जगन्नाथ रथयात्रा 2026: पुरी और अहमदाबाद में आस्था का महासागर, लाखों श्रद्धालु बने ऐतिहासिक यात्रा के साक्षी

जगन्नाथ रथयात्रा 2026: पुरी और अहमदाबाद में आस्था का महासागर, लाखों श्रद्धालु बने ऐतिहासिक यात्रा के साक्षी

भगवान जगन्नाथ की विश्वविख्यात रथयात्रा का शुभारंभ आज पूरे धार्मिक उत्साह और भव्यता के साथ ओडिशा के पुरी तथा गुजरात के अहमदाबाद में हो रहा है। देश के अलग-अलग राज्यों से लाखों श्रद्धालु इस दिव्य आयोजन में भाग लेने के लिए दोनों शहरों में पहुंच चुके हैं। पुरी में रातभर हुई मूसलाधार बारिश भी भक्तों की श्रद्धा को डिगा नहीं सकी। बारिश के बीच लोग पूरी रात रथयात्रा मार्ग पर डटे रहे और सुबह होते ही भगवान के दर्शन के लिए लंबी कतारों में खड़े दिखाई दिए। मौसम विभाग ने आज भी भारी वर्षा की संभावना जताई है, लेकिन भक्तों का उत्साह पहले की तरह बरकरार है।

अहमदाबाद में रथयात्रा की शुरुआत से पहले जामालपुर स्थित ऐतिहासिक जगन्नाथ मंदिर में तड़के सुबह मंगला आरती का आयोजन किया गया। इस विशेष पूजा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह अपने परिवार के साथ शामिल हुए। मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। धार्मिक अनुष्ठानों के पूरा होने के बाद भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा को उनके-अपने रथों पर विराजमान किया गया। इसके बाद गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने पारंपरिक ‘पहिंद विधि’ के तहत सोने की झाड़ू से रथ के आगे सफाई कर विनम्र सेवा का संदेश दिया। यह रस्म पूरी होने के बाद तीनों रथ लगभग 16 किलोमीटर लंबी यात्रा पर रवाना हुए।

उधर, पुरी में भी रथयात्रा को लेकर सुबह से धार्मिक गतिविधियां तेज रहीं। निर्धारित समय पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को भव्य रथों पर विराजमान कराया गया। इसके बाद पुरी के गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव ने सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए ‘छेरा पहरा’ रस्म निभाई। इस अनुष्ठान में गजपति महाराजा स्वयं सोने की झाड़ू से तीनों रथों के आसपास सफाई करते हैं और चंदन मिश्रित सुगंधित जल का छिड़काव करते हैं। यह परंपरा इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि भगवान के समक्ष राजा और सामान्य व्यक्ति में कोई भेद नहीं होता। गजपति महाराजा स्वयं को भगवान का प्रथम सेवक मानकर यह सेवा करते हैं।

रथयात्रा के दौरान भगवानों के रथों का क्रम भी विशेष धार्मिक महत्व रखता है। सबसे पहले भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ आगे बढ़ता है। उसके पीछे देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ चलता है, जबकि सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ अपने नंदीघोष रथ पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देते हुए यात्रा करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बड़े भाई होने के कारण बलभद्र सबसे पहले मार्ग प्रशस्त करते हैं। उनके पीछे बहन सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ चलते हैं। यही परंपरा वापसी यात्रा यानी बहुदा यात्रा के दौरान भी निभाई जाती है।

पुरी में रथयात्रा के दौरान भगवानों के रथों को श्रद्धालु अपने हाथों से खींचते हैं। लाखों भक्तों का विश्वास है कि रथ की रस्सी को स्पर्श करने और उसे खींचने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। भगवान जगन्नाथ का रथ गुंडिचा मंदिर तक लगभग तीन किलोमीटर की दूरी तय करता है। मान्यता है कि यह यात्रा भगवान के अपनी मौसी के घर जाने का प्रतीक है, इसलिए भक्त इसे अत्यंत शुभ और पवित्र अवसर मानते हैं।

इस बार पुरी और अहमदाबाद दोनों स्थानों पर लगभग 15-15 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। इसी को देखते हुए सुरक्षा और व्यवस्थाओं को अभूतपूर्व स्तर पर मजबूत किया गया है। ओडिशा में पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के करीब 12 हजार जवानों को तैनात किया गया है। सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी के लिए 19 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। रथयात्रा मार्ग, मंदिर परिसर और भीड़ वाले क्षेत्रों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से बचा जा सके।

आधुनिक तकनीक का भी इस बार व्यापक उपयोग किया गया है। पूरे रथयात्रा मार्ग पर 473 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिनके माध्यम से हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। श्रद्धालुओं को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए 65 एलईडी डिस्प्ले स्क्रीन स्थापित की गई हैं। संचार व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए 16 स्थायी टेलीकॉम टावर सक्रिय किए गए हैं। प्रशासन का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा उनकी पहली प्राथमिकता है।

स्वास्थ्य सुविधाओं का भी विशेष ध्यान रखा गया है। रथयात्रा मार्ग और आसपास के क्षेत्रों में आठ अस्थायी अस्पताल बनाए गए हैं, जहां डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की टीमें चौबीसों घंटे तैनात रहेंगी। इसके अलावा लगभग 1,700 बायो टॉयलेट लगाए गए हैं ताकि स्वच्छता व्यवस्था प्रभावित न हो। गर्मी और भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने 360 डिग्री हाई-प्रेशर वाटर टावर भी लगाए हैं। ये टावर चारों दिशाओं में पानी की फुहार छोड़कर श्रद्धालुओं को राहत पहुंचाने के साथ-साथ आपात स्थिति में आग पर नियंत्रण करने में भी मदद करेंगे।

रेलवे ने भी श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक इंतजाम किए हैं। देशभर से पुरी आने वाले यात्रियों की संख्या को देखते हुए भारतीय रेलवे ने 300 से अधिक स्पेशल ट्रेनें चलाई हैं। पुरी रेलवे स्टेशन पर करीब 30 हजार यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था की गई है। स्टेशन परिसर में अतिरिक्त टिकट काउंटर, हेल्प डेस्क, चिकित्सा सहायता केंद्र और भीड़ नियंत्रण के विशेष इंतजाम किए गए हैं ताकि यात्रियों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।

रथयात्रा का सबसे आकर्षक पक्ष तीनों रथों की अलग-अलग पहचान है। भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ लाल और पीले रंग का होता है, जिसे तैयार करने में 832 लकड़ी के टुकड़ों का उपयोग किया जाता है। भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ लाल और हरे रंग का होता है तथा इसके निर्माण में 763 लकड़ी के टुकड़े लगाए जाते हैं। वहीं देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ लाल और काले रंग से सुसज्जित होता है, जिसके निर्माण में 593 लकड़ी के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। तीनों रथों की ऊंचाई, पहियों की संख्या, ध्वज, रस्सियां, सारथी और अन्य धार्मिक प्रतीक भी एक-दूसरे से अलग होते हैं। हर वर्ष इन रथों का निर्माण पारंपरिक विधि से नए सिरे से किया जाता है, जो इस आयोजन की सबसे अनूठी विशेषताओं में शामिल है।

बारिश, भीड़ और मौसम की चुनौतियों के बावजूद पुरी और अहमदाबाद में श्रद्धालुओं की आस्था चरम पर दिखाई दे रही है। भक्तों का मानना है कि भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में शामिल होना और उनके रथ के दर्शन करना जीवन का अत्यंत पुण्यदायी अवसर होता है। प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियां, स्वास्थ्य विभाग, रेलवे और स्थानीय स्वयंसेवी संगठन मिलकर यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि करोड़ों लोगों की आस्था का यह महापर्व शांतिपूर्ण, सुरक्षित और सुव्यवस्थित तरीके से संपन्न हो। यही कारण है कि हर वर्ष की तरह इस बार भी जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक समानता और सामूहिक श्रद्धा का भव्य उत्सव बनकर सामने आई है।