क्या आप जानते हैं: पिछले 5 साल में गर्मी से देश में कितनी मौतें हुईं? जानिए किन राज्यों पर पड़ा सबसे ज्यादा असर

क्या आप जानते हैं: पिछले 5 साल में गर्मी से देश में कितनी मौतें हुईं? जानिए किन राज्यों पर पड़ा सबसे ज्यादा असर

देश में बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम से जुड़ी परेशानी नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही है। हर साल गर्मियों के मौसम में तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है और लंबे समय तक चलने वाली गर्म हवाएं यानी हीटवेव (Heatwave) लोगों के जीवन पर सीधा असर डाल रही हैं।

देश के कई हिस्सों में गर्मी का असर इतना बढ़ गया है कि दिन के समय बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है। राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों में तापमान 43 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तक पहुंच चुका है। लगातार बढ़ते तापमान को देखते हुए मौसम विभाग (IMD) समय-समय पर लोगों को सतर्क रहने की सलाह देता है और कई क्षेत्रों में येलो, ऑरेंज या रेड अलर्ट जारी किए जाते हैं।

गर्मी का सबसे ज्यादा खतरा बुजुर्गों, बच्चों, मजदूरों, खुले में काम करने वाले लोगों और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को होता है। तेज गर्मी के कारण शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट की कमी, लू लगना, डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।

पिछले पांच साल में हजारों लोगों की गई जान

गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 से 2022 के बीच देशभर में हीटवेव के कारण 3,798 लोगों की मौत दर्ज की गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि भीषण गर्मी हर साल बड़ी संख्या में लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। गर्मी से होने वाली मौतों में कई मामले सीधे तौर पर हीट स्ट्रोक से जुड़े होते हैं, जबकि कुछ मामलों में अत्यधिक तापमान के कारण पहले से मौजूद बीमारियां और गंभीर हो जाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान, बदलते मौसम चक्र और शहरी क्षेत्रों में बढ़ते कंक्रीट निर्माण के कारण गर्मी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा मौतें दर्ज

राज्यों के आंकड़ों पर नजर डालें तो महाराष्ट्र उन राज्यों में सबसे अधिक प्रभावित रहा, जहां 2018 से 2022 के बीच हीटवेव के कारण 470 लोगों की मौत दर्ज की गई।

महाराष्ट्र में वर्ष 2019 विशेष रूप से गंभीर रहा। इस दौरान राज्य में गर्मी के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्र गर्मी के लिए पहले से संवेदनशील माने जाते हैं, जहां गर्मियों में तापमान काफी अधिक पहुंच जाता है।

इन क्षेत्रों में ग्रामीण इलाकों में खुले स्थानों पर काम करने वाले लोगों को सबसे ज्यादा जोखिम रहता है।

उत्तर प्रदेश और बिहार में भी गंभीर स्थिति

हीटवेव से प्रभावित राज्यों में उत्तर प्रदेश और बिहार भी प्रमुख रूप से शामिल रहे।

आंकड़ों के अनुसार—

  • उत्तर प्रदेश में लगभग 508 मौतें दर्ज की गईं।
  • बिहार में करीब 467 लोगों की जान गर्मी के कारण गई।

बिहार में वर्ष 2019 के दौरान स्थिति काफी गंभीर रही, जब बड़ी संख्या में लोगों की मौत हीटवेव से जुड़ी बताई गई।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े आबादी वाले राज्य में भीषण गर्मी का असर इसलिए ज्यादा देखने को मिलता है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में लोग कृषि, निर्माण कार्य और अन्य खुले क्षेत्रों में काम करते हैं।

पंजाब में भी गर्मी बनी बड़ी चुनौती

पंजाब भी हीटवेव से प्रभावित राज्यों में शामिल रहा है।

आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 से 2022 के बीच पंजाब में 459 लोगों की मौत गर्मी के कारण दर्ज की गई।

पंजाब में गर्मी का असर खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों पर अधिक पड़ता है। किसान और खेतों में काम करने वाले मजदूर लंबे समय तक धूप में रहते हैं, जिससे लू लगने और शरीर में पानी की कमी का खतरा बढ़ जाता है।

इसके अलावा गर्मी के कारण फसलों पर भी असर पड़ सकता है, जिससे कृषि क्षेत्र को आर्थिक नुकसान की संभावना रहती है।

दक्षिण और पूर्वी भारत के राज्यों पर भी असर

हीटवेव का प्रभाव केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं है। देश के कई दक्षिणी और पूर्वी राज्यों में भी गर्मी के कारण मौतें दर्ज की गई हैं।

तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में भी गर्म हवाओं के कारण कई लोगों की जान गई।

इन क्षेत्रों में गर्मी के साथ-साथ नमी का स्तर भी अधिक रहता है, जिससे शरीर को तापमान नियंत्रित करने में परेशानी होती है। ऐसी स्थिति में हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में कम असर

कुछ पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में गर्मी से होने वाली मौतों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही।

इसका मुख्य कारण वहां का भौगोलिक वातावरण और अपेक्षाकृत ठंडा मौसम माना जाता है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के कारण अब पहाड़ी क्षेत्रों में भी तापमान बढ़ने की घटनाएं सामने आ रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में ऐसे क्षेत्रों में भी गर्मी से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं पर ध्यान देना जरूरी होगा।

हीटवेव कैसे घोषित की जाती है?

मौसम विभाग (IMD) तापमान और सामान्य औसत के बीच अंतर के आधार पर हीटवेव की घोषणा करता है।

मैदानी इलाकों में सामान्य तौर पर—

  • जब अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच जाता है, तो हीटवेव की स्थिति बन सकती है।
  • यदि तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाए, तो इसे हीटवेव की श्रेणी में रखा जाता है।
  • तापमान सामान्य से 6.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ने पर गंभीर हीटवेव मानी जाती है।

तटीय और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए मानक अलग हो सकते हैं, क्योंकि वहां मौसम की परिस्थितियां अलग होती हैं।

गर्मी से मौतों का सबसे बड़ा कारण क्या है?

तेज गर्मी का असर शरीर की प्राकृतिक तापमान नियंत्रण प्रणाली पर पड़ता है।

जब शरीर ज्यादा गर्म हो जाता है और वह अपना तापमान सामान्य नहीं रख पाता, तो कई गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

हीटवेव के दौरान होने वाली प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएं—

हीट स्ट्रोक

यह गर्मी से जुड़ी सबसे गंभीर स्थिति है। इसमें शरीर का तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है और समय पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा हो सकता है।

डिहाइड्रेशन

अत्यधिक पसीना आने के कारण शरीर में पानी और जरूरी खनिजों की कमी हो सकती है।

थकावट और कमजोरी

लंबे समय तक गर्मी में रहने से शरीर कमजोर महसूस कर सकता है और चक्कर आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

हृदय और सांस संबंधी समस्याएं

अत्यधिक तापमान पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा सकता है।

गर्मी से बचाव के लिए क्या करें?

विशेषज्ञ गर्मी के मौसम में कुछ सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं—

  • दोपहर के समय अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से बचें।
  • पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
  • हल्के और सूती कपड़े पहनें।
  • धूप में निकलते समय सिर को ढकें।
  • बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें।
  • बाहर काम करने वाले लोग बीच-बीच में आराम करें।
  • शरीर में पानी की कमी महसूस होने पर तुरंत तरल पदार्थ लें।

बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन का संबंध

वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनिया भर में बढ़ता तापमान जलवायु परिवर्तन का परिणाम है।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण गर्म दिनों की संख्या बढ़ रही है और कई क्षेत्रों में लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव की घटनाएं अधिक देखने को मिल रही हैं।

शहरों में स्थिति और गंभीर हो सकती है क्योंकि कंक्रीट की इमारतें और कम हरियाली के कारण तापमान अधिक महसूस होता है। इसे अक्सर अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव कहा जाता है।

सरकार और प्रशासन की भूमिका

हीटवेव के बढ़ते खतरे को देखते हुए कई राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन गर्मी से बचाव के लिए योजनाएं लागू कर रहे हैं।

इनमें शामिल हैं—

  • हीट एक्शन प्लान तैयार करना।
  • लोगों को जागरूक करना।
  • अस्पतालों में विशेष व्यवस्था करना।
  • सार्वजनिक स्थानों पर पानी की सुविधा उपलब्ध कराना।
  • खुले में काम करने वाले श्रमिकों के लिए समय में बदलाव करना।

आने वाले वर्षों में बढ़ सकता है खतरा

पिछले वर्षों के आंकड़े संकेत देते हैं कि गर्मी से जुड़ी समस्याएं आने वाले समय में और गंभीर हो सकती हैं।

बढ़ते तापमान, बदलते मौसम पैटर्न और लगातार बढ़ते शहरीकरण के कारण हीटवेव अब एक मौसमी घटना से आगे बढ़कर सार्वजनिक स्वास्थ्य का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

लोगों में जागरूकता, समय पर चेतावनी प्रणाली और प्रशासनिक तैयारियां गर्मी से होने वाले नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।