चीन के ‘न्यूक्लियर टैंक’ का खाका तैयार, 450 किमी तक निशाना साधने वाली रेलगन का दावा

चीन के ‘न्यूक्लियर टैंक’ का खाका तैयार, 450 किमी तक निशाना साधने वाली रेलगन का दावा

चीन के सैन्य शोधकर्ताओं ने भविष्य के युद्धक्षेत्र को ध्यान में रखते हुए एक ऐसे टैंक की अवधारणा पेश की है, जो पारंपरिक युद्धक टैंकों से काफी अलग हो सकता है। प्रस्तावित वाहन को परमाणु ऊर्जा से संचालित करने के साथ-साथ उस पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेलगन लगाने की योजना बताई गई है। शोध के मुताबिक, इस सिस्टम की प्रोजेक्टाइल लॉन्चिंग स्पीड करीब 3.5 किलोमीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकती है और सैद्धांतिक रूप से यह लगभग 450 किलोमीटर दूर मौजूद लक्ष्य तक गोला पहुंचाने में सक्षम हो सकती है।

हालांकि, इस खबर को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन ने अभी ऐसा कोई टैंक तैयार करके सैन्य सेवा में शामिल नहीं किया है। यह फिलहाल एक शोध और डिजाइन अवधारणा है, जिसमें भविष्य में इस्तेमाल की जा सकने वाली तकनीकों को एक ही प्लेटफॉर्म पर जोड़ने की संभावना का अध्ययन किया गया है।

इस प्रस्ताव ने इसलिए भी ध्यान खींचा है क्योंकि इसमें एक भारी मुख्य युद्धक टैंक, परमाणु ऊर्जा और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हथियार को एक साथ इस्तेमाल करने की कल्पना की गई है। चीन और भारत के बीच लंबे समय से जारी सैन्य प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में ऐसी तकनीकी परियोजनाओं को रणनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है।

चीनी शोधकर्ताओं ने पेश किया भविष्य के टैंक का डिजाइन

इस कॉन्सेप्ट से जुड़ी जानकारी चीन के रक्षा क्षेत्र से संबंधित जर्नल Acta Armamentarii में प्रकाशित एक शोधपत्र से सामने आई है। रिपोर्टों के अनुसार, इस अध्ययन में Inner Mongolia First Machinery Group और Beijing Institute of Technology से जुड़े शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया था।

Inner Mongolia First Machinery Group चीन के रक्षा उद्योग में बख्तरबंद वाहनों और सैन्य उपकरणों के विकास से जुड़ी संस्था है। शोध परियोजना को National Key Laboratory of Special Vehicle Design and Manufacturing Integration Technology के तहत वित्तीय समर्थन मिलने की जानकारी भी सामने आई है।

शोध में एक ऐसे मोबाइल प्लेटफॉर्म की कल्पना की गई है जो लंबे समय तक ऊर्जा उपलब्ध करा सके और उसी ऊर्जा का इस्तेमाल बेहद शक्तिशाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हथियार को संचालित करने में कर सके।

60 टन के टैंक पर लगेगी विशाल रेलगन

प्रस्तावित वाहन का वजन करीब 60 टन रखने की बात कही गई है। यह वजन आधुनिक मुख्य युद्धक टैंकों की श्रेणी में आता है। लेकिन इसकी सबसे अलग विशेषता इसका मुख्य हथियार होगा।

शोध में लगभग 50 मेगाजूल क्षमता वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेलगन को टैंक के चेसिस पर लगाने की अवधारणा रखी गई है। सामान्य टैंक गन में बारूद या दूसरे रासायनिक प्रोपेलेंट का इस्तेमाल करके गोले को बैरल से बाहर निकाला जाता है। रेलगन इस प्रक्रिया से अलग तरीके से काम करती है।

इसमें विद्युत ऊर्जा से पैदा होने वाले चुंबकीय बल का उपयोग प्रोजेक्टाइल को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है। सिद्धांत रूप में इससे प्रोजेक्टाइल को पारंपरिक तोपों की तुलना में काफी ज्यादा गति दी जा सकती है।

3.5 किलोमीटर प्रति सेकंड तक पहुंच सकती है गति

शोध में प्रस्तावित रेलगन के लिए लगभग 3.5 किलोमीटर प्रति सेकंड की अधिकतम शुरुआती गति का अनुमान लगाया गया है। सामान्य भाषा में देखें तो यह करीब 12,600 किलोमीटर प्रति घंटे के बराबर है।

इतनी अधिक गति का सीधा संबंध प्रोजेक्टाइल की गतिज ऊर्जा से है। किसी वस्तु की गति बढ़ने के साथ उसकी गतिज ऊर्जा भी काफी बढ़ जाती है। इसी सिद्धांत के आधार पर रेलगन से छोड़े गए प्रोजेक्टाइल में बिना पारंपरिक विस्फोटक वारहेड के भी भारी प्रभाव पैदा करने की क्षमता की कल्पना की जाती है।

हालांकि, 3.5 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति अभी प्रस्तावित डिजाइन का हिस्सा है। इसे वास्तविक युद्धक्षेत्र में हासिल की गई क्षमता नहीं माना जा सकता।

450 किलोमीटर की रेंज ने खींचा ध्यान

इस चीनी अवधारणा की सबसे ज्यादा चर्चा इसकी संभावित रेंज को लेकर हो रही है। शोध के आधार पर रिपोर्टों में लगभग 450 किलोमीटर तक की सैद्धांतिक मारक क्षमता का उल्लेख किया गया है।

यह दूरी किसी सामान्य मुख्य युद्धक टैंक की प्रभावी फायरिंग रेंज से कई गुना अधिक होगी। मौजूदा टैंकों का इस्तेमाल आम तौर पर अपेक्षाकृत कम दूरी पर जमीनी लक्ष्यों के खिलाफ किया जाता है, जबकि 450 किलोमीटर की क्षमता वाला प्लेटफॉर्म युद्धक्षेत्र में एक अलग भूमिका निभा सकता है।

लेकिन यहां भी यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 450 किलोमीटर का आंकड़ा अभी वास्तविक परीक्षण से प्रमाणित क्षमता नहीं है। यह शोधकर्ताओं की तकनीकी गणना और प्रस्तावित सिस्टम के मॉडल पर आधारित संभावित क्षमता है।

परमाणु ऊर्जा की जरूरत क्यों पड़ रही है?

इस पूरे प्रोजेक्ट में परमाणु ऊर्जा को शामिल करने का मुख्य कारण रेलगन की भारी बिजली आवश्यकता है। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हथियार को फायर करने के दौरान बहुत बड़ी मात्रा में विद्युत ऊर्जा को बेहद कम समय में उपलब्ध कराना पड़ता है।

रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित अंतिम संस्करण में लगभग 10 मेगावाट क्षमता वाले छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMR का इस्तेमाल करने की कल्पना की गई है। इसका उद्देश्य टैंक को लंबे समय तक बिजली उपलब्ध कराना होगा।

परमाणु रिएक्टर लगातार ऊर्जा पैदा कर सकता है, लेकिन रेलगन को फायरिंग के क्षण में अत्यधिक तेज गति से ऊर्जा चाहिए। इसलिए रिएक्टर के साथ ऊर्जा भंडारण और पावर मैनेजमेंट सिस्टम की भी जरूरत होगी। सुपरकैपेसिटर और फ्लाईव्हील जैसी तकनीकों को इस तरह की व्यवस्था में इस्तेमाल करने की संभावना बताई गई है।

शुरुआत में डीजल पावर से हो सकता है परीक्षण

शोध में सीधे परमाणु ऊर्जा से चलने वाले टैंक को विकसित करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ने की अवधारणा बताई गई है।

पहले चरण में मौजूदा बख्तरबंद वाहन पर अपेक्षाकृत कम क्षमता वाली रेलगन लगाकर तकनीक को परखा जा सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक, शुरुआती मॉडल में लगभग 10 मेगाजूल की रेलगन और करीब 150 किलोमीटर की सैद्धांतिक रेंज का लक्ष्य रखा गया है।

इस शुरुआती वाहन के लिए परमाणु रिएक्टर के बजाय लगभग 1,500 हॉर्सपावर का डीजल जनरेटर इस्तेमाल किए जाने की संभावना बताई गई है। इसका उद्देश्य पहले रेलगन, ऊर्जा भंडारण और मोबाइल प्लेटफॉर्म के बीच तालमेल को समझना होगा।

2035 से 2045 के बीच अगला चरण

तकनीक के दूसरे चरण में रेलगन की ऊर्जा और मारक क्षमता को बढ़ाने की योजना बताई गई है। रिपोर्टों के अनुसार, 2035 से 2045 के बीच लगभग 300 किलोमीटर की रेंज हासिल करने वाले सिस्टम की दिशा में काम करने की कल्पना की गई है।

इसके बाद ही परमाणु ऊर्जा वाले अंतिम संस्करण की ओर बढ़ने का विचार है। इस रोडमैप के अनुसार, पूर्ण क्षमता वाला परमाणु-संचालित टैंक 2045 के बाद की तकनीकी परियोजना हो सकता है।

इसका अर्थ है कि यह कोई ऐसा हथियार नहीं है जिसे चीन निकट भविष्य में युद्धक्षेत्र में उतारने जा रहा है। इसके लिए अभी कई तकनीकी चरण पूरे करने बाकी हैं।

परमाणु रिएक्टर को टैंक में फिट करना सबसे बड़ी चुनौती

किसी परमाणु रिएक्टर को एक भारी वाहन में स्थापित करना अपने आप में जटिल इंजीनियरिंग चुनौती है। रिएक्टर के लिए जगह सीमित होगी और उसके आसपास रेडिएशन से सुरक्षा देने वाली शील्डिंग भी लगानी होगी।

शोध से संबंधित रिपोर्टों में रिएक्टर को बेहद सीमित जगह में रखने और रेडिएशन शील्डिंग का वजन नियंत्रित रखने जैसी आवश्यकताओं का उल्लेख किया गया है। इसके साथ रिएक्टर को युद्धक्षेत्र में होने वाले झटकों, कंपन और अचानक होने वाले नुकसान से सुरक्षित रखना भी जरूरी होगा।

एक टैंक सामान्य परिस्थितियों में नहीं चलता। उसे ऊबड़-खाबड़ इलाकों, तेज गति, भारी कंपन और संभावित दुश्मन हमलों के बीच काम करना पड़ता है। ऐसे वातावरण में परमाणु ऊर्जा प्रणाली को सुरक्षित बनाए रखना साधारण इंजन की तुलना में कहीं अधिक कठिन होगा।

रेलगन के सामने भी कई तकनीकी अड़चनें

रेल तकनीक से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या केवल प्रोजेक्टाइल को तेज गति देना नहीं है। इतनी ऊर्जा को नियंत्रित करना, उसे सुरक्षित रूप से स्टोर करना और फायरिंग के दौरान सही समय पर रिलीज करना भी बड़ी चुनौती है।

इसके अलावा रेल और प्रोजेक्टाइल पर अत्यधिक तापीय तथा यांत्रिक दबाव पड़ सकता है। बार-बार फायरिंग के दौरान हथियार की संरचनात्मक मजबूती और बैरल की उम्र भी महत्वपूर्ण सवाल बन जाते हैं।

यही वजह है कि दुनिया के कई देशों में रेलगन पर लंबे समय से शोध होने के बावजूद इसे बड़े पैमाने पर ऑपरेशनल हथियार के रूप में अपनाना आसान नहीं रहा है।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

चीन और भारत के बीच लंबी वास्तविक सीमा होने के कारण बीजिंग की नई सैन्य तकनीक पर भारत की नजर रहना स्वाभाविक है। यदि भविष्य में इतनी लंबी दूरी और इतनी अधिक गति वाली मोबाइल रेलगन वास्तविक रूप से विकसित हो जाती है, तो इससे जमीनी युद्ध की पारंपरिक अवधारणाओं पर असर पड़ सकता है।

लेकिन मौजूदा स्थिति में इसे भारत के खिलाफ तैयार या तैनात हथियार कहना सही नहीं होगा। 450 किलोमीटर की रेंज और 3.5 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति अभी शोध में प्रस्तावित तकनीकी क्षमता है। इसे वास्तविक परिस्थितियों में साबित करने के लिए व्यापक परीक्षण आवश्यक होंगे।

भारत भी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेलगन तकनीक पर शोध कर चुका है। DRDO से संबंधित दस्तावेजों में इस क्षेत्र में किए गए विकास और परीक्षण कार्यों का उल्लेख मिलता है।

फिलहाल कागज पर है चीन का ‘न्यूक्लियर टैंक’

चीन का यह प्रस्ताव भविष्य के बख्तरबंद युद्ध को लेकर एक महत्वाकांक्षी तकनीकी प्रयोग के रूप में सामने आया है। इसमें परमाणु ऊर्जा से मिलने वाली लगातार बिजली, ऊर्जा भंडारण तकनीक और हाई-स्पीड इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेलगन को एक ही सैन्य वाहन में जोड़ने की कोशिश की गई है।

यदि प्रस्तावित तकनीक के सभी हिस्से सफलतापूर्वक विकसित हो जाते हैं, तो यह पारंपरिक टैंक की भूमिका को काफी बदल सकती है। लेकिन इसके रास्ते में ऊर्जा प्रबंधन, रिएक्टर सुरक्षा, वजन, शील्डिंग, हथियार की विश्वसनीयता और वास्तविक युद्धक्षेत्र में संचालन जैसी कई बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं।

इसलिए फिलहाल चीन के इस ‘न्यूक्लियर टैंक’ को एक तैयार सैन्य हथियार के बजाय भविष्य की युद्ध तकनीक से जुड़ी शोध अवधारणा के रूप में देखना ज्यादा सटीक है। 450 किलोमीटर की रेंज और 3.5 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति जैसे आंकड़े भी अभी सैद्धांतिक हैं, न कि किसी तैनात टैंक की प्रमाणित क्षमताएं।