ट्रंप के बयान से बाजार में भूचाल, निवेशकों के ₹7 लाख करोड़ डूबे, सेंसेक्स-निफ्टी में बड़ी गिरावट

ट्रंप के बयान से बाजार में भूचाल, निवेशकों के ₹7 लाख करोड़ डूबे, सेंसेक्स-निफ्टी में बड़ी गिरावट

पश्चिम एशिया तनाव का भारतीय शेयर बाजार पर असर, सेंसेक्स 1000 अंक से ज्यादा टूटा

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी का असर सोमवार को भारतीय शेयर बाजार पर देखने को मिला। कारोबारी सप्ताह की शुरुआत ही भारी गिरावट के साथ हुई, जहां निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाते हुए बड़े पैमाने पर बिकवाली की। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स और एनएसई निफ्टी दोनों में तेज गिरावट दर्ज की गई।

बाजार खुलते ही सेंसेक्स में 1,000 अंकों से अधिक की गिरावट देखने को मिली, जबकि निफ्टी भी 300 अंकों से ज्यादा फिसल गया। इस अचानक आई कमजोरी के कारण शेयर बाजार में निवेशकों की संपत्ति में लगभग 7 लाख करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई। बाजार में गिरावट का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल को माना जा रहा है।

सुबह करीब 9:50 बजे सेंसेक्स 74,227 के स्तर के आसपास कारोबार कर रहा था, जबकि निफ्टी 23,340 के करीब पहुंच गया था। शुरुआती कारोबार में ही बाजार का रुख कमजोर नजर आया और ज्यादातर प्रमुख कंपनियों के शेयर दबाव में रहे। निवेशकों ने जोखिम वाले शेयरों से दूरी बनाते हुए सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख किया।

बैंकिंग, ऑटो और मेटल शेयरों पर दबाव, आईटी सेक्टर ने संभाला मोर्चा

सेंसेक्स के ज्यादातर शेयर लाल निशान में रहे

शेयर बाजार में आई गिरावट का असर सेंसेक्स के ज्यादातर शेयरों पर दिखाई दिया। सेंसेक्स में शामिल 30 कंपनियों में से 27 शेयर गिरावट के साथ कारोबार करते नजर आए। बाजार में बिकवाली का दबाव इतना अधिक था कि कई बड़ी कंपनियों के शेयरों में शुरुआती घंटों में ही तेज गिरावट दर्ज की गई।

पावरग्रिड के शेयरों में सबसे ज्यादा कमजोरी देखने को मिली। इसके अलावा टाटा स्टील, मारुति सुजुकी, टाइटन, बजाज फाइनेंस, एचडीएफसी बैंक और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसे प्रमुख शेयरों पर भी दबाव रहा। इन कंपनियों में गिरावट का असर व्यापक बाजार धारणा पर पड़ा।

आईटी सेक्टर ने गिरते बाजार में दी राहत

जहां अधिकांश सेक्टरों में गिरावट देखने को मिली, वहीं आईटी सेक्टर ने बाजार को कुछ सहारा देने का काम किया। इन्फोसिस, टीसीएस और टेक महिंद्रा जैसे आईटी कंपनियों के शेयरों में तेजी दर्ज की गई। वैश्विक बाजार में आईटी कंपनियों की मांग और डॉलर की मजबूती से इस सेक्टर को कुछ फायदा मिला।

निवेशक आमतौर पर वैश्विक अनिश्चितता के समय उन क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं, जिनका प्रदर्शन घरेलू मांग और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से अलग तरीके से प्रभावित होता है। इसी वजह से आईटी शेयरों में अन्य सेक्टरों की तुलना में मजबूती दिखाई दी।

मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर भी बिकवाली की चपेट में

बड़ी कंपनियों के साथ-साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी गिरावट देखने को मिली। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 1 फीसदी से अधिक की कमजोरी दर्ज की गई, जबकि स्मॉलकैप इंडेक्स भी करीब 1.15 फीसदी तक नीचे फिसल गया।

छोटी और मध्यम कंपनियों के शेयरों में गिरावट का कारण निवेशकों का बढ़ा हुआ जोखिम से बचने का रुख माना जा रहा है। जब बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है, तो निवेशक अक्सर छोटे शेयरों की तुलना में बड़ी और मजबूत कंपनियों में निवेश को प्राथमिकता देते हैं।

रियल्टी, ऑटो और मीडिया सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर

सेक्टोरल प्रदर्शन की बात करें तो रियल्टी, ऑटो और मीडिया कंपनियों के शेयरों में सबसे अधिक दबाव देखा गया। बढ़ती तेल कीमतों का असर ऑटो सेक्टर की लागत और उपभोक्ता मांग पर पड़ने की आशंका रहती है। वहीं, ब्याज दरों और आर्थिक अनिश्चितता के कारण रियल्टी सेक्टर भी प्रभावित हुआ।

मीडिया और अन्य संवेदनशील सेक्टरों में भी निवेशकों ने सावधानी बरती। हालांकि आईटी सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करते हुए बाजार की गिरावट को कुछ हद तक सीमित करने का प्रयास किया।

ईरान को लेकर बयान के बाद बढ़ी वैश्विक चिंता

वैश्विक बाजारों में चिंता बढ़ने की प्रमुख वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान को लेकर दिए गए सख्त बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय निवेशकों में चिंता बढ़ गई। इस घटनाक्रम के बाद बाजारों में अनिश्चितता का माहौल देखने को मिला।

भू-राजनीतिक तनाव का सबसे सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा। तेल उत्पादक क्षेत्रों में किसी भी तरह की अस्थिरता से वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका रहती है, जिससे कीमतों में तेजी आती है।

कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से बढ़ी चिंता

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़कर 111 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है, इसलिए तेल की बढ़ती कीमतों का असर घरेलू अर्थव्यवस्था और बाजार पर पड़ सकता है।

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा महंगाई, कंपनियों की लागत और उपभोक्ता खर्च पर भी इसका प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है। यही कारण है कि तेल बाजार में तेजी के बाद भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की चिंता बढ़ गई।

रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा

तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक बाजार में डॉलर की मजबूती का असर भारतीय मुद्रा पर भी देखने को मिला। शुरुआती कारोबार में रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर 96.18 के स्तर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर बताया जा रहा है।

रुपये में लगातार कमजोरी देखने को मिल रही है और यह लगातार पांचवां कारोबारी सत्र रहा, जब भारतीय मुद्रा दबाव में रही। फरवरी के अंत से अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 5.5 फीसदी कमजोर हो चुका है।

बाजार की नजर अब वैश्विक घटनाक्रमों पर

भारतीय शेयर बाजार की आगे की दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक निवेशकों की धारणा पर निर्भर करेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, भू-राजनीतिक तनाव कम होने या तेल कीमतों में स्थिरता आने से बाजार में राहत देखने को मिल सकती है।

निवेशकों के लिए ऐसे समय में कंपनियों के मूलभूत प्रदर्शन, आर्थिक संकेतकों और वैश्विक परिस्थितियों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होता है। बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान सतर्क निवेश रणनीति अपनाना जरूरी माना जाता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और रुपये में कमजोरी भारतीय अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है। आयात महंगा होने से कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और इसका असर विभिन्न उद्योगों पर पड़ सकता है।

सरकार और रिजर्व बैंक जैसे संस्थान भी ऐसे वैश्विक घटनाक्रमों पर नजर रखते हैं, क्योंकि तेल कीमतें, महंगाई और मुद्रा विनिमय दर अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण संकेतक माने जाते हैं। आने वाले दिनों में बाजार की चाल इन्हीं कारकों से प्रभावित हो सकती है।