रूसी तेल खरीद पर अमेरिका की सख्ती की तैयारी, भारत समेत 5 देशों पर 100% टैरिफ का प्रस्ताव; संसद में नया बिल पेश

रूसी तेल खरीद पर अमेरिका की सख्ती की तैयारी, भारत समेत 5 देशों पर 100% टैरिफ का प्रस्ताव; संसद में नया बिल पेश

अमेरिका ने रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी सीनेट में एक संशोधित प्रतिबंध विधेयक (सैंक्शन बिल) पेश किया गया है, जिसमें रूस से तेल और गैस खरीद जारी रखने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। यदि यह कानून बन जाता है, तो भारत सहित कई देशों के अमेरिका के साथ व्यापार पर व्यापक असर पड़ सकता है।

इस प्रस्तावित कानून का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय को कम करना बताया गया है। अमेरिकी सांसदों का मानना है कि रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई उसकी सैन्य गतिविधियों को आर्थिक समर्थन देती है। ऐसे में जो देश बड़ी मात्रा में रूसी ऊर्जा खरीद रहे हैं, उन पर आर्थिक दबाव बनाकर रूस की आय घटाने की कोशिश की जा रही है।

प्रस्तावित बिल में भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। इन देशों पर 100% आयात शुल्क लगाने का सुझाव दिया गया है, क्योंकि ये रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहे हैं। इससे पहले तैयार किए गए प्रारंभिक मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रावधान था, लेकिन बाद में चर्चा के बाद इसे घटाकर 100% कर दिया गया।

यह विधेयक केवल ऊर्जा आयात करने वाले देशों तक सीमित नहीं है। इसमें रूस के सरकारी अधिकारियों, केंद्रीय बैंक, सरकारी ऊर्जा परियोजनाओं और तथाकथित “शैडो टैंकर फ्लीट” पर भी प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इन जहाजों का उपयोग रूस प्रतिबंधों से बचते हुए तेल निर्यात करने के लिए करता है।

अगर यह कानून लागू होता है, तो यह अमेरिका की व्यापार नीति में एक बड़ा बदलाव माना जाएगा। पहली बार किसी देश पर केवल इसलिए भारी टैरिफ लगाने की बात हो रही है क्योंकि वह रूस से तेल खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दे रहा है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों पर भी असर पड़ सकता है।

भारत की बात करें तो हाल के महीनों में रूस उसका सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। जून 2026 के दौरान भारत ने रूस से प्रतिदिन लगभग 26.1 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया। यह भारत के कुल तेल आयात का करीब 52.4 प्रतिशत हिस्सा था। दूसरे शब्दों में कहें तो देश में आयात होने वाले प्रत्येक दो बैरल तेल में एक से अधिक बैरल रूस से आया। मई की तुलना में जून में रूस से तेल खरीद में लगभग 39 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

रूस से मिलने वाला अपेक्षाकृत सस्ता कच्चा तेल भारत के लिए आयात लागत कम करने में मददगार रहा है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से खरीद लगातार बढ़ाई है। हालांकि, यदि अमेरिकी प्रस्ताव कानून का रूप लेता है, तो भारत को ऊर्जा सुरक्षा और निर्यात हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ सकता है।

प्रस्तावित कानून में रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कुछ अन्य देशों का भी उल्लेख किया गया है। चीन, फ्रांस, जापान, हंगरी और बेल्जियम जैसे देश इस दायरे में आ सकते हैं। हालांकि, उन देशों के लिए राहत का प्रावधान रखा गया है जो रूस से अपनी कुल गैस जरूरत का 15 प्रतिशत से कम आयात करते हैं और धीरे-धीरे उस पर निर्भरता कम कर रहे हैं।

इसी आधार पर 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ से छूट देने का सुझाव दिया गया है। अमेरिकी सांसदों का कहना है कि इन देशों ने पहले ही रूस पर अपनी ऊर्जा निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठाए हैं, इसलिए उन्हें समान श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।

डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने स्पष्ट किया कि इस बिल का उद्देश्य यूरोपीय सहयोगियों को निशाना बनाना नहीं है। उनके अनुसार, कार्रवाई केवल उन देशों के खिलाफ प्रस्तावित है जो आज भी रूस की ऊर्जा आय का सबसे बड़ा स्रोत बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए यह कदम जरूरी माना जा रहा है।

बिल में रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा उत्पादन से जुड़े ढांचे, बड़े कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने का भी प्रस्ताव शामिल है। अमेरिकी सांसदों का दावा है कि इससे रूस की आर्थिक क्षमता और युद्ध संचालन की वित्तीय ताकत कमजोर की जा सकेगी।

इस प्रस्ताव को अमेरिकी राजनीति में विशेष महत्व इसलिए भी मिल रहा है क्योंकि इसे रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों का समर्थन प्राप्त है। अमेरिका में ऐसे विधेयकों को “बाइपार्टिसन बिल” कहा जाता है। आमतौर पर बड़े कानून राजनीतिक मतभेदों के कारण लंबे समय तक अटक जाते हैं, लेकिन जब दोनों प्रमुख दल एक मंच पर आ जाते हैं तो विधेयक के पारित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

फिलहाल यह बिल केवल सीनेट में पेश किया गया है। इसे कानून बनने के लिए पहले सीनेट से मंजूरी लेनी होगी, उसके बाद प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) की स्वीकृति आवश्यक होगी। दोनों सदनों से पारित होने के बाद ही यह राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा और अंतिम मंजूरी मिलने पर कानून का रूप ले सकेगा।

संशोधित प्रस्ताव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को विशेष अधिकार देने की भी व्यवस्था की गई है। यदि राष्ट्रपति को लगे कि किसी देश को राहत देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है, तो वे प्रस्तावित टैरिफ या प्रतिबंधों में छूट दे सकते हैं। इससे भविष्य में परिस्थितियों के अनुसार लचीलापन बनाए रखने की कोशिश की गई है।

इस विधेयक का मूल मसौदा अप्रैल 2025 में रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने पेश किया था। 11 जुलाई को लिंडसे ग्राहम के निधन के बाद ट्रम्प ने कहा कि इस बिल को आगे बढ़ाना ग्राहम की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल था और उनकी स्मृति में इसे आगे बढ़ाया जा रहा है। अब तक 26 सीनेटर इस प्रस्ताव का समर्थन कर चुके हैं और आने वाले समय में समर्थन बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

टैरिफ लगाने के अधिकार को लेकर अमेरिका में कानूनी स्थिति भी इस नए बिल के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही है। पहले ट्रम्प प्रशासन ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का हवाला देकर कई देशों पर टैरिफ लगाने की कोशिश की थी। इस कानून के तहत राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर आर्थिक कदम उठाए जा सकते थे।

लेकिन 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि IEEPA राष्ट्रपति को सीधे टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता। अदालत ने कहा कि आयात शुल्क लगाने की संवैधानिक शक्ति मुख्य रूप से अमेरिकी कांग्रेस के पास है। इसी फैसले के बाद अब संसद के माध्यम से नया कानून लाने की प्रक्रिया शुरू की गई है, ताकि भविष्य में राष्ट्रपति को स्पष्ट कानूनी अधिकार मिल सके।

यदि प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ वास्तव में लागू होता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर इसके कई बड़े प्रभाव पड़ सकते हैं। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है, जहां भारत हर साल लगभग 6.5 लाख करोड़ रुपये मूल्य का सामान भेजता है। इतना बड़ा आयात शुल्क लगने पर भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में काफी महंगे हो जाएंगे, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कम हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से सस्ता तेल खरीदकर भारत को जो आर्थिक बचत होती है, उससे कहीं अधिक नुकसान अमेरिकी बाजार में निर्यात घटने से हो सकता है। कपड़ा, दवा, हीरा, इंजीनियरिंग उत्पाद और अन्य प्रमुख निर्यात क्षेत्रों पर सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

निर्यात में गिरावट आने पर लाखों लोगों की रोजगार सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है। अनुमान है कि वस्त्र, रत्न एवं आभूषण तथा फार्मास्युटिकल उद्योगों से जुड़े 15 से 20 लाख लोगों की आजीविका पर असर पड़ सकता है। साथ ही विदेशी मुद्रा आय कम होने से डॉलर की उपलब्धता घट सकती है, जिससे भारतीय रुपये पर भी दबाव बढ़ने की संभावना रहेगी।

हालांकि, अभी यह प्रस्ताव केवल विधायी प्रक्रिया के शुरुआती चरण में है। इसे कानून बनने में कई संवैधानिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। इसलिए अंतिम निर्णय आने तक स्थिति में बदलाव संभव है। फिर भी, इस कदम ने वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को लेकर नई बहस शुरू कर दी है, जिस पर दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।

(Photo : AI Generated)