₹22 हजार करोड़ के दावों के बीच सिर्फ ₹6.5 करोड़ का प्रस्ताव, सुभाष चंद्रा की दिवालिया प्रक्रिया पर आज NCLT में बड़ी सुनवाई

₹22 हजार करोड़ के दावों के बीच सिर्फ ₹6.5 करोड़ का प्रस्ताव, सुभाष चंद्रा की दिवालिया प्रक्रिया पर आज NCLT में बड़ी सुनवाई

ज़ी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़ी व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया का मामला अब नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के सामने एक अहम मोड़ पर पहुंच गया है। करीब ₹22,006.57 करोड़ के कर्ज दावों के बीच महज ₹6.5 करोड़ के भुगतान वाली योजना को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस विवाद को सुलझाने के लिए NCLT ने अपने इतिहास में पहली बार पांच सदस्यीय बेंच का गठन किया है।

NCLT की प्रिंसिपल बेंच इस मामले की सुनवाई मंगलवार से शुरू करेगी। इस बेंच की अध्यक्षता NCLT के प्रेसिडेंट जस्टिस अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल करेंगे। उनके साथ बचु वेंकट बालाराम दास, महेंद्र खंडेलवाल, अतुल चतुर्वेदी और रविंद्र चतुर्वेदी सदस्य के तौर पर शामिल होंगे। पांच सदस्यीय बेंच के गठन को इस मामले की गंभीरता और कानूनी जटिलता से जोड़कर देखा जा रहा है।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले दो सदस्यीय NCLT बेंच भुगतान योजना पर एकमत नहीं हो सकी थी। अलग-अलग राय सामने आने के बाद मामला तीसरे सदस्य के पास भेजा गया। तीसरे सदस्य ने 26 अगस्त को ₹6.5 करोड़ की भुगतान योजना को मंजूरी दे दी थी। अब इसी फैसले को लेकर असहमत कर्जदाताओं ने NCLAT का दरवाजा खटखटाया है।

करोड़ों नहीं, हजारों करोड़ का दावा और भुगतान सिर्फ ₹6.5 करोड़

इस विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा कर्ज की कुल रकम और प्रस्तावित भुगतान के बीच का भारी अंतर है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, सुभाष चंद्रा के खिलाफ अलग-अलग बैंकों, वित्तीय संस्थानों और अन्य कर्जदाताओं के कुल दावे लगभग ₹22,006.57 करोड़ हैं। इसके मुकाबले प्रस्तावित भुगतान राशि सिर्फ ₹6.5 करोड़ रखी गई है।

यही अंतर इस मामले को बेहद विवादास्पद बना रहा है। असहमत कर्जदाताओं का कहना है कि इतनी कम रकम में बड़ी देनदारी का निपटारा करने से दिवालिया कानून के मूल उद्देश्य पर सवाल खड़े हो सकते हैं। उनका तर्क है कि कर्जदाताओं के अधिकारों और उनकी वसूली की संभावनाओं को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए।

दूसरी ओर, भुगतान योजना को मंजूरी देने वाले तीसरे सदस्य ने इसे संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत स्वीकार किया था। इसी फैसले की वैधता और इसके प्रभाव को लेकर अब व्यापक सुनवाई की जरूरत महसूस हुई है।

कैसे उलझा पूरा मामला?

सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया से संबंधित योजना पर शुरुआत में NCLT की दो सदस्यीय बेंच ने विचार किया था। लेकिन दोनों न्यायिक सदस्यों के बीच इस बात पर सहमति नहीं बन सकी कि भुगतान योजना को किस तरह लागू किया जाए।

मतभेद के चलते मामला तीसरे सदस्य के पास भेजा गया। तीसरे सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज ने 26 अगस्त को अपना आदेश जारी करते हुए ₹6.5 करोड़ की भुगतान योजना को मंजूरी दे दी।

इस आदेश में यह भी कहा गया कि योजना उन कर्जदाताओं पर लागू होगी, जिन्होंने इसके पक्ष में मतदान किया था। ऐसे कर्जदाताओं का हिस्सा करीब 80.8% बताया गया है। यानी योजना को समर्थन देने वाले लेनदारों का प्रतिशत काफी अधिक था।

हालांकि, करीब 19.2% हिस्सेदारी रखने वाले कुछ बैंक और वित्तीय संस्थान इस प्रस्ताव से सहमत नहीं थे। इन असहमत कर्जदाताओं को लेकर भी आदेश में अलग व्यवस्था की गई थी।

19.2% कर्जदाताओं को अलग से वसूली का रास्ता

तीसरे सदस्य के आदेश के मुताबिक, योजना के विरोध में रहने वाले बैंकों और वित्तीय संस्थानों को सुभाष चंद्रा से अपनी देनदारी की अलग से वसूली करने की अनुमति दी गई थी। इसका मतलब यह था कि योजना के पक्ष में वोट करने वाले लेनदारों और विरोध करने वाले लेनदारों के अधिकारों को अलग-अलग तरीके से देखा गया।

अशोक कुमार भारद्वाज ने अपने आदेश में कहा था कि भुगतान योजना का असर उन लेनदारों पर होगा जिन्होंने इसे स्वीकार किया है। दूसरी ओर, असहमत संस्थानों को अपने दावों की वसूली के लिए अलग रास्ता उपलब्ध रहेगा।

लेकिन बाद में इस आदेश की व्याख्या को लेकर ही कानूनी विवाद गहरा गया। दो सदस्यीय बेंच के सामने यह सवाल उठा कि क्या तीसरे सदस्य द्वारा दी गई मंजूरी के बाद सभी लेनदारों के अधिकारों पर समान प्रभाव पड़ेगा या नहीं।

बेंच के सदस्यों की राय में क्यों आया अंतर?

मामले में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु यह बना कि अलग-अलग सदस्यों ने कर्जदाताओं के अधिकारों को अलग तरीके से देखा। बेंच की ओर से यह कहा गया कि न्यायिक सदस्य ने बैंकों, वित्तीय संस्थानों और असहमत लेनदारों के मूल कर्ज को समाप्त नहीं किया था।

वहीं, तीसरे सदस्य ने भुगतान योजना को मंजूरी देते समय कंपनी कानून की धारा 115(1) के तहत सभी लेनदारों के अधिकारों को समाप्त करने की बात कही थी। यही अंतर मामले की कानूनी स्थिति को और जटिल बनाता है।

चूंकि दो सदस्यीय बेंच इस मुद्दे पर बहुमत की स्पष्ट राय नहीं बना सकी, इसलिए मामला NCLT के अध्यक्ष के पास भेजा गया। इसके बाद अब पांच सदस्यीय बेंच का गठन किया गया है।

NCLT के इतिहास में पहली बार पांच सदस्यीय बेंच

इस केस की एक बड़ी खासियत यह भी है कि NCLT के इतिहास में पहली बार किसी मामले की सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय बेंच बनाई गई है।

नई बेंच में अध्यक्ष के अलावा चार अन्य सदस्य शामिल हैं। जस्टिस अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल इसकी अध्यक्षता करेंगे। उनके साथ बचु वेंकट बालाराम दास, महेंद्र खंडेलवाल, अतुल चतुर्वेदी और रविंद्र चतुर्वेदी मामले पर सुनवाई करेंगे।

पांच सदस्यीय बेंच से यह उम्मीद की जा रही है कि वह भुगतान योजना, कर्जदाताओं के अधिकार और व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया से जुड़े कानूनी सवालों पर स्पष्टता देगी। मंगलवार की सुनवाई इसलिए अहम होगी क्योंकि बेंच को पूरे विवाद के विभिन्न पहलुओं पर विचार करना है।

असहमत कर्जदाताओं ने NCLAT में भी अपील की

NCLT में सुनवाई शुरू होने से पहले ही असहमत कर्जदाताओं ने एहतियाती कदम उठाते हुए नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) का रुख कर लिया है।

उन्होंने 26 अगस्त के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें करीब ₹22,006.57 करोड़ के दावों के मुकाबले ₹6.5 करोड़ की भुगतान योजना को मंजूरी दी गई थी।

सोमवार को इस मामले को NCLAT के सामने रखा गया। LIC हाउसिंग फाइनेंस की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश कीं। उन्होंने मामले में जल्द सुनवाई की मांग की। NCLAT की बेंच में कार्यवाहक अध्यक्ष जस्टिस योगेश खन्ना भी शामिल थे।

तुषार मेहता ने सिर्फ LIC हाउसिंग फाइनेंस की ओर से ही नहीं, बल्कि केनरा बैंक और यूनियन बैंक की ओर से भी दलीलें रखीं।

IBC के उद्देश्य पर भी उठाया सवाल

सुनवाई के दौरान कर्जदाताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि यदि तीसरे सदस्य का आदेश प्रभावी रहता है तो इसका असर इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के मूल उद्देश्य पर पड़ सकता है।

कर्जदाताओं का पक्ष यह है कि दिवालिया प्रक्रिया का मकसद सिर्फ किसी व्यक्ति या कंपनी को राहत देना नहीं, बल्कि कर्जदाताओं के हितों को भी सुरक्षित रखना है। उनके मुताबिक, यदि हजारों करोड़ रुपये के दावों के सामने बेहद कम भुगतान वाली योजना को लागू कर दिया जाता है, तो इससे भविष्य के मामलों पर भी असर पड़ सकता है।

यही वजह है कि असहमत संस्थानों ने NCLAT में मामले को उठाया है। उन्होंने तत्काल सुनवाई की मांग करते हुए तीसरे सदस्य के आदेश पर सवाल खड़े किए हैं।

अब सबकी नजर मंगलवार की सुनवाई पर

अब इस पूरे विवाद का अगला अहम पड़ाव NCLT की पांच सदस्यीय प्रिंसिपल बेंच की सुनवाई है। बेंच के सामने एक तरफ ₹6.5 करोड़ की स्वीकृत भुगतान योजना है, जबकि दूसरी तरफ ₹22,006.57 करोड़ से अधिक के कर्ज दावे हैं।

इसके अलावा बेंच को यह भी देखना होगा कि योजना का प्रभाव किन कर्जदाताओं पर पड़ेगा, असहमत बैंकों और वित्तीय संस्थानों के अधिकार किस हद तक सुरक्षित रहेंगे और तीसरे सदस्य द्वारा दिए गए आदेश की कानूनी स्थिति क्या है।

चूंकि इस मामले में पहले ही दो सदस्यीय बेंच की राय अलग-अलग रही है और बाद में तीसरे सदस्य के आदेश के खिलाफ अपील भी दाखिल हो चुकी है, इसलिए मंगलवार की सुनवाई से इस विवाद की दिशा तय होने की उम्मीद है।

फिलहाल, सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया से जुड़े इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या करीब ₹22 हजार करोड़ के दावों के बीच ₹6.5 करोड़ की भुगतान योजना कानूनी रूप से टिक पाएगी। पांच सदस्यीय बेंच अब इसी विवाद के अलग-अलग पहलुओं पर विचार करेगी।