हिमाचल प्रदेश में निजी स्कूलों द्वारा परिसर के भीतर की जा रही व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर शिक्षा विभाग ने सख्त रुख अपना लिया है। अब निजी स्कूलों में यूनिफॉर्म, टाई, बेल्ट, बैज, जूते और अन्य विद्यार्थियों से जुड़ी वस्तुओं की बिक्री करना स्कूल प्रबंधन के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। शिक्षा निदेशालय ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई स्कूल नियमों की अनदेखी करते हुए ऐसी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। गंभीर मामलों में स्कूल की मान्यता या अनुमति प्रमाण पत्र तक रद्द किया जा सकता है।
स्कूल शिक्षा निदेशालय की ओर से सभी जिला उपनिदेशकों को जारी निर्देशों में कहा गया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में संचालित निजी स्कूलों पर नजर रखें और यह सुनिश्चित करें कि संस्थान शिक्षा विभाग और बोर्ड द्वारा तय नियमों का पालन करें। विभाग ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि यदि किसी स्कूल में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो तत्काल रिपोर्ट तैयार कर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जाए।
शिक्षा विभाग का कहना है कि स्कूलों का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करवाना है। स्कूल परिसर का इस्तेमाल किसी भी प्रकार की व्यापारिक गतिविधि के लिए नहीं किया जाना चाहिए। विभाग ने कहा कि शिक्षा संस्थानों को व्यावसायिक केंद्र बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे अभिभावकों और विद्यार्थियों पर अनावश्यक आर्थिक दबाव पड़ सकता है।
दरअसल, निजी स्कूलों में यूनिफॉर्म, जूते, टाई, बेल्ट और अन्य सामान की बिक्री को लेकर समय-समय पर अभिभावकों की ओर से शिकायतें सामने आती रही हैं। कई अभिभावकों का आरोप रहा है कि कुछ स्कूलों द्वारा निर्धारित दुकानों या स्कूल परिसर से ही सामान खरीदने के लिए दबाव बनाया जाता है। इससे अभिभावकों के पास कीमतों और गुणवत्ता के मामले में विकल्प सीमित हो जाते हैं।
शिक्षा विभाग ने इसी तरह की शिकायतों को ध्यान में रखते हुए अब स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। विभाग का कहना है कि विद्यार्थियों और अभिभावकों के हितों की रक्षा करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। किसी भी स्कूल को ऐसी व्यवस्था बनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जिससे अभिभावकों को मजबूरी में महंगे सामान खरीदने पड़ें।
निदेशालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया है कि यदि भविष्य में किसी निजी स्कूल के खिलाफ इस तरह की शिकायत मिलती है तो जांच के बाद संबंधित संस्थान पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 और हिमाचल प्रदेश निजी शैक्षणिक संस्थान (विनियमन) अधिनियम-1997 तथा नियम-2003 के तहत कार्रवाई की जाएगी।
इन नियमों के तहत स्कूल प्रबंधन से जवाब मांगा जा सकता है और दोष साबित होने पर विभाग सख्त कदम उठा सकता है। इसमें स्कूल की मान्यता समाप्त करने या संचालन की अनुमति वापस लेने जैसी कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। विभाग ने साफ किया है कि नियमों का पालन करना स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी होगी और किसी भी उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही भी उन्हीं की तय होगी।
शिक्षा विभाग ने जिला अधिकारियों को यह भी कहा है कि वे निजी स्कूलों को पहले ही नियमों की जानकारी उपलब्ध करवाएं, ताकि बाद में किसी तरह की अनदेखी का बहाना न बनाया जा सके। स्कूल प्रबंधन को निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने और परिसर में प्रतिबंधित व्यावसायिक गतिविधियों को तुरंत रोकने के लिए कहा गया है।
हालांकि, विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि सभी प्रकार की सामग्री उपलब्ध करवाने पर रोक नहीं लगाई गई है। हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड के संबद्धता नियमों के अनुसार, बोर्ड द्वारा निर्धारित पाठ्यपुस्तकों और प्रैक्टिकल नोटबुक की बिक्री स्कूल परिसर में की जा सकती है। इन्हें व्यावसायिक गतिविधि नहीं माना जाएगा, क्योंकि यह सीधे विद्यार्थियों की शैक्षणिक जरूरतों से जुड़ी सामग्री है।
विभाग का कहना है कि पाठ्यपुस्तकें और प्रैक्टिकल नोटबुक विद्यार्थियों की पढ़ाई का आवश्यक हिस्सा हैं, इसलिए स्कूलों द्वारा इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करना गलत नहीं है। लेकिन यूनिफॉर्म, जूते, टाई, बेल्ट और अन्य व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुओं को शिक्षा संबंधी सामग्री नहीं माना जा सकता। इसलिए इनकी बिक्री को व्यावसायिक गतिविधि की श्रेणी में रखा गया है।
शिक्षा विभाग के इस फैसले के बाद निजी स्कूलों को अपनी आंतरिक व्यवस्थाओं की समीक्षा करनी होगी। स्कूल प्रबंधन को यह सुनिश्चित करना होगा कि परिसर में ऐसी कोई दुकान, काउंटर या व्यवस्था संचालित न हो, जहां विद्यार्थियों से जुड़ी गैर-शैक्षणिक वस्तुओं की बिक्री की जा रही हो।
विभाग ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में स्कूलों की गतिविधियों की निगरानी और तेज की जा सकती है। जिला स्तर पर शिक्षा अधिकारियों को शिकायतों पर कार्रवाई करने और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया है।
अभिभावक संगठनों ने शिक्षा विभाग के इस कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि स्कूलों में पढ़ाई का माहौल बेहतर होना चाहिए और विद्यार्थियों को शिक्षा से जुड़ी सुविधाएं मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्कूलों द्वारा अतिरिक्त सामान बेचने की व्यवस्था खत्म होने से अभिभावकों को राहत मिलेगी और वे अपनी सुविधा के अनुसार बाजार से सामान खरीद सकेंगे।
कई अभिभावकों का यह भी कहना है कि बच्चों की यूनिफॉर्म और अन्य सामान खरीदने के लिए स्कूलों द्वारा निर्धारित दुकानों पर निर्भरता कम होनी चाहिए। यदि बाजार में प्रतिस्पर्धा होगी तो अभिभावकों को बेहतर कीमत और गुणवत्ता वाले विकल्प मिल सकेंगे।
वहीं निजी स्कूल संचालकों को अब शिक्षा विभाग के निर्देशों का पालन करना होगा। हालांकि स्कूल प्रबंधन की ओर से इस संबंध में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं, लेकिन विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि नियम सभी निजी संस्थानों के लिए समान रूप से लागू होंगे।
शिक्षा विभाग का कहना है कि निजी स्कूलों की भूमिका केवल शिक्षा देने तक सीमित होनी चाहिए। विद्यार्थियों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए स्कूलों को पारदर्शी तरीके से काम करना होगा। विभाग ने यह भी कहा है कि निजी संस्थानों को शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, विद्यार्थियों के विकास और बेहतर शैक्षणिक वातावरण तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए।
गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में बड़ी संख्या में विद्यार्थी निजी स्कूलों में पढ़ाई करते हैं। ऐसे में शिक्षा विभाग लगातार कोशिश कर रहा है कि निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनी रहे और अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न डाला जाए।
नए निर्देशों के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जिला स्तर पर शिक्षा अधिकारी किस तरह से इन नियमों को लागू करवाते हैं। यदि किसी स्कूल के खिलाफ शिकायतें आती हैं तो विभाग जांच के बाद कार्रवाई करेगा।
कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग ने निजी स्कूलों में गैर-शैक्षणिक बिक्री गतिविधियों को लेकर सख्त संदेश दिया है। विभाग का रुख साफ है कि स्कूलों को शिक्षा के केंद्र के रूप में ही काम करना होगा। नियमों की अनदेखी करने वाले संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और जरूरत पड़ने पर उनकी मान्यता तक रद्द की जा सकती है।



