नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन का समापन कई मायनों में भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में हुआ। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युद्ध, व्यापारिक तनाव और भू-राजनीतिक खींचतान के बीच भारत ने सदस्य देशों को एक साझा घोषणा पत्र पर सहमत कराने में सफलता हासिल की। यह उपलब्धि इसलिए भी अहम है क्योंकि BRICS के भीतर शामिल देशों के हित और वैश्विक मुद्दों पर उनके नजरिए कई मामलों में एक-दूसरे से अलग हैं।
भारत की अध्यक्षता में हुए इस दो दिवसीय सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच लंबे विचार-विमर्श के बाद ‘नई दिल्ली घोषणा पत्र 2026’ को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। सम्मेलन में पश्चिम एशिया की स्थिति, रूस-यूक्रेन संघर्ष, वैश्विक व्यापार, आतंकवाद, संयुक्त राष्ट्र में सुधार, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई।
भारत के लिए सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल घोषणा पत्र को मंजूर करवाना नहीं रही, बल्कि अलग-अलग मत रखने वाले देशों को बातचीत की मेज पर बनाए रखना भी रहा। यही वजह है कि इस पूरे आयोजन को भारतीय कूटनीति की संवाद और संतुलन वाली नीति की बड़ी परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है।
दुनिया के तनावपूर्ण माहौल में भारत ने संभाली कमान
18वें BRICS सम्मेलन के समय अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाया हुआ है। रूस-यूक्रेन युद्ध अपने चौथे वर्ष में पहुंच चुका है, जबकि अमेरिका की बदलती टैरिफ नीतियों ने वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था को लेकर अनिश्चितता बढ़ाई है।
ऐसे माहौल में BRICS जैसे समूह के सभी देशों को एक साझा दस्तावेज पर सहमत कराना आसान नहीं था। अलग-अलग देशों के रणनीतिक और आर्थिक हित कई मुद्दों पर टकराते हैं। इसके बावजूद भारत ने बातचीत को आगे बढ़ाया और किसी एक पक्ष के नजरिए को थोपने के बजाय ऐसी भाषा पर जोर दिया जिसे अधिकतम सदस्य स्वीकार कर सकें।
इससे पहले 2023 में भारत की अध्यक्षता में हुए G20 शिखर सम्मेलन में भी इसी तरह की स्थिति सामने आई थी। उस समय भी वैश्विक स्तर पर गंभीर मतभेदों के बावजूद नई दिल्ली घोषणा पर सहमति बनी थी। BRICS सम्मेलन में भारत ने उसी कूटनीतिक अनुभव को एक बार फिर इस्तेमाल किया।
ईरान और यूएई के बीच भारत बना संवाद का सेतु
BRICS बैठक के दौरान सबसे जटिल मुद्दों में पश्चिम एशिया का संकट शामिल रहा। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच इस मुद्दे पर मतभेद इतने गंभीर थे कि इससे पहले मई में साझा बयान जारी करने में भी मुश्किल आई थी।
नई दिल्ली में भारत ने दोनों पक्षों के बीच बातचीत का रास्ता खुला रखने की कोशिश की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के स्तर पर भी संपर्क जारी रहा और दूसरी ओर अधिकारियों, शेरपाओं तथा घोषणा पत्र तैयार करने वाली टीमों के बीच लगातार चर्चा चलती रही।
वार्ताओं का दौर कई घंटों तक चलता रहा और मसौदे की भाषा पर अलग-अलग सुझावों को शामिल करते हुए बीच का रास्ता तलाशा गया। अंत में ऐसी शब्दावली तैयार की गई जिस पर सदस्य देशों के बीच सहमति बन सकी।
घोषणा पत्र में पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर चिंता जताई गई। साथ ही संयम बरतने, आम नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे की रक्षा करने, देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने तथा बातचीत और कूटनीति के माध्यम से स्थायी समाधान खोजने की बात कही गई।
एक महत्वपूर्ण तरीका यह अपनाया गया कि जिन देशों को किसी विशेष देश का नाम लेने पर आपत्ति थी, उनके लिए घोषणा पत्र में सीधे किसी देश को निशाना बनाने वाली भाषा से बचा गया। इससे सहमति बनाने में मदद मिली।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद के बीच सीधे संवाद का अवसर भी महत्वपूर्ण माना गया। भारत की कोशिश रही कि मतभेदों के बावजूद बातचीत पूरी तरह बंद न हो।
आतंकवाद पर भारत को मिला अहम समर्थन
BRICS घोषणा पत्र में आतंकवाद का मुद्दा भी भारत के लिए खास महत्व रखता है। दस्तावेज में आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा की गई और पहलगाम आतंकी हमले का भी उल्लेख किया गया।
भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट और सामूहिक कार्रवाई की मांग करता रहा है। ऐसे में BRICS जैसे प्रभावशाली समूह के दस्तावेज में इस मुद्दे का शामिल होना नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत ने सम्मेलन के दौरान यह संदेश भी देने की कोशिश की कि आतंकवाद को किसी भी आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग और प्रभावी कार्रवाई को भारत अपनी विदेश नीति के प्रमुख मुद्दों में रखता आया है।
ग्लोबल साउथ पर मोदी का फोकस
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS बैठक में विकासशील देशों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी। उनका कहना था कि ग्लोबल साउथ के देश अंतरराष्ट्रीय संकटों का सबसे ज्यादा असर झेलते हैं, लेकिन वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनकी हिस्सेदारी अभी भी अपेक्षाकृत कम है।
मोदी ने विकासशील देशों की भूमिका को केवल दूसरे देशों द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करने तक सीमित रखने के बजाय उन्हें नियम बनाने की प्रक्रिया में शामिल करने की जरूरत बताई।
भारत की ओर से इस मुद्दे को लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया जाता रहा है। BRICS के मंच से भी भारत ने विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने की कोशिश की। इसके पीछे भारत का व्यापक उद्देश्य वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी की मांग को आगे बढ़ाना रहा।
संयुक्त राष्ट्र में सुधार और भारत की भूमिका
सम्मेलन की घोषणा में संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया गया। भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका दिए जाने के समर्थन को दस्तावेज में जगह मिली।
भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद के विस्तार और उसमें विकासशील देशों की बेहतर भागीदारी की मांग करता रहा है। इसलिए BRICS के साझा दस्तावेज में इस मुद्दे का उल्लेख नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक दृष्टि से अहम रहा।
यह समर्थन केवल भारत की दावेदारी तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक संबंध उस बहस से भी है जिसमें मौजूदा वैश्विक संस्थाओं को आज की बदलती दुनिया के अनुरूप बनाने की मांग की जा रही है।
अर्थव्यवस्था और स्थानीय मुद्रा में कारोबार
BRICS घोषणा में आर्थिक मामलों से जुड़े भारत के कई प्राथमिक मुद्दे भी सामने आए। सदस्य देशों ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में काम करने पर सहमति जताई।
एकतरफा व्यापार प्रतिबंधों और जबरन आर्थिक उपायों का विरोध भी घोषणा का हिस्सा बना। वैश्विक व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद और टैरिफ के दौर में यह मुद्दा खास महत्व रखता है।
स्थानीय मुद्राओं में कारोबार को बढ़ावा देने से सदस्य देशों के बीच व्यापार में डॉलर पर निर्भरता कम करने की संभावनाओं पर भी चर्चा आगे बढ़ती है। भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अधिक विविध और लचीली भुगतान व्यवस्था के पक्ष में रहा है।
दुर्लभ खनिज और नई तकनीक भी एजेंडे में
BRICS बैठक केवल युद्ध और भू-राजनीतिक विवादों तक सीमित नहीं रही। भारत ने भविष्य की अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों को भी चर्चा के केंद्र में रखा।
महत्वपूर्ण और दुर्लभ खनिजों की विश्वसनीय आपूर्ति शृंखला को लेकर सहयोग की जरूरत पर जोर दिया गया। इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा और आधुनिक उद्योगों के विस्तार के दौर में ऐसे खनिजों की अहमियत तेजी से बढ़ रही है।
इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के वैश्विक शासन और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे जैसे विषय भी घोषणा पत्र में शामिल हुए। भारत इन क्षेत्रों में अपने अनुभव और डिजिटल मॉडल को अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए महत्वपूर्ण मानता है।
गाजा में मानवीय सहायता, संघर्ष विराम और दो-राष्ट्र समाधान की जरूरत का भी दस्तावेज में उल्लेख किया गया। इसके अलावा नागरिक परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों तथा परमाणु जोखिम बढ़ने को लेकर चिंता व्यक्त की गई।
चीन को अगली अध्यक्षता, बीजिंग में अगली मुलाकात
नई दिल्ली सम्मेलन के बाद BRICS की अगली महत्वपूर्ण मंजिल चीन होगी। समूह ने 2027 की अध्यक्षता के लिए चीन का समर्थन किया और अगले शिखर सम्मेलन के आयोजन का रास्ता साफ किया।
यह फैसला ऐसे समय में हुआ है जब भारत और चीन के बीच कई रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद मौजूद हैं। इसके बावजूद BRICS के मंच पर दोनों देशों ने समूह की निरंतरता को बनाए रखने का संकेत दिया।
भारत के लिए यह संदेश भी अहम है कि मतभेदों के बावजूद बहुपक्षीय मंचों पर संवाद के रास्ते बंद नहीं होने चाहिए। दिल्ली में सहमति बनाने के बाद अब अगले वर्ष BRICS की बैठक बीजिंग में होगी।
पुतिन से लेकर शी तक, भारत की मेजबानी की सराहना
सम्मेलन के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय टीम को सफल आयोजन तथा आतिथ्य के लिए धन्यवाद दिया। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान सहित अन्य नेताओं ने भी भारत की मेजबानी की सराहना की।
चीनी मीडिया में भी सम्मेलन के आयोजन और भारत की भूमिका को सकारात्मक तरीके से पेश किया गया। इससे संकेत मिलता है कि भारत केवल मेजबान की भूमिका में नहीं रहा, बल्कि उसने BRICS के भीतर संवाद बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाई।
भारत के लिए असली उपलब्धि क्या रही?
18वें BRICS सम्मेलन का सबसे बड़ा संदेश यह रहा कि गहरे मतभेदों वाले समूह में भी बातचीत के जरिए साझा जमीन तैयार की जा सकती है। भारत ने पश्चिम एशिया के संकट से लेकर आतंकवाद, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और आर्थिक सहयोग तक कई मुद्दों को अपने प्राथमिक एजेंडे से जोड़ा।
पहलगाम हमले का उल्लेख, भारत और ब्राजील के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक भूमिका का समर्थन, दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती देना—ये सभी बिंदु नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण रहे।
सबसे अहम बात यह रही कि भारत ने BRICS में मौजूद मतभेदों को खत्म करने का दावा नहीं किया, बल्कि उन मतभेदों के बावजूद संवाद जारी रखने और सहमति बनाने का रास्ता दिखाया। दिल्ली में सफल आयोजन के बाद अब नजरें बीजिंग पर हैं, जहां 2027 में BRICS की अगली बैठक होगी। ऐसे में भारत की अध्यक्षता को समूह के भीतर संवाद, संतुलन और सहमति की अपनी क्षमता दिखाने के एक महत्वपूर्ण अवसर के तौर पर देखा जा सकता है।




