर्ष पूरे करेंगे। पहली बार इस प्रतियोगिता का आयोजन 1930 में कनाडा के हैमिल्टन शहर में हुआ था। शताब्दी वर्ष में इन खेलों की मेजबानी भारत को मिलना देश के खेल इतिहास के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
भारत इससे पहले वर्ष 2010 में भी कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी कर चुका है। उस समय सभी प्रतियोगिताएं नई दिल्ली में आयोजित की गईं थीं। अब लगभग दो दशक बाद एक बार फिर भारत इस प्रतिष्ठित आयोजन की मेजबानी करेगा। उम्मीद की जा रही है कि 2030 के खेल आधुनिक तकनीक, बेहतर खेल सुविधाओं और विश्वस्तरीय आयोजन के नए मानक स्थापित करेंगे।
कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास पर नजर डालें तो ऑस्ट्रेलिया सबसे अधिक पांच बार इन खेलों की मेजबानी कर चुका है। वहीं कनाडा और स्कॉटलैंड चार-चार बार इस आयोजन का आयोजन कर चुके हैं। भारत अब दूसरी बार मेजबान बनने जा रहा है, जिससे वह उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जिन्होंने एक से अधिक बार इस प्रतियोगिता की मेजबानी की है।
ग्लासगो में आयोजित इस संस्करण के दौरान खिलाड़ियों ने कई यादगार प्रदर्शन किए और अनेक नए रिकॉर्ड भी बने। समापन समारोह में उन उपलब्धियों को भी याद किया गया, जिन्होंने पूरे टूर्नामेंट को खास बनाया। खिलाड़ियों की मेहनत, दर्शकों का उत्साह और मेजबान शहर की शानदार व्यवस्था की सराहना की गई।
भारत को मशाल और ध्वज सौंपे जाने के साथ ही अब दुनिया की निगाहें वर्ष 2030 पर टिक गई हैं। आने वाले वर्षों में भारत के सामने विश्वस्तरीय खेल आयोजन की तैयारियों, आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास, खिलाड़ियों के लिए सुविधाओं के विस्तार और करोड़ों खेल प्रेमियों की उम्मीदों पर खरा उतरने की बड़ी चुनौती होगी। साथ ही यह अवसर भारत के पर्यटन, सांस्कृतिक विरासत और खेल क्षमता को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करने का भी सुनहरा मौका माना जा रहा है।
ग्लासगो की विदाई और भारत के स्वागत के साथ कॉमनवेल्थ गेम्स का यह अध्याय समाप्त हो गया, लेकिन अब एक नई यात्रा शुरू हो चुकी है। अगले संस्करण की मेजबानी के लिए भारत ने आधिकारिक तौर पर जिम्मेदारी संभाल ली है। शताब्दी वर्ष में आयोजित होने वाले 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर अब देशभर में उत्सुकता बढ़ने लगी है और खेल जगत को उम्मीद है कि भारत इस आयोजन को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।




