ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने के संकेतों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत अब करीब 72 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। खास बात यह है कि यह वही स्तर है, जहां कीमतें ईरान युद्ध शुरू होने से ठीक पहले थीं।
गुरुवार को ब्रेंट क्रूड का भाव 72 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा। इससे पहले 27 फरवरी को, यानी ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव से एक दिन पहले, कच्चे तेल की कीमत 72.29 डॉलर प्रति बैरल थी। इसके बाद युद्ध की आशंकाओं के चलते तेल बाजार में तेजी आई थी और कीमतें काफी ऊपर चली गई थीं।
हालांकि अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत और तनाव कम होने के संकेतों ने तेल बाजार को राहत दी है। 17 जून को दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद स्विट्जरलैंड में हुई शांति वार्ता में अमेरिका की ओर से ईरानी तेल निर्यात पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में ढील दी गई। इसका सीधा असर तेल सप्लाई पर पड़ा है।
होर्मुज स्ट्रेट से बढ़ने लगी जहाजों की आवाजाही
कच्चे तेल की सप्लाई के लिए दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य से अब दोबारा तेल टैंकरों की आवाजाही बढ़ने लगी है। युद्ध के दौरान इस रूट पर अनिश्चितता बढ़ गई थी और कई जहाजों ने यहां से गुजरने से परहेज किया था। जानकारी के मुताबिक सोमवार के बाद से करीब 80 जहाज होर्मुज रूट से गुजर चुके हैं। हालांकि यह संख्या अभी भी युद्ध से पहले की सामान्य स्थिति से कम है। पहले इस रास्ते से रोजाना 100 से ज्यादा जहाज गुजरते थे।
तेल सप्लाई को लेकर बाजार में चिंता कम होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव आया है। लेकिन इसका असर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर तुरंत दिखाई नहीं देगा।
सस्ता तेल मिलने के बावजूद पेट्रोल-डीजल के लिए करना होगा इंतजार
कच्चे तेल के दाम कम होने के बाद आम लोगों को उम्मीद होती है कि पेट्रोल और डीजल भी सस्ते हो जाएंगे। लेकिन ऐसा तुरंत नहीं होता। इसके पीछे तेल खरीदने, समुद्र के रास्ते भारत तक पहुंचने, रिफाइनिंग और फिर पेट्रोल पंप तक पहुंचने की लंबी प्रक्रिया होती है। एनर्जी एक्सपर्ट नरेंद्र तनेजा के अनुसार, फिलहाल जो पेट्रोल और डीजल देश में बिक रहा है, वह उस कच्चे तेल से तैयार किया गया है जिसे कंपनियों ने पहले ही ऊंचे दामों पर खरीदा था।
उन्होंने बताया कि मौजूदा पेट्रोल-डीजल बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया कच्चा तेल उस समय खरीदा गया था जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल थी। भारतीय रिफाइनरियों के लिए इसकी लागत करीब 125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच रही थी।
यानी आज अगर कच्चा तेल 72 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है, तो उसका फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचने में समय लगेगा।
72 डॉलर वाले क्रूड का असर कब दिखेगा?
विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा सस्ते कच्चे तेल का असर भारतीय बाजार तक पहुंचने में करीब ढाई महीने का समय लग सकता है। इसकी वजह बताते हुए कहा गया कि पहले तेल उत्पादक देशों के बंदरगाहों पर कच्चे तेल को जहाजों में लोड किया जाता है। इस प्रक्रिया में लगभग 15 से 20 दिन लग सकते हैं। इसके बाद समुद्री रास्ते से भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचने में करीब 55 से 60 दिन का समय लग जाता है।
भारत पहुंचने के बाद कच्चे तेल को रिफाइनरी में भेजा जाता है, जहां इसे पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पादों में बदला जाता है। इसके बाद ही यह ईंधन पेट्रोल पंपों तक पहुंचता है। पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में लगभग 75 से 80 दिन लगते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में आज आई गिरावट का असर भारतीय ग्राहकों को तुरंत नहीं मिलेगा।
कंपनियां पहले अपने नुकसान की भरपाई कर सकती हैं
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बाद भी पेट्रोल और डीजल के दाम कम करने से पहले तेल कंपनियां अपनी स्थिति सुधार सकती हैं। नरेंद्र तनेजा के मुताबिक, फिलहाल ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल और डीजल पर लगभग 7.5 रुपये प्रति लीटर तक नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में कंपनियां पहले अपने घाटे को कम करने की कोशिश कर सकती हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार ने भी पहले एक्साइज ड्यूटी में करीब 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी। इसलिए तेल कंपनियों और सरकार के स्तर पर कुछ समय तक कीमतों को संतुलित रखने की कोशिश की जा सकती है। यही कारण है कि कच्चे तेल की कीमत गिरने के बाद भी पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत कम होने की संभावना कम है।
दशहरे के आसपास मिल सकती है राहत
एक्सपर्ट का अनुमान है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत दशहरे के आसपास देखने को मिल सकती है। उन्होंने कहा कि अगस्त के आखिरी सप्ताह या सितंबर की शुरुआत से कीमतों में कुछ नरमी आने के संकेत मिल सकते हैं। हालांकि बड़ी राहत के लिए लोगों को अक्टूबर तक इंतजार करना पड़ सकता है।
दशहरे के आसपास तेल कंपनियां नए सस्ते कच्चे तेल की लागत को अपने हिसाब से शामिल कर सकती हैं, जिससे पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती की संभावना बढ़ेगी।
क्या दोबारा बढ़ सकते हैं कच्चे तेल के दाम?
भविष्य में कच्चे तेल की कीमतों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हाल के महीनों में युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी तेजी की संभावना फिलहाल कम है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव घटने, सप्लाई व्यवस्था सामान्य होने और होर्मुज रूट पर जहाजों की आवाजाही बढ़ने से बाजार को स्थिरता मिल सकती है।
नरेंद्र तनेजा के अनुसार, निकट भविष्य में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ने की आशंका बहुत कम दिखाई दे रही है। अगर अंतरराष्ट्रीय स्थिति सामान्य रहती है तो तेल की कीमतें मौजूदा स्तर के आसपास बनी रह सकती हैं।
कुल मिलाकर, कच्चे तेल के सस्ता होने से भविष्य में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत की उम्मीद जरूर बढ़ी है, लेकिन इसका फायदा आम ग्राहकों तक पहुंचने में अभी कुछ समय लगेगा। कंपनियों की लागत, पुराना महंगा स्टॉक और सप्लाई चेन की लंबी प्रक्रिया के कारण कीमतों में कमी धीरे-धीरे ही दिखाई देगी।




