हरियाणा के 1338 सरकारी स्कूलों में बालवाटिका कक्षाएं खाली, शिक्षा विभाग ने मांगी रिपोर्ट; नामांकन घटने पर बढ़ी चिंता

हरियाणा के 1338 सरकारी स्कूलों में बालवाटिका कक्षाएं खाली, शिक्षा विभाग ने मांगी रिपोर्ट; नामांकन घटने पर बढ़ी चिंता

हरियाणा में सरकारी स्कूलों में प्रारंभिक शिक्षा को मजबूत बनाने के प्रयासों के बीच एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य के 1,338 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां बालवाटिका (नर्सरी) कक्षाओं में एक भी बच्चे का दाखिला नहीं हुआ है। इन आंकड़ों ने शिक्षा विभाग की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत प्रारंभिक बाल शिक्षा को पूरे शिक्षा तंत्र की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना गया है। यदि शुरुआती स्तर पर ही बच्चों का सरकारी स्कूलों में नामांकन नहीं हो रहा है, तो इसका असर आगे की कक्षाओं में भी छात्रों की संख्या पर पड़ सकता है।

इसी स्थिति को देखते हुए हरियाणा शिक्षा विभाग ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। विभाग यह जानना चाहता है कि जिन स्कूलों में एक भी बच्चा बालवाटिका में दाखिला लेने नहीं पहुंचा, वहां इसके पीछे क्या कारण रहे। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रत्येक ऐसे स्कूल का अलग-अलग मूल्यांकन करें और वास्तविक स्थिति से विभाग को अवगत कराएं।

बालवाटिका क्यों है महत्वपूर्ण?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में तीन से आठ वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। इसी उद्देश्य से सरकारी स्कूलों में बालवाटिका की शुरुआत की गई, ताकि छोटे बच्चों को औपचारिक शिक्षा से पहले खेल-आधारित और गतिविधि-आधारित सीखने का वातावरण मिल सके।

बालवाटिका में बच्चों के बौद्धिक, शारीरिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस स्तर पर भाषा कौशल, संख्यात्मक समझ, संचार क्षमता, रचनात्मक सोच और व्यवहारिक गतिविधियों के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया विकसित की जाती है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बच्चे शुरुआती वर्षों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करते हैं, तो आगे की पढ़ाई में उनकी सीखने की क्षमता बेहतर होती है।

इसी कारण बड़ी संख्या में बालवाटिका कक्षाओं का खाली रहना शिक्षा विभाग के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

जिलावार स्थिति ने बढ़ाई चिंता

प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, यमुनानगर और अंबाला जिलों में सबसे अधिक ऐसे सरकारी स्कूल हैं जहां बालवाटिका में एक भी छात्र का नामांकन नहीं हुआ। इसके अलावा कुरुक्षेत्र और महेंद्रगढ़ जिलों में भी काफी संख्या में स्कूल ऐसे पाए गए हैं जहां नर्सरी कक्षाएं पूरी तरह खाली हैं।

इसके विपरीत सोनीपत जिले की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई जा रही है। यहां केवल एक सरकारी स्कूल ऐसा है जहां बालवाटिका में किसी बच्चे का दाखिला नहीं हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि विभिन्न जिलों में नामांकन की स्थिति एक जैसी नहीं है और स्थानीय परिस्थितियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

शिक्षा विभाग अब इन जिलों की तुलना कर यह समझने का प्रयास करेगा कि जहां बेहतर नामांकन हुआ, वहां कौन-सी रणनीतियां सफल रहीं और जिन जिलों में स्थिति कमजोर है, वहां किन कारणों से अभिभावक सरकारी स्कूलों से दूरी बना रहे हैं।

विभाग ने मांगी विस्तृत रिपोर्ट

हरियाणा शिक्षा विभाग ने सभी जिला अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे प्रत्येक ऐसे स्कूल की अलग-अलग रिपोर्ट तैयार करें। रिपोर्ट में यह बताया जाएगा कि नामांकन शून्य रहने के पीछे क्या प्रमुख कारण रहे।

अधिकारियों से यह जानकारी भी मांगी गई है कि संबंधित क्षेत्र में बच्चों की संख्या कितनी है, आसपास निजी स्कूलों की उपलब्धता क्या है, अभिभावकों की प्राथमिकताएं क्या हैं और क्या स्कूल में आधारभूत सुविधाओं की कोई कमी है।

इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि स्कूल प्रशासन और स्थानीय स्तर पर नामांकन अभियान किस प्रकार चलाया गया और उसमें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

महानिदेशक करेंगे स्कूलों का दौरा

शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, विभाग के महानिदेशक स्वयं भी उन स्कूलों का दौरा करने की तैयारी कर रहे हैं जहां नामांकन की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है।

इन दौरों के दौरान स्कूलों की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाएगा। अधिकारियों द्वारा यह भी देखा जाएगा कि विद्यालयों में उपलब्ध संसाधन, शिक्षकों की संख्या, भवन की स्थिति और बच्चों के लिए उपलब्ध सुविधाएं किस स्तर की हैं।

यदि किसी स्कूल में प्रशासनिक या प्रबंधन संबंधी कमियां पाई जाती हैं, तो उन्हें दूर करने के लिए आवश्यक निर्देश जारी किए जा सकते हैं।

पंचायतों और स्थानीय निकायों को भी दी गई थी जिम्मेदारी

सरकार ने इस वर्ष नामांकन अभियान को सफल बनाने के लिए केवल शिक्षा विभाग पर ही निर्भरता नहीं रखी थी। इसके तहत शिक्षकों, ग्राम पंचायतों, स्कूल प्रबंधन समितियों (SMC), स्थानीय निकायों और समुदाय के प्रतिनिधियों को भी बच्चों का नामांकन बढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

उद्देश्य यह था कि प्रत्येक गांव और कस्बे में घर-घर संपर्क कर अभिभावकों को सरकारी स्कूलों में उपलब्ध सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के बारे में जानकारी दी जाए। इसके बावजूद बड़ी संख्या में स्कूलों में शून्य नामांकन सामने आने से विभाग अब पूरे अभियान की समीक्षा कर रहा है।

किन कारणों की होगी जांच?

शिक्षा विभाग विभिन्न संभावित कारणों की भी जांच करेगा। इनमें प्रमुख रूप से निम्न बिंदुओं पर ध्यान दिया जाएगा—

  • क्या संबंधित क्षेत्र में बच्चों की संख्या कम है?
  • क्या अभिभावक निजी स्कूलों को प्राथमिकता दे रहे हैं?
  • क्या स्कूल में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हैं?
  • क्या स्कूल भवन और कक्षाओं की स्थिति संतोषजनक है?
  • क्या परिवहन या पहुंच से जुड़ी कोई समस्या है?
  • क्या नामांकन अभियान प्रभावी ढंग से संचालित नहीं किया गया?
  • क्या स्थानीय स्तर पर जागरूकता की कमी रही?

इन सभी पहलुओं का विश्लेषण कर भविष्य के लिए सुधारात्मक रणनीति तैयार की जाएगी।

आधारभूत सुविधाओं की भी होगी समीक्षा

विभाग ने स्पष्ट किया है कि केवल नामांकन आंकड़ों की समीक्षा ही नहीं होगी, बल्कि स्कूलों में उपलब्ध आधारभूत सुविधाओं की भी जांच की जाएगी।

अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे यह सुनिश्चित करें कि विद्यालयों में—

  • स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो।
  • साफ और उपयोग योग्य शौचालय हों।
  • मिड-डे मील योजना प्रभावी रूप से संचालित हो।
  • बच्चों के बैठने की उचित व्यवस्था हो।
  • स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षण संसाधन उपलब्ध हों।
  • खेलकूद और गतिविधि आधारित शिक्षा के लिए आवश्यक सामग्री मौजूद हो।

यदि किसी स्कूल में इन सुविधाओं की कमी पाई जाती है, तो उसे प्राथमिकता के आधार पर दूर करने की योजना बनाई जाएगी।

प्रारंभिक शिक्षा पर विशेष फोकस

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत प्रारंभिक शिक्षा को पूरे शिक्षण ढांचे की नींव माना गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि तीन से छह वर्ष की आयु बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसी अवधि में बच्चों की भाषा, संज्ञानात्मक क्षमता, सामाजिक व्यवहार और सीखने की आदतें विकसित होती हैं।

इसलिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि अधिक से अधिक बच्चे प्रारंभिक स्तर पर ही सरकारी स्कूलों से जुड़ें। यदि बालवाटिका स्तर पर नामांकन बढ़ता है तो आगे की कक्षाओं में भी छात्रों की संख्या स्थिर बनी रह सकती है।

पिछले वर्ष के आंकड़ों से होगी तुलना

शिक्षा विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि वर्तमान सत्र के नामांकन की तुलना पिछले शैक्षणिक सत्र के आंकड़ों से की जाएगी। यदि किसी स्कूल में पिछले वर्ष की तुलना में इस बार नामांकन में उल्लेखनीय गिरावट पाई जाती है, तो उसके कारणों की अलग से जांच होगी।

जहां आवश्यक होगा, वहां संबंधित स्कूल प्रमुखों और जिम्मेदार अधिकारियों से स्पष्टीकरण भी मांगा जा सकता है। विभाग का उद्देश्य केवल जवाबदेही तय करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो।

आगे की रणनीति पर रहेगा जोर

विभाग अब उन क्षेत्रों की पहचान करेगा जहां नामांकन अभियान को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन, पंचायतों, अभिभावकों और समुदाय के सहयोग से विशेष जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं। साथ ही सरकारी स्कूलों में उपलब्ध सुविधाओं और नई शिक्षा नीति के तहत किए गए सुधारों की जानकारी भी व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाई जाएगी।

वर्तमान में शिक्षा विभाग जिलों से रिपोर्ट मिलने का इंतजार कर रहा है। इन रिपोर्टों के आधार पर प्रत्येक प्रभावित स्कूल की स्थिति का विश्लेषण किया जाएगा और उसी के अनुरूप आगे की कार्ययोजना तैयार की जाएगी।

(Photo: AI Generated)