बीमा क्लेम पर अब नहीं चलेगी कंपनियों की मनमानी, IRDAI लाने जा रहा नया सिस्टम

बीमा क्लेम पर अब नहीं चलेगी कंपनियों की मनमानी, IRDAI लाने जा रहा नया सिस्टम

IRDAI क्लेम सेटलमेंट नियमों में कर सकता है बड़ा बदलाव, बीमा कंपनियों के लिए एक समान प्रक्रिया लागू करने की तैयारी

भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (Insurance Regulatory and Development Authority of India – IRDAI) देश के बीमा क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने और ग्राहकों के हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नियामक ने नॉन-लाइफ (General Insurance) कंपनियों को क्लेम (Claim) की परिभाषा और उसके निपटान (Settlement) की प्रक्रिया में एकरूपता लाने के निर्देश दिए हैं।

वर्तमान समय में अलग-अलग बीमा कंपनियां क्लेम दर्ज करने, उसकी समीक्षा करने और सेटलमेंट का रिकॉर्ड तैयार करने के लिए अलग-अलग मानक अपनाती हैं। इससे ग्राहकों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि किसी कंपनी का वास्तविक क्लेम सेटलमेंट प्रदर्शन क्या है। IRDAI चाहता है कि सभी बीमा कंपनियां समान नियमों का पालन करें ताकि ग्राहकों को स्पष्ट, पारदर्शी और तुलनात्मक जानकारी उपलब्ध हो सके।

बीमा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्लेम सेटलमेंट प्रक्रिया में एक समान मानक लागू किए जाते हैं, तो इससे ग्राहकों का भरोसा बढ़ेगा और बीमा कंपनियों की कार्यप्रणाली अधिक जवाबदेह बनेगी।

क्यों जरूरी है क्लेम सेटलमेंट प्रक्रिया में एकरूपता?

आज देश में संचालित विभिन्न जनरल इंश्योरेंस कंपनियां अपने-अपने आंतरिक नियमों के आधार पर क्लेम का रिकॉर्ड तैयार करती हैं। कुछ कंपनियां ग्राहक की ओर से सूचना मिलने के साथ ही उसे क्लेम के रूप में दर्ज कर लेती हैं, जबकि कुछ कंपनियां तभी क्लेम मानती हैं जब प्रारंभिक जांच के बाद उन्हें भुगतान योग्य मामला दिखाई देता है।

इस अंतर के कारण अलग-अलग कंपनियों के क्लेम सेटलमेंट रेशियो (Claim Settlement Ratio) की तुलना करना कठिन हो जाता है। ग्राहक अक्सर इन आंकड़ों के आधार पर बीमा कंपनी का चयन करते हैं, लेकिन यदि रिकॉर्ड तैयार करने का तरीका अलग-अलग हो तो वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ पाती।

क्लेम सेटलमेंट रेशियो क्या होता है?

क्लेम सेटलमेंट रेशियो किसी बीमा कंपनी द्वारा प्राप्त कुल दावों में से कितने दावों का निपटारा किया गया, इसका एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। कई ग्राहक स्वास्थ्य बीमा, वाहन बीमा, यात्रा बीमा या अन्य सामान्य बीमा पॉलिसी खरीदते समय इसी आंकड़े को प्राथमिकता देते हैं।

हालांकि केवल प्रतिशत देखकर किसी कंपनी की गुणवत्ता का आकलन करना पर्याप्त नहीं होता। यह भी महत्वपूर्ण है कि क्लेम को किस आधार पर स्वीकार किया गया, कितने मामलों में वास्तविक भुगतान हुआ और किन मामलों को अन्य कारणों से बंद कर दिया गया।

अलग-अलग कंपनियां कैसे दिखाती हैं अलग तस्वीर?

मौजूदा व्यवस्था में कुछ बीमा कंपनियां ऐसे मामलों को भी “सेटल्ड” (Settled) श्रेणी में शामिल कर देती हैं, जिनमें ग्राहक को वास्तविक भुगतान नहीं मिला होता। उदाहरण के लिए यदि आवश्यक दस्तावेज समय पर जमा नहीं किए गए हों या दावा पॉलिसी की शर्तों के अनुरूप न पाया गया हो, तो कंपनी उस मामले को बंद कर सकती है और अपने रिकॉर्ड में उसे निपटाया हुआ दिखा सकती है।

ऐसी स्थिति में ग्राहक को भुगतान नहीं मिलता, लेकिन कंपनी के क्लेम सेटलमेंट आंकड़े अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देते हैं। यही कारण है कि इस पूरी प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

ग्राहकों के सामने क्या समस्याएं आती हैं?

बीमा पॉलिसी लेने वाले अधिकांश ग्राहक यह मानते हैं कि “क्लेम सेटलमेंट” का अर्थ है कि कंपनी ने उनका दावा स्वीकार कर लिया और भुगतान कर दिया। लेकिन कई बार तकनीकी कारणों से मामला बंद हो जाता है, जबकि ग्राहक को कोई राशि प्राप्त नहीं होती।

ऐसी परिस्थितियों में ग्राहक भ्रमित हो सकते हैं क्योंकि कंपनी के सार्वजनिक रिकॉर्ड में क्लेम का निपटारा दिखाया जाता है, जबकि वास्तविक लाभ उन्हें प्राप्त नहीं हुआ होता।

पारदर्शिता बढ़ाने पर IRDAI का फोकस

IRDAI लंबे समय से बीमा क्षेत्र में पारदर्शिता और ग्राहक हितों को मजबूत करने के लिए विभिन्न सुधार लागू करता रहा है। नियामक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ग्राहकों को सही जानकारी मिले और वे किसी भी बीमा उत्पाद का चयन पूरी समझ के साथ कर सकें।

यदि सभी कंपनियों के लिए क्लेम की परिभाषा और सेटलमेंट प्रक्रिया समान हो जाती है, तो ग्राहकों को विभिन्न कंपनियों की तुलना करना अधिक आसान हो जाएगा।

क्लेम प्रक्रिया में संभावित बदलाव, ग्राहकों के अधिकार और विशेषज्ञों की राय

‘फुल एंड फाइनल सेटलमेंट’ को लेकर भी उठते रहे हैं सवाल

बीमा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामलों में ग्राहकों से “फुल एंड फाइनल सेटलमेंट” (Full and Final Settlement) से संबंधित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए जाते हैं। कुछ उपभोक्ताओं का दावा होता है कि वे भुगतान की राशि से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते, फिर भी प्रक्रिया पूरी करने के लिए दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर देते हैं।

इसी वजह से विशेषज्ञ लंबे समय से इस प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और ग्राहक-केंद्रित बनाने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

IRDAI के पूर्व सदस्य के.के. श्रीनिवासन के अनुसार, किसी क्लेम को तभी पूरी तरह निपटा हुआ माना जाना चाहिए जब ग्राहक भी उस निर्णय से संतुष्ट हो। यदि बीमा कंपनी दावा अस्वीकार करती है और मामला न्यायालय या अन्य कानूनी मंच तक पहुंच जाता है, तो अंतिम निर्णय आने तक उसे लंबित (Pending) श्रेणी में रखा जाना अधिक उपयुक्त माना जा सकता है।

इस तरह की व्यवस्था लागू होने पर क्लेम सेटलमेंट के आंकड़े अधिक वास्तविक और पारदर्शी बन सकते हैं।

जनरल इंश्योरेंस काउंसिल ने भी दिए सुझाव

सूत्रों के अनुसार, जनरल इंश्योरेंस काउंसिल ने इस विषय में अपने सुझाव IRDAI को भेज दिए हैं। इन सुझावों का उद्देश्य बीमा उद्योग में समान मानक विकसित करना और रिपोर्टिंग प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट बनाना है।

यदि नियामक इन सुझावों के आधार पर नए दिशा-निर्देश जारी करता है, तो सभी नॉन-लाइफ बीमा कंपनियों को एक समान प्रक्रिया अपनानी पड़ सकती है।

नॉन-लाइफ इंश्योरेंस में कौन-कौन से बीमा शामिल होते हैं?

नॉन-लाइफ या जनरल इंश्योरेंस के अंतर्गत स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance), मोटर बीमा (Motor Insurance), यात्रा बीमा (Travel Insurance), संपत्ति बीमा (Property Insurance), समुद्री बीमा (Marine Insurance), अग्नि बीमा (Fire Insurance) और अन्य सामान्य बीमा उत्पाद शामिल होते हैं।

इन सभी क्षेत्रों में क्लेम प्रक्रिया ग्राहकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक मानी जाती है क्योंकि पॉलिसी का वास्तविक लाभ जरूरत के समय ही मिलता है।

बीमा खरीदते समय किन बातों का रखें ध्यान?

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी बीमा पॉलिसी को खरीदने से पहले केवल क्लेम सेटलमेंट रेशियो पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। ग्राहकों को पॉलिसी की शर्तें, कवरेज, अपवाद (Exclusions), प्रतीक्षा अवधि (Waiting Period), दस्तावेजी आवश्यकताएं और क्लेम प्रक्रिया को भी ध्यान से समझना चाहिए।

इसके अलावा कंपनी की ग्राहक सेवा, शिकायत निवारण प्रणाली और नेटवर्क सेवाओं की जानकारी भी निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

क्लेम दर्ज करते समय क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

किसी भी बीमा दावा दर्ज करते समय सभी आवश्यक दस्तावेज समय पर जमा करना महत्वपूर्ण होता है। गलत जानकारी, अधूरे दस्तावेज या निर्धारित समय सीमा का पालन न करने पर क्लेम प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

ग्राहकों को आवेदन की प्रति, रसीदें, अस्पताल या मरम्मत से जुड़े दस्तावेज और कंपनी के साथ हुए सभी आधिकारिक संवाद का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर उनका उपयोग किया जा सके।

ग्राहकों को कैसे मिलेगा फायदा?

यदि IRDAI द्वारा एक समान क्लेम सेटलमेंट मानक लागू किए जाते हैं, तो बीमा कंपनियों के बीच तुलना अधिक आसान हो जाएगी। इससे ग्राहकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि कौन-सी कंपनी वास्तव में क्लेम प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से संचालित करती है और कितने मामलों में वास्तविक भुगतान किया जाता है।

पारदर्शी रिपोर्टिंग व्यवस्था लागू होने से उद्योग में जवाबदेही बढ़ने की भी संभावना है। इससे बीमा क्षेत्र में उपभोक्ताओं का विश्वास मजबूत हो सकता है और भविष्य में बीमा कंपनियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन अधिक स्पष्ट मानकों के आधार पर किया जा सकेगा।