ईरान-अमेरिका समझौते पर बढ़ा सियासी घमासान, विदेश मंत्री अराघची कट्टरपंथियों के निशाने पर, डील को लेकर देश में छिड़ी बहस

ईरान-अमेरिका समझौते पर बढ़ा सियासी घमासान, विदेश मंत्री अराघची कट्टरपंथियों के निशाने पर, डील को लेकर देश में छिड़ी बहस

अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्सुकता बढ़ रही है, वहीं ईरान के भीतर इस मुद्दे ने गंभीर राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। देश के अलग-अलग सत्ता केंद्रों और राजनीतिक धड़ों के बीच मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। विशेष रूप से विदेश मंत्री अब्बास अराघची को उन कट्टरपंथी समूहों की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, जो इस समझौते को ईरान के हितों के खिलाफ मान रहे हैं।

हाल के दिनों में ईरान और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत में तेजी आई है। इसी बीच अराघची ने सरकारी टेलीविजन पर एक इंटरव्यू के दौरान संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच तैयार किए जा रहे समझौते पर जल्द ही हस्ताक्षर हो सकते हैं। उनके इस बयान ने ईरानी राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और विरोधी धड़े इसे लेकर सवाल उठाने लगे हैं।

विदेश मंत्री ने अपने बयान में कहा कि वार्ता की अंतिम प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है और यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा तो निकट भविष्य में दोनों देशों के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हस्ताक्षर की प्रक्रिया पारंपरिक तरीके से नहीं होगी, बल्कि डिजिटल माध्यम से पूरी की जा सकती है। यानी किसी बड़े सार्वजनिक समारोह या शीर्ष नेताओं की आमने-सामने मौजूदगी के बिना भी यह औपचारिकता पूरी की जा सकती है।

हालांकि अराघची ने यह भी जोड़ा कि दस्तावेज़ अभी अंतिम रूप में नहीं पहुंचा है और उसमें संशोधन की संभावना बनी हुई है। उनके अनुसार, प्रस्तावित समझौता किसी स्थायी समाधान का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि यह एक अस्थायी राजनीतिक और सुरक्षा ढांचा है, जिसके माध्यम से आगे की बातचीत का रास्ता तैयार किया जाएगा। उन्होंने संकेत दिया कि परमाणु कार्यक्रम से जुड़े जटिल मुद्दों पर विस्तृत चर्चा बाद के चरण में होगी।

ईरान के भीतर कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इस समझौते को एक शुरुआती कदम के रूप में पेश कर रही है ताकि लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम किया जा सके। दूसरी ओर, कट्टरपंथी वर्ग को आशंका है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से अमेरिका को अत्यधिक रियायतें दी जा सकती हैं।

विवाद तब और बढ़ गया जब अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच समझौता पहले की तुलना में कहीं अधिक करीब पहुंच चुका है। उन्होंने मीडिया संस्थानों और राजनीतिक टिप्पणीकारों से अपील की कि आधिकारिक घोषणा से पहले समझौते की शर्तों को लेकर अटकलें लगाने से बचें। उनका कहना था कि अपुष्ट जानकारी और अनुमान प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।

अराघची की इस पोस्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पोस्ट को साझा करते हुए सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। ट्रंप की प्रतिक्रिया को दोनों देशों के बीच बढ़ती नजदीकी के संकेत के रूप में देखा गया। लेकिन ईरान के भीतर यह घटनाक्रम विदेश मंत्री के लिए नई मुश्किलें लेकर आया।

कट्टरपंथी गुटों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा सराहे जाने वाले बयान से ईरान को क्या लाभ होगा। उनका आरोप है कि सरकार समझौते की वास्तविक शर्तों को सार्वजनिक करने से बच रही है और जनता को पूरी जानकारी नहीं दी जा रही है।

ईरान की प्रभावशाली समाचार एजेंसी फार्स, जिसे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के करीबी मंच के रूप में देखा जाता है, ने भी विदेश मंत्री के रुख पर आपत्ति जताई। एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अराघची का बयान अमेरिकी दावों का पर्याप्त जवाब नहीं देता। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि विदेश मंत्री की ओर से मीडिया को संयम बरतने की सलाह दिए जाने से यह संदेश जा सकता है कि ईरानी मीडिया में प्रकाशित कुछ खबरें गलत थीं।

फार्स की आलोचना ऐसे समय सामने आई जब अमेरिका की ओर से भी समझौते की संभावित शर्तों को लेकर कई बयान दिए जा चुके हैं। राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि ईरानी मीडिया में लीक हुई कई जानकारियां वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खातीं। उन्होंने दावा किया था कि प्रकाशित रिपोर्टों में कई तथ्य गलत थे और उनसे भ्रम पैदा हुआ।

अमेरिकी मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरानी पक्ष ने निजी स्तर पर गलत सूचनाओं को लेकर खेद व्यक्त किया था। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन इससे दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत पर राजनीतिक रंग और गहरा हो गया।

इस बीच ईरान की संसद के कुछ सदस्यों ने भी समझौते के प्रारूप पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कट्टरपंथी सांसद महमूद नबावियन ने प्रस्तावित दस्तावेज़ की आलोचना करते हुए कहा कि उपलब्ध मसौदे का अध्ययन करने के बाद उन्हें लगता है कि यह पहले के संस्करणों की तुलना में ईरान के लिए अधिक नुकसानदेह साबित हो सकता है।

नबावियन के अनुसार, बातचीत के दौरान ईरान ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपेक्षा से अधिक नरमी दिखाई है। उनका कहना है कि मसौदे में कुछ ऐसे बिंदु मौजूद हैं जो भविष्य में देश की रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकते हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि किसी भी अंतिम निर्णय से पहले संसद और अन्य प्रमुख संस्थानों को पूरी जानकारी दी जाए।

शुक्रवार की नमाज के बाद भी कई धार्मिक और राजनीतिक नेताओं ने इस विषय पर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। विभिन्न शहरों में दिए गए संबोधनों में वक्ताओं ने कहा कि राष्ट्रीय हितों से जुड़े किसी भी समझौते को सर्वोच्च नेतृत्व की मंजूरी के बिना स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय में देश के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका निर्णायक रहेगी।

विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक समझौते तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ईरान के भीतर मौजूद दो अलग-अलग राजनीतिक सोचों के बीच संघर्ष को भी दर्शाता है। एक पक्ष अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ संवाद बढ़ाकर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव कम करना चाहता है, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि अमेरिका पर भरोसा करना रणनीतिक भूल साबित हो सकती है।

यही वजह है कि संभावित समझौते की हर नई जानकारी ईरान के भीतर नई बहस को जन्म दे रही है। आने वाले दिनों में यदि समझौते पर वास्तव में हस्ताक्षर होते हैं, तो यह केवल अमेरिका और ईरान के संबंधों के लिए ही नहीं बल्कि ईरान की आंतरिक राजनीति के लिए भी एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

फिलहाल स्थिति ऐसी है कि एक ओर सरकार समझौते को कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि दूसरी ओर कट्टरपंथी धड़े इसे राष्ट्रीय हितों पर समझौता मान रहे हैं। इस खींचतान के बीच पूरी दुनिया की नजरें तेहरान और वाशिंगटन पर टिकी हुई हैं, जहां अगले कुछ दिनों में होने वाले घटनाक्रम मध्य पूर्व की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।