चंडीगढ़ में जल्द मिलेगा जंगल सफारी का रोमांच, सुखना सेंक्चुरी पर प्रशासन का बड़ा प्लान

चंडीगढ़ में जल्द मिलेगा जंगल सफारी का रोमांच, सुखना सेंक्चुरी पर प्रशासन का बड़ा प्लान

सुखना वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी को इको-टूरिज्म हब बनाने की तैयारी, चंडीगढ़ में जंगल सफारी की संभावनाओं पर प्रशासन का फोकस

चंडीगढ़ आने वाले समय में केवल अपनी साफ-सुथरी सड़कों, हरियाली और सुखना लेक के लिए ही नहीं, बल्कि इको-टूरिज्म और जंगल सफारी जैसे आकर्षणों के लिए भी जाना जा सकता है। शहर के आसपास स्थित सुखना वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी को विकसित करने की दिशा में प्रशासन संभावनाएं तलाश रहा है। यदि यह योजना चरणबद्ध तरीके से लागू होती है, तो स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को भी प्राकृतिक वातावरण में वन्यजीवों को देखने और जंगल का अनुभव लेने का अवसर मिल सकता है।

सुखना वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र मानी जाती रही है। हाल के वर्षों में यहां वन्यजीवों की संख्या और गतिविधियों में वृद्धि दर्ज की गई है। इसी कारण प्रशासन अब इस क्षेत्र को पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ नियंत्रित पर्यटन के मॉडल के रूप में विकसित करने पर विचार कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी भी इको-टूरिज्म परियोजना को वैज्ञानिक योजना, सीमित पर्यटक संख्या और पर्यावरणीय संतुलन के साथ लागू किया जाए तो इससे प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।

26 वर्ग किलोमीटर में फैली है समृद्ध जैव विविधता

सुखना वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी लगभग 26 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है। यह क्षेत्र शिवालिक की तलहटी में स्थित होने के कारण प्राकृतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां घने जंगल, प्राकृतिक जल स्रोत, विविध वनस्पतियां और अनेक वन्यजीव पाए जाते हैं, जो इसे उत्तर भारत के प्रमुख संरक्षित क्षेत्रों में शामिल करते हैं।

हाल ही में हुए वन्यजीव सर्वेक्षण के बाद इस क्षेत्र की पारिस्थितिक महत्ता और अधिक बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सेंक्चुरी भविष्य में नियंत्रित इको-टूरिज्म के लिए एक उपयुक्त मॉडल बन सकती है, बशर्ते संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।

तेंदुओं की मौजूदगी ने बढ़ाई सेंक्चुरी की अहमियत

वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरा ट्रैप में तेंदुओं की तस्वीरें सामने आने के बाद सुखना वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी चर्चा का विषय बन गई। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जंगल में केवल एक-दो तेंदुए ही नहीं, बल्कि उनका पूरा प्राकृतिक आवास विकसित हो चुका हो सकता है।

तेंदुआ खाद्य श्रृंखला का शीर्ष शिकारी माना जाता है। किसी भी जंगल में इसकी मौजूदगी इस बात का संकेत होती है कि वहां का पारिस्थितिक तंत्र संतुलित है और पर्याप्त संख्या में अन्य वन्यजीव भी मौजूद हैं।

कई महत्वपूर्ण वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास

सेंक्चुरी में केवल तेंदुए ही नहीं, बल्कि अनेक अन्य स्तनधारी जीव भी पाए जाते हैं। इनमें सांभर, नीलगाय, जंगली सूअर, बार्किंग डियर, जंगली बिल्ली और छोटे स्तनधारी जीव शामिल हैं।

इन प्रजातियों की मौजूदगी दर्शाती है कि यहां प्राकृतिक भोजन श्रृंखला अभी भी सक्रिय है। वन विभाग समय-समय पर इनकी निगरानी करता है ताकि वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

पक्षियों के लिए भी महत्वपूर्ण है यह क्षेत्र

सुखना वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी पक्षी प्रेमियों के लिए भी विशेष महत्व रखती है। वन्यजीव सर्वेक्षण के अनुसार यहां 132 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज की गई हैं। इनमें स्थानीय और प्रवासी दोनों प्रकार के पक्षी शामिल हैं।

कुछ दुर्लभ और संरक्षण की आवश्यकता वाली प्रजातियों की उपस्थिति इस क्षेत्र की पारिस्थितिक गुणवत्ता को और अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। यही कारण है कि पक्षी विशेषज्ञ और प्रकृति फोटोग्राफर भी इस क्षेत्र में विशेष रुचि रखते हैं।

तितलियों और सरीसृपों की विविधता भी आकर्षण का केंद्र

सर्वेक्षण में सेंक्चुरी में 73 प्रकार की तितलियों और 13 सरीसृप प्रजातियों का भी रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। तितलियां किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती हैं क्योंकि उनका जीवन चक्र सीधे पौधों और पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ा होता है।

इसके अलावा यहां पाए जाने वाले सरीसृप भी प्राकृतिक जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और पूरे पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।

वनस्पतियों की समृद्ध विविधता

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार सेंक्चुरी में लगभग 79 प्रकार की वनस्पतियां दर्ज की गई हैं। इनमें स्थानीय पेड़-पौधे, औषधीय पौधे, झाड़ियां और घास की विभिन्न प्रजातियां शामिल हैं।

समृद्ध वनस्पति न केवल वन्यजीवों को भोजन और आश्रय प्रदान करती है बल्कि मिट्टी संरक्षण, जल संरक्षण और स्थानीय जलवायु संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।

सुरक्षा कारणों से बंद की गई थी ट्रैकिंग

कुछ समय पहले तक सुखना वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी में सीमित संख्या में ट्रैकिंग गतिविधियां आयोजित की जाती थीं। नेपली गेट से कांसल क्षेत्र तक होने वाली ट्रैकिंग प्रकृति प्रेमियों के बीच काफी लोकप्रिय थी।

हालांकि तेंदुओं की बढ़ती गतिविधियों और सुरक्षा संबंधी कारणों को देखते हुए प्रशासन ने ट्रैकिंग पर रोक लगा दी। इसका उद्देश्य पर्यटकों और वन्यजीवों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।

अब नियंत्रित जंगल सफारी पर विचार

ट्रैकिंग बंद होने के बाद प्रशासन अब नियंत्रित जंगल सफारी मॉडल पर विचार कर रहा है। इस योजना के तहत प्रशिक्षित गाइडों की निगरानी में निर्धारित मार्गों पर सीमित संख्या में पर्यटकों को जंगल भ्रमण कराया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सफारी मार्ग वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर तय किए जाएं और वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार में हस्तक्षेप न हो, तो यह मॉडल सफल हो सकता है।

नाइट सफारी की अवधारणा पर भी हो चुकी है चर्चा

चंडीगढ़ में वन्यजीव पर्यटन को बढ़ावा देने का विचार नया नहीं है। पहले भी सिंगापुर की तर्ज पर नाइट सफारी जैसी परियोजना पर चर्चा हो चुकी है। इस संबंध में वन विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच विचार-विमर्श भी किया गया था।

हालांकि विशेषज्ञों ने बड़े स्तर की नाइट सफारी को शहर के भीतर व्यावहारिक नहीं माना। इसके बाद प्राकृतिक जंगल क्षेत्र में सीमित और पर्यावरण-अनुकूल सफारी मॉडल पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा।

इको-टूरिज्म से पर्यटन उद्योग को मिल सकता है लाभ

यदि जंगल सफारी और इको-टूरिज्म परियोजना विकसित होती है तो इसका लाभ केवल वन विभाग तक सीमित नहीं रहेगा। चंडीगढ़ पहले से ही हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तर भारत के कई पर्यटन स्थलों का प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाता है।

ऐसे में शहर में आने वाले पर्यटक एक या दो दिन अतिरिक्त ठहरकर इस प्राकृतिक आकर्षण का भी अनुभव लेना चाहेंगे। इससे होटल, रेस्टोरेंट, स्थानीय बाजार, टैक्सी सेवा और ट्रैवल उद्योग को भी आर्थिक लाभ मिलने की संभावना बढ़ सकती है।

स्थानीय रोजगार के नए अवसर

इको-टूरिज्म परियोजनाओं से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न हो सकते हैं। प्रशिक्षित नेचर गाइड, सफारी चालक, पर्यटन सहायक, सुरक्षा कर्मचारी और पर्यावरण शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों की मांग बढ़ सकती है।

इसके साथ ही स्थानीय हस्तशिल्प, पारंपरिक उत्पाद और छोटे व्यवसायों को भी पर्यटकों की संख्या बढ़ने का लाभ मिल सकता है।

पर्यावरण संरक्षण रहेगा सबसे महत्वपूर्ण

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी इको-टूरिज्म परियोजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि पर्यावरण संरक्षण को कितना महत्व दिया जाता है। यदि अनियंत्रित पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए तो इससे वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

इसी कारण वैज्ञानिक योजना, सीमित प्रवेश, कचरा प्रबंधन, ध्वनि नियंत्रण और वन्यजीवों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने जैसे नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

प्रकृति प्रेमियों की लंबे समय से रही है मांग

प्रकृति और ट्रैकिंग के शौकीन लोग लंबे समय से चाहते रहे हैं कि सेंक्चुरी को पूरी तरह बंद रखने के बजाय नियंत्रित तरीके से आम लोगों के लिए खोला जाए। उनका मानना है कि यदि सुरक्षा और संरक्षण के सभी मानकों का पालन किया जाए तो लोग प्रकृति के करीब आ सकेंगे और पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी।

पहले आयोजित होने वाली ट्रैकिंग गतिविधियों के दौरान प्रतिभागियों को जंगल, जल स्रोत, वनस्पतियों, पक्षियों और वन्यजीवों को नजदीक से देखने का अवसर मिलता था। इस अनुभव ने कई लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति रुचि भी बढ़ाई थी।

सेंक्चुरी की जैव विविधता एक नजर में

वन्यजीव सर्वेक्षण के अनुसार सुखना वाइल्डलाइफ सेंक्चुरी में 132 से अधिक पक्षी प्रजातियां, 73 प्रकार की तितलियां, 16 स्तनधारी जीव, 13 सरीसृप प्रजातियां तथा लगभग 79 प्रकार की वनस्पतियां दर्ज की गई हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र प्राकृतिक संपदा से समृद्ध है और इसके संरक्षण का महत्व भविष्य में और भी अधिक बढ़ सकता है।