अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक एवं रणनीतिक प्रतिस्पर्धा एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने चीन की कई प्रमुख कंपनियों को उस सूची में शामिल कर दिया है, जिन पर चीनी सैन्य प्रतिष्ठान से जुड़े होने या उसे सहयोग देने का संदेह जताया गया है। इस नई सूची में ई-कॉमर्स क्षेत्र की दिग्गज कंपनी अलीबाबा, इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता BYD और इंटरनेट कंपनी बायडू जैसे बड़े नाम शामिल हैं। अमेरिकी कदम के बाद चीन ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे अपने कारोबारी हितों पर हमला बताया है और आवश्यक जवाबी कदम उठाने की चेतावनी दी है।
सोमवार को जारी किए गए इस संशोधित दस्तावेज में कुल 80 चीनी कंपनियों और उनकी सहयोगी इकाइयों को शामिल किया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन कंपनियों के गतिविधि क्षेत्रों और उनके संभावित संबंधों की समीक्षा के बाद यह फैसला लिया गया है। हालांकि सूची में शामिल कंपनियों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे गलत तथा आधारहीन करार दिया है।
दिलचस्प बात यह है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच उच्चस्तरीय बातचीत हुई थी। दोनों देशों के नेताओं ने आपसी संबंधों को स्थिर बनाए रखने और संवाद जारी रखने पर जोर दिया था। इसके बावजूद नई ब्लैकलिस्ट ने संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास अब भी गहराई से मौजूद है।
बीजिंग ने अमेरिकी निर्णय पर तत्काल प्रतिक्रिया दी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा कि अमेरिका बार-बार राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर चीनी कंपनियों को निशाना बना रहा है। उनके अनुसार यह कदम निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और वैश्विक व्यापार व्यवस्था की भावना के विपरीत है। उन्होंने अमेरिका से ऐसे कदमों को वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि चीन अपनी कंपनियों के वैध हितों की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा।
चीन का आरोप है कि वाशिंगटन राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा का अत्यधिक विस्तार कर रहा है और इसका इस्तेमाल विदेशी कंपनियों पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। बीजिंग का कहना है कि अमेरिकी प्रशासन द्वारा अपनाई जा रही यह नीति अंतरराष्ट्रीय निवेश माहौल को नुकसान पहुंचा सकती है।
नई सूची का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें कुछ ऐसी कंपनियों को फिर से शामिल किया गया है जिन्हें पहले हटाया गया था। मेमोरी चिप निर्माण से जुड़ी कंपनियां चांगक्सिन मेमोरी टेक्नोलॉजीज और यांग्त्जी मेमोरी टेक्नोलॉजीज को दोबारा सूची में स्थान दिया गया है। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका सेमीकंडक्टर और उन्नत तकनीक के क्षेत्रों में चीन पर दबाव बनाए रखने की रणनीति पर कायम है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल व्यापारिक नहीं बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, चिप निर्माण, दूरसंचार और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे क्षेत्रों में चीन की बढ़ती ताकत को लेकर चिंता जताई है। इसी कारण कई चीनी कंपनियां लगातार अमेरिकी प्रतिबंधों और निगरानी का सामना कर रही हैं।
सूची में शामिल कंपनियों में केवल तकनीकी संस्थान ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रों की कंपनियां भी मौजूद हैं। फार्मास्युटिकल क्षेत्र की कंपनी वूक्सी ऐपटेक और रोबोटिक्स स्टार्टअप यूनिट्री का नाम भी इस बार जोड़ा गया है। यूनिट्री ह्यूमनॉइड रोबोट विकसित करने के लिए जानी जाती है और हाल के वर्षों में उसने वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है।
वूक्सी ऐपटेक ने अमेरिकी निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि उसका किसी भी सैन्य संगठन से कोई संबंध नहीं है। कंपनी के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि न तो कंपनी किसी सरकारी या सैन्य संस्था के नियंत्रण में है और न ही वह ऐसी किसी संस्था को सेवाएं प्रदान करती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि तथ्यों की समीक्षा के बाद कंपनी का नाम सूची से हटाया जाएगा।
अलीबाबा ने भी अमेरिकी फैसले को गलत बताया है। कंपनी का कहना है कि वह एक व्यावसायिक संगठन है और उसका संचालन पूरी तरह बाजार आधारित सिद्धांतों पर होता है। अलीबाबा के अनुसार उसे इस सूची में शामिल करने का कोई उचित कारण नहीं है। इसी तरह बायडू ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आरोपों को समर्थन देने वाला कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है।
दूसरी ओर इलेक्ट्रिक वाहन बाजार में तेजी से उभर रही BYD ने भी अमेरिकी निर्णय को निराधार बताया। कंपनी ने हांगकांग स्टॉक एक्सचेंज को भेजे गए बयान में कहा कि उसका कारोबार पूरी तरह व्यावसायिक उद्देश्यों पर आधारित है और उसे सूची में शामिल करने का फैसला तथ्यों से मेल नहीं खाता।
हालांकि इस ब्लैकलिस्ट में शामिल होने से कंपनियों पर तुरंत कोई कानूनी प्रतिबंध लागू नहीं होगा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रतीकात्मक और रणनीतिक महत्व काफी बड़ा है। अक्सर ऐसी सूचियां भविष्य में कड़े प्रतिबंधों, निवेश सीमाओं या सरकारी अनुबंधों पर रोक जैसी कार्रवाइयों की दिशा में पहला कदम मानी जाती हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार भी इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। निवेशकों को आशंका है कि यदि अमेरिका और चीन के बीच तनाव और बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, तकनीकी सहयोग और निवेश प्रवाह पर पड़ सकता है। विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिक वाहन और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा और तीखी होने की संभावना जताई जा रही है।
पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापारिक और तकनीकी विवाद कई बार सामने आए हैं। अमेरिका पहले भी कई चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा चुका है, जबकि चीन ने भी जवाबी कदम उठाने से परहेज नहीं किया है। ऐसे में ताजा विवाद को दोनों महाशक्तियों के बीच जारी रणनीतिक संघर्ष की नई कड़ी माना जा रहा है।
फिलहाल यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले महीनों में दोनों देश इस मुद्दे को किस दिशा में ले जाते हैं। एक तरफ ट्रंप प्रशासन चीन के साथ संवाद बनाए रखने की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी संस्थाओं की ओर से उठाए जा रहे कदम संबंधों में नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं। चीन ने भी स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि वह अपनी कंपनियों के खिलाफ किसी भी कार्रवाई को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगा।
ऐसे समय में जब दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक व्यापार और तकनीकी विकास की दिशा तय करती हैं, यह विवाद केवल अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं रहेगा। इसके प्रभाव अंतरराष्ट्रीय बाजारों, निवेशकों और तकनीकी उद्योग पर भी देखने को मिल सकते हैं।
(Photo : AI Generated)




