भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर एक बार फिर देश में किसानों की चिंता बढ़ गई है। इसी मुद्दे को लेकर पंजाब समेत हरियाणा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और अन्य राज्यों के किसान दिल्ली की ओर कूच कर रहे हैं। किसान संगठनों का कहना है कि यदि इस समझौते में कृषि और डेयरी उत्पादों को शामिल करते हुए आयात शुल्क में बड़ी कटौती की गई, तो इसका सीधा असर भारतीय किसानों की आय पर पड़ेगा। इसी विरोध के तहत दिल्ली के किसान घाट पर ‘देश बचाओ मोर्चा’ के नेतृत्व में एक दिवसीय किसान महापंचायत का आयोजन किया गया है, जहां आगे की रणनीति पर चर्चा होगी।
किसान नेताओं का आरोप है कि सरकार यदि बिना व्यापक चर्चा और किसानों की राय लिए इस समझौते को लागू करती है, तो भारतीय कृषि व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। उनका कहना है कि यह केवल व्यापार का मुद्दा नहीं बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका और देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
क्या है भारत-अमेरिका प्रस्तावित ट्रेड डील?
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से व्यापारिक समझौते पर बातचीत चल रही है। इस प्रस्तावित समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात को आसान बनाना और कई वस्तुओं पर लगने वाले सीमा शुल्क (टैरिफ) को कम करना है। सरकार का मानना है कि इससे दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ेगा, निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा और उद्योगों को नए बाजार मिलेंगे।
हालांकि, किसानों की चिंता इस बात को लेकर है कि यदि इस समझौते में कृषि और डेयरी उत्पादों को भी शामिल किया गया, तो अमेरिका से आने वाले कई उत्पाद भारतीय बाजार में कम कीमत पर उपलब्ध होने लगेंगे। इससे घरेलू उत्पादकों के लिए प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो सकता है।
किसानों की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
किसान संगठनों का कहना है कि अमेरिका में कृषि क्षेत्र को सरकार की ओर से भारी आर्थिक सहायता और सब्सिडी दी जाती है। वहां आधुनिक तकनीक, बड़े पैमाने पर उत्पादन और उन्नत मशीनों के कारण खेती की लागत अपेक्षाकृत कम रहती है। ऐसे में यदि अमेरिकी उत्पाद कम शुल्क पर भारत पहुंचते हैं तो उनकी कीमत भारतीय उत्पादों से कम हो सकती है।
भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत वर्ग से आते हैं। उनके पास सीमित जमीन, सीमित संसाधन और बढ़ती लागत जैसी कई चुनौतियां पहले से मौजूद हैं। ऐसे में विदेशी सस्ते उत्पादों से मुकाबला करना उनके लिए आसान नहीं होगा। किसान नेताओं का कहना है कि इससे स्थानीय उत्पादन प्रभावित होगा और किसानों की आमदनी में गिरावट आ सकती है।
किन क्षेत्रों पर पड़ सकता है असर?
किसान संगठनों के अनुसार प्रस्तावित समझौते के लागू होने की स्थिति में सबसे ज्यादा प्रभाव कुछ खास कृषि और डेयरी क्षेत्रों पर देखने को मिल सकता है। इनमें मक्का, सोयाबीन, कपास, सेब, बादाम, डेयरी उत्पाद और पोल्ट्री उद्योग प्रमुख रूप से शामिल हैं।
उनका कहना है कि यदि इन उत्पादों का आयात तेजी से बढ़ा और विदेशी सामान कम कीमत पर उपलब्ध हुआ, तो भारतीय किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाएगा। इससे केवल किसानों की आय ही प्रभावित नहीं होगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है। कृषि आधारित छोटे उद्योग और डेयरी व्यवसाय भी दबाव में आ सकते हैं।
दिल्ली में क्यों जुट रहे हैं किसान?
इन्हीं आशंकाओं को लेकर विभिन्न राज्यों के किसान संगठनों ने दिल्ली में महापंचायत बुलाने का निर्णय लिया है। किसान घाट पर आयोजित इस एक दिवसीय कार्यक्रम में कई संगठनों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। यहां प्रस्तावित ट्रेड डील के संभावित प्रभावों पर चर्चा की जाएगी और आगे के आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
किसान नेताओं का कहना है कि सरकार को किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते पर अंतिम फैसला लेने से पहले किसानों, कृषि विशेषज्ञों और अन्य संबंधित पक्षों से विस्तृत विचार-विमर्श करना चाहिए। उनका दावा है कि कृषि क्षेत्र से जुड़े फैसले केवल आर्थिक नजरिए से नहीं बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिए जाने चाहिए।
किसान संगठनों की सरकार से क्या मांग है?
किसानों ने सरकार के सामने कई प्रमुख मांगें रखी हैं। सबसे पहले उनकी मांग है कि प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के उस स्वरूप पर पुनर्विचार किया जाए, जिसमें कृषि और डेयरी क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं। किसान चाहते हैं कि इन दोनों क्षेत्रों को समझौते से बाहर रखा जाए ताकि घरेलू उत्पादकों के हित सुरक्षित रह सकें।
इसके अलावा किसान संगठनों ने यह भी मांग की है कि ट्रेड डील से जुड़े सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं ताकि सभी संबंधित पक्ष उनकी समीक्षा कर सकें। उनका कहना है कि किसी भी बड़े आर्थिक फैसले में पारदर्शिता जरूरी है और प्रभावित वर्गों को पूरी जानकारी मिलनी चाहिए।
किसान यह भी चाहते हैं कि भविष्य में होने वाले किसी भी व्यापार समझौते से पहले किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक चर्चा की जाए। उनका मानना है कि बातचीत के जरिए ही ऐसा समाधान निकाला जा सकता है जिससे व्यापार भी बढ़े और किसानों के हित भी सुरक्षित रहें।
एमएसपी का मुद्दा भी फिर उठा
इस आंदोलन के दौरान किसान संगठनों ने एक बार फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी गारंटी देने की मांग दोहराई है। उनका कहना है कि यदि विदेशी उत्पादों का आयात बढ़ता है और बाजार में कीमतें गिरती हैं, तो एमएसपी की कानूनी सुरक्षा किसानों के लिए आर्थिक संबल का काम करेगी।
किसान नेताओं का कहना है कि लंबे समय से एमएसपी को लेकर सरकार से बातचीत चल रही है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। ऐसे में ट्रेड डील के साथ-साथ यह मुद्दा भी आंदोलन का अहम हिस्सा बना हुआ है।
सरकार का नजरिया क्या है?
सरकार की ओर से अभी तक इस प्रस्तावित व्यापार समझौते के अंतिम स्वरूप को सार्वजनिक नहीं किया गया है। हालांकि सरकार पहले भी यह कह चुकी है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते में राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।
सरकारी पक्ष का मानना है कि व्यापार समझौते से निर्यात बढ़ सकता है, निवेश आकर्षित हो सकता है और भारतीय उद्योगों को नए अवसर मिल सकते हैं। वहीं कृषि क्षेत्र से जुड़े प्रावधानों पर अंतिम निर्णय बातचीत पूरी होने के बाद ही लिया जाएगा।
विशेषज्ञ क्या मानते हैं?
आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि किसी भी मुक्त व्यापार समझौते के अपने फायदे और चुनौतियां दोनों होते हैं। यदि सही संतुलन बनाया जाए तो व्यापार बढ़ाने के साथ घरेलू उद्योगों और किसानों के हितों की रक्षा भी की जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्र में कोई भी फैसला लेने से पहले सभी पक्षों की राय लेना आवश्यक है ताकि भविष्य में विवाद की स्थिति पैदा न हो।
आगे क्या होगा?
फिलहाल किसानों की नजर सरकार की आगामी रणनीति पर टिकी हुई है। दिल्ली में आयोजित महापंचायत के बाद किसान संगठन अपने अगले कदम का ऐलान कर सकते हैं। यदि उनकी मांगों पर सकारात्मक पहल नहीं होती, तो आंदोलन को और व्यापक रूप देने की संभावना भी जताई जा रही है।
दूसरी ओर, भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते पर बातचीत जारी है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि समझौते का अंतिम स्वरूप क्या होगा और उसमें कृषि एवं डेयरी क्षेत्र को किस तरह शामिल किया जाता है। फिलहाल किसानों की सबसे बड़ी मांग यही है कि उनकी आजीविका से जुड़े किसी भी निर्णय से पहले उनकी बात सुनी जाए और ऐसा समाधान निकाला जाए जिससे व्यापारिक हितों के साथ-साथ देश के कृषि क्षेत्र की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।
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