हॉलीवुड के दिग्गज फिल्मकार क्रिस्टोफर नोलन एक बार फिर अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘द ओडिसी’ के साथ दर्शकों के बीच लौट रहे हैं। ‘द डार्क नाइट’, ‘इंसेप्शन’, ‘इंटरस्टेलर’, ‘डनकर्क’, ‘टेनेट’ और ऑस्कर विजेता फिल्म ‘ओपेनहाइमर’ जैसी यादगार फिल्मों का निर्देशन कर चुके नोलन इस बार प्राचीन यूनानी कवि होमर के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘ओडिसी’ को बड़े पर्दे पर भव्य रूप में पेश कर रहे हैं। यह फिल्म ट्रॉय के युद्ध के बाद अपने राज्य इथाका लौटने की कोशिश कर रहे नायक ओडीसियस की लगभग दस वर्षों तक चली संघर्षपूर्ण यात्रा पर आधारित है, जिसमें साहस, धैर्य, प्रेम, त्याग और आत्म-खोज की कई परतें देखने को मिलेंगी।
फिल्म की रिलीज से पहले नोलन ने एक विशेष बातचीत में इस प्रोजेक्ट की चुनौतियों, नई तकनीक, भारत से अपने जुड़ाव, भारतीय कलाकारों की संभावनाओं और फिल्म निर्माण के अपने दर्शन पर विस्तार से चर्चा की।
भारत के साथ अपने रिश्ते को याद करते हुए नोलन ने कहा कि इस देश से उनका लगाव वर्षों पुराना है। उन्होंने बताया कि पहली बार वह ‘द डार्क नाइट राइजेज’ की शूटिंग के दौरान राजस्थान के जोधपुर आए थे। उस यात्रा ने उन्हें भारतीय संस्कृति, ऐतिहासिक स्थलों और यहां के माहौल को बेहद करीब से देखने का अवसर दिया। बाद में ‘टेनेट’ की शूटिंग के लिए मुंबई आने का मौका मिला, जहां स्थानीय तकनीकी टीम और फिल्म इंडस्ट्री के साथ काम करना उनके लिए बेहद यादगार अनुभव साबित हुआ।
उन्होंने कहा कि लंबे समय से उनकी इच्छा थी कि किसी फिल्म का प्रीमियर भारत में किया जाए, क्योंकि यहां के दर्शकों का सिनेमा के प्रति जुनून पूरी दुनिया में अलग पहचान रखता है। इस बार ‘द ओडिसी’ के साथ वह सपना पूरा हो सका और उन्हें खुशी है कि दुनिया के शुरुआती देशों में भारत भी शामिल है, जहां दर्शकों को फिल्म देखने का अवसर मिला।
नोलन की पत्नी और फिल्म की निर्माता एमा थॉमस ने पहले ही इस फिल्म को उनके करियर की सबसे चुनौतीपूर्ण परियोजनाओं में से एक बताया था। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नोलन ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती कहानी का विशाल पैमाना था। उनके अनुसार, जब किसी महाकाव्य को पर्दे पर उतारने की योजना बनती है तो सबसे पहले यही सवाल सामने आता है कि इसे विश्वसनीय और प्रभावशाली तरीके से कैसे फिल्माया जाए।
उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश हमेशा यही रहती है कि दर्शक केवल फिल्म देखें नहीं, बल्कि कहानी को महसूस करें। उनका उद्देश्य था कि दर्शकों को ऐसा अनुभव हो जैसे वे स्वयं ओडीसियस की नाव पर सफर कर रहे हों या विशालकाय एक आंख वाले राक्षस साइक्लोप्स की गुफा के भीतर मौजूद हों। इसी वास्तविक अनुभव को पैदा करना इस फिल्म की सबसे कठिन चुनौती थी।
नोलन के मुताबिक, कहानी में मौजूद फैंटेसी तत्वों को भी संतुलित तरीके से पेश करना जरूरी था। उन्होंने बताया कि यदि इन कल्पनात्मक दृश्यों को जरूरत से ज्यादा बढ़ा दिया जाता तो फिल्म की वास्तविकता कमजोर पड़ सकती थी। इसलिए पूरी टीम ने यह सुनिश्चित किया कि फैंटेसी और यथार्थ के बीच ऐसा संतुलन बनाया जाए जिससे दर्शकों का भावनात्मक जुड़ाव लगातार बना रहे।
तकनीक के सवाल पर नोलन ने कहा कि सिनेमा का विकास तभी सार्थक है जब तकनीक कहानी को और अधिक प्रभावशाली बनाने में मदद करे। उन्होंने जेम्स कैमरून का उदाहरण देते हुए कहा कि ‘अवतार’ जैसी फिल्मों में नई तकनीकों का इस्तेमाल केवल दृश्य प्रभाव बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि कहानी को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने के लिए किया गया था। उनका मानना है कि हर फिल्मकार को इसी सोच के साथ तकनीक का उपयोग करना चाहिए।
उन्होंने बताया कि ‘द ओडिसी’ की शूटिंग के दौरान आईमैक्स तकनीक की क्षमताओं को नई ऊंचाई तक ले जाने की कोशिश की गई। पहले यह माना जाता था कि आईमैक्स केवल बड़े एक्शन सीक्वेंस और विशाल प्राकृतिक दृश्यों के लिए उपयुक्त है, लेकिन उनकी टीम यह जानना चाहती थी कि क्या यही तकनीक पात्रों की भावनाओं और उनके सबसे निजी पलों को भी उतनी ही प्रभावशाली तरह से दर्शा सकती है।
नोलन ने कहा कि आईमैक्स कैमरे से किसी अभिनेता की आंखों में पड़ती रोशनी, चेहरे के सूक्ष्म भाव और भावनात्मक अभिव्यक्ति को बेहद अलग तरीके से कैद किया जा सकता है। यही कारण है कि उन्होंने इस फिल्म में तकनीक का उपयोग केवल भव्यता दिखाने के लिए नहीं बल्कि पात्रों के भावनात्मक पक्ष को और गहराई देने के लिए किया।
हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि आईमैक्स तकनीक अभी पूरी तरह सुविधाजनक नहीं है। उनके अनुसार वर्तमान आईमैक्स कैमरे लगभग 136 किलोग्राम तक भारी होते हैं, जिन्हें संभालना और विभिन्न परिस्थितियों में उपयोग करना आसान नहीं होता। इसके अलावा कैमरे की फिल्म मैगजीन की क्षमता भी सीमित होती है, जिससे लंबे शॉट लेना चुनौतीपूर्ण बन जाता है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षों में इंजीनियर ऐसे हल्के और अधिक सक्षम आईमैक्स कैमरे विकसित करेंगे जिनका उपयोग ज्यादा से ज्यादा फिल्मकार कर सकेंगे। इससे अलग-अलग तरह की कहानियों को भी उसी गुणवत्ता के साथ बड़े पर्दे पर प्रस्तुत करना संभव होगा।
वर्चुअल प्रोडक्शन और कंप्यूटर जनित वातावरण के बढ़ते चलन के बावजूद नोलन ने इस फिल्म की शूटिंग कई वास्तविक देशों और प्राकृतिक लोकेशनों पर की। इस फैसले पर उन्होंने कहा कि उनके लिए वास्तविक स्थानों पर शूटिंग का अनुभव किसी भी डिजिटल सेट से अलग होता है। उनका मानना है कि दर्शक आसानी से महसूस कर लेते हैं कि स्क्रीन पर दिखाई देने वाला दृश्य वास्तव में कैमरे से शूट किया गया है या फिर पूरी तरह कंप्यूटर के जरिए बनाया गया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि विजुअल इफेक्ट्स का इस्तेमाल वह केवल वहीं करते हैं जहां उसकी वास्तविक जरूरत होती है। उनका उद्देश्य वास्तविक दृश्यों को और प्रभावशाली बनाना होता है, न कि पूरी दुनिया को कृत्रिम तरीके से तैयार करना। इसी वजह से ‘द ओडिसी’ में भी प्राकृतिक लोकेशनों और वास्तविक सिनेमैटोग्राफी को प्राथमिकता दी गई।
जब उनसे पूछा गया कि उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण फैसला कौन-सा रहा जिसने उनकी दिशा बदल दी, तो नोलन ने कहा कि वह अपनी जिंदगी को किसी एक निर्णायक मोड़ के रूप में नहीं देखते। उनके मुताबिक निर्देशन ऐसा पेशा है जिसमें हर दिन सैकड़ों और कई बार हजारों छोटे-बड़े फैसले लेने पड़ते हैं। कुछ फैसले सफल साबित होते हैं तो कुछ नहीं, लेकिन अंततः यही छोटे-छोटे निर्णय किसी फिल्म और करियर की दिशा तय करते हैं।
उन्होंने कहा कि वह अपने जीवन को लगातार आगे बढ़ती यात्रा मानते हैं, जहां हर दिन नए निर्णय लेने का अवसर मिलता है। इसलिए उनके लिए कोई एक फैसला सबसे बड़ा नहीं रहा, बल्कि निरंतर सीखते हुए आगे बढ़ना ही उनकी कार्यशैली का हिस्सा है।
भारतीय कलाकारों के वैश्विक प्रतिनिधित्व पर भी नोलन ने अपनी राय रखी। उन्होंने माना कि भारतीय कलाकारों और फिल्मकारों की प्रतिभा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं अधिक पहचान की हकदार है। उनके अनुसार पहले वितरण प्रणाली ऐसी थी कि अलग-अलग देशों की फिल्में अपने सीमित बाजारों तक ही पहुंच पाती थीं, लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है।
उन्होंने कहा कि भारतीय फिल्म ‘आरआरआर’ की अंतरराष्ट्रीय सफलता ने यह साबित कर दिया कि यदि किसी भारतीय फिल्म को वैश्विक मंच मिले तो वह दुनिया भर के दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ सकती है। खासकर अमेरिकी बाजार में मिली सफलता ने यह दिखाया कि भारतीय कहानियां अब सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व स्तर पर भी मजबूत पहचान बना सकती हैं।
नोलन का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारतीय फिल्मकारों और कलाकारों के लिए वैश्विक अवसर और भी बढ़ेंगे, क्योंकि अब दर्शक भाषा की बजाय अच्छी कहानी को अधिक महत्व देने लगे हैं।
जब उनसे पूछा गया कि ‘द ओडिसी’ बनाने के बाद उन्होंने अपने भीतर क्या नया खोजा, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि इसका जवाब अभी देना जल्दबाजी होगी। उनके अनुसार किसी भी फिल्म की असली यात्रा तब पूरी होती है जब वह दर्शकों तक पहुंचती है। फिल्म के प्रति दर्शकों की प्रतिक्रिया ही यह तय करती है कि वह अपने उद्देश्य में कितनी सफल रही।
उन्होंने कहा कि फिलहाल वह उत्सुक भी हैं और थोड़े चिंतित भी, क्योंकि अब सारी जिम्मेदारी दर्शकों पर है। फिल्म रिलीज होने के बाद ही वह यह समझ पाएंगे कि इस अनुभव ने उन्हें एक फिल्मकार और इंसान के रूप में कितना बदला।
भारत की किसी ऐतिहासिक या साहित्यिक कृति पर वैश्विक स्तर की फिल्म बनाने की संभावना के सवाल पर नोलन ने कहा कि वह भारतीय साहित्य के गहरे जानकार नहीं हैं, लेकिन उन्हें यह जानकर काफी उत्साह हुआ कि ‘ओडिसी’ और भारतीय महाकाव्यों के बीच कई वैचारिक समानताएं बताई जाती हैं। उन्होंने कहा कि वह भारतीय महाकाव्यों और साहित्य के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास है कि यहां ऐसी अनेक कालजयी कहानियां मौजूद हैं जिन्हें विश्व स्तर पर बड़े सिनेमाई रूपांतरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
नोलन ने बातचीत के अंत में दोहराया कि उनके लिए तकनीक कभी भी कहानी से बड़ी नहीं हो सकती। उनका मानना है कि सिनेमा का असली उद्देश्य दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ना है। यदि नई तकनीक उस अनुभव को और बेहतर बना सके, तभी उसका उपयोग सार्थक है। यही सोच ‘द ओडिसी’ के निर्माण की सबसे बड़ी प्रेरणा रही और वह उम्मीद करते हैं कि दर्शक इस महाकाव्य को केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक यादगार सिनेमाई यात्रा के रूप में महसूस करेंगे।
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