प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे का बुधवार को अंतिम दिन है। अपने तीन दिवसीय प्रवास के आखिरी चरण में प्रधानमंत्री इंडोनेशिया के सबसे बड़े और ऐतिहासिक हिंदू मंदिर प्रम्बानन का दौरा करेंगे। लगभग एक हजार वर्ष पुराने इस विश्वप्रसिद्ध मंदिर में दर्शन और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी गतिविधियों के बाद वह शाम को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न के लिए रवाना होंगे। ऑस्ट्रेलिया में उनका कार्यक्रम 8 से 10 जुलाई तक निर्धारित है, जहां कई अहम द्विपक्षीय बैठकों और आर्थिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने का कार्यक्रम है।
इंडोनेशिया की यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया के संबंधों को नई मजबूती मिली है। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण समझौते का ऐलान किया है, जिसके तहत इंडोनेशिया भारत से ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों की खरीद करेगा। इस रक्षा सौदे की अनुमानित कीमत करीब 5,500 करोड़ रुपये बताई जा रही है। यह पहली बार है जब दोनों देशों के बीच इस स्तर का रक्षा समझौता हुआ है। इसके साथ ही भारत को इंडोनेशिया के रणनीतिक महत्व वाले साबांग पोर्ट के विकास की जिम्मेदारी भी सौंपी जाएगी, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सामरिक मौजूदगी और मजबूत होगी।
प्रधानमंत्री मोदी के सम्मान में इंडोनेशिया सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘बिन्तांग आदिपूर्णा’ से सम्मानित किया। यह सम्मान पाने वाले वह चुनिंदा वैश्विक नेताओं में शामिल हो गए हैं। प्रधानमंत्री के लिए यह 35वां अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी है। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने सम्मान प्रदान करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने भारत और इंडोनेशिया के रिश्तों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है और दोनों देशों के बीच सहयोग को लगातार मजबूत किया है।
रक्षा सहयोग के अलावा समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक संपर्क बढ़ाने पर भी दोनों देशों ने विशेष जोर दिया है। मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर स्थित साबांग पोर्ट को भारत द्वारा विकसित किए जाने की योजना को रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह बंदरगाह भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस वजह से हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में भारत की निगरानी क्षमता, समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक हितों को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में साबांग पोर्ट पर भारत की बढ़ती भागीदारी न केवल व्यापारिक दृष्टि से बल्कि सामरिक नजरिए से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी भूमिका और प्रभाव बढ़ाने में सहायता मिलेगी।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों से वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। चीन द्वारा दक्षिण चीन सागर और आसपास के समुद्री इलाकों में अपनी सैन्य गतिविधियों का लगातार विस्तार किया जा रहा है। चीन लगभग 90 प्रतिशत दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा करता है, जबकि फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान भी इस क्षेत्र के कुछ हिस्सों पर अपना अधिकार जताते हैं। चीन ने कई कृत्रिम द्वीप बनाकर वहां हवाई पट्टियां, रडार सिस्टम और मिसाइल तैनात किए हैं, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ा है।
इसी कारण भारत सहित अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस और वियतनाम जैसे कई देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने के लिए आपसी सहयोग बढ़ा रहे हैं। भारत की समुद्री रणनीति में इंडोनेशिया की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है और साबांग पोर्ट परियोजना को इसी दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा भी कई मायनों में अहम रहने वाली है। मेलबर्न पहुंचने के बाद वह ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। दोनों नेताओं के बीच व्यापार, रक्षा, शिक्षा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और निवेश सहित कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होने की संभावना है। यह प्रधानमंत्री मोदी का तीसरा ऑस्ट्रेलिया दौरा होगा, जो प्रधानमंत्री अल्बनीज के आधिकारिक निमंत्रण पर आयोजित किया जा रहा है।
अपने ऑस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री वहां की गवर्नर-जनरल सैम मोस्टिन से भी मुलाकात करेंगे। इसके अलावा वह भारत-ऑस्ट्रेलिया सीईओ फोरम में शामिल होकर दोनों देशों के प्रमुख उद्योगपतियों और कारोबारी प्रतिनिधियों को संबोधित करेंगे। इस मंच पर निवेश, व्यापार विस्तार और नई आर्थिक साझेदारियों पर चर्चा की जाएगी। प्रधानमंत्री भारतीय समुदाय के एक बड़े कार्यक्रम में भी भाग लेंगे, जहां प्रवासी भारतीयों को संबोधित करने का कार्यक्रम तय है।
इंडोनेशिया और भारत के संबंध केवल आधुनिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत में भी दिखाई देती हैं। इतिहासकारों के अनुसार दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्क करीब दो हजार वर्षों से बने हुए हैं। प्राचीन समय में भारतीय व्यापारी, हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायी तथा विद्वान इंडोनेशिया पहुंचे, जिसका प्रभाव आज भी वहां की संस्कृति में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इंडोनेशिया के बाली और जावा जैसे क्षेत्रों में आज भी रामायण और महाभारत पर आधारित नृत्य-नाटकों का मंचन किया जाता है। कई मंदिरों की वास्तुकला और स्थानीय परंपराओं में भारतीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। प्रम्बानन मंदिर इसी सांस्कृतिक विरासत का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और हर वर्ष लाखों पर्यटक यहां पहुंचते हैं।
इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश है, लेकिन इसके बावजूद वहां भारतीय संस्कृति और हिंदू विरासत के अनेक प्रतीक आज भी सुरक्षित हैं। अतीत में इंडोनेशिया के 20 हजार रुपिया के नोट पर भगवान गणेश की तस्वीर भी छपी थी, जिसे दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय प्रतीकों, कला, साहित्य और पारंपरिक आयोजनों में भारतीय प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री मोदी का मौजूदा विदेशी दौरा उनके कार्यकाल का 102वां विदेश दौरा है। वह तीसरी बार इंडोनेशिया पहुंचे हैं। इससे पहले उन्होंने मई 2018 में पहली बार इंडोनेशिया का दौरा किया था। इसके बाद सितंबर 2023 में वह जकार्ता में आयोजित आसियान-भारत शिखर सम्मेलन और ईस्ट एशिया समिट में भाग लेने के लिए यहां आए थे। इस बार की यात्रा में रक्षा, समुद्री सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और सांस्कृतिक संबंधों को नई दिशा देने वाले कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और इंडोनेशिया के बीच बढ़ती साझेदारी केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सामरिक स्थिति पर भी दिखाई देगा। रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक संपर्क और सांस्कृतिक रिश्तों को एक साथ मजबूत करने की रणनीति दोनों देशों के संबंधों को आने वाले वर्षों में नई ऊंचाई देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इंडोनेशिया से ऑस्ट्रेलिया के लिए प्रधानमंत्री मोदी का अगला पड़ाव भी इसी व्यापक कूटनीतिक अभियान का हिस्सा माना जा रहा है, जहां भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर विशेष जोर रहेगा।



