2026 के नोबेल पुरस्कारों में भौतिकी के सम्मान का ऐलान आज किया जाएगा। दुनिया भर के वैज्ञानिकों की नजर रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज की घोषणा पर टिकी हुई है, क्योंकि इसी के जरिए इस साल फिजिक्स के क्षेत्र में असाधारण योगदान देने वाले वैज्ञानिकों के नाम सामने आएंगे। नोबेल पुरस्कार हर साल उन खोजों और वैज्ञानिक उपलब्धियों को सम्मानित करता है, जिनका किसी क्षेत्र की समझ को बदलने या भविष्य की तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा हो। इस बार भी संभावित दावेदारों को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में कई नामों और शोध क्षेत्रों की चर्चा चल रही है।
2026 के संभावित फिजिक्स नोबेल को लेकर जिन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, उनमें मेटामटेरियल्स, ग्राफीन और ट्विस्ट्रोनिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग तथा बेहद सटीक ऑप्टिकल घड़ियों की तकनीक शामिल है। इन क्षेत्रों में लंबे समय से काम कर रहे कई वैज्ञानिकों ने आधुनिक भौतिकी और तकनीक की दिशा को प्रभावित किया है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि नोबेल कमेटी पुरस्कार की आधिकारिक घोषणा से पहले संभावित विजेताओं की कोई सूची जारी नहीं करती। इसलिए जिन वैज्ञानिकों के नाम चर्चा में हैं, वे केवल विशेषज्ञों और वैज्ञानिक समुदाय के अनुमान हैं।
मेटामटेरियल्स ने बदली रोशनी को नियंत्रित करने की सोच
संभावित दावेदारों में ब्रिटेन के इम्पीरियल कॉलेज लंदन से जुड़े भौतिक विज्ञानी जॉन पेंड्री का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। उनका वैज्ञानिक काम मेटामटेरियल्स के क्षेत्र से जुड़ा है। मेटामटेरियल्स ऐसी कृत्रिम रूप से तैयार की गई सामग्रियां होती हैं, जिन्हें सामान्य प्राकृतिक पदार्थों से अलग विशेष भौतिक गुण देने के उद्देश्य से डिजाइन किया जाता है।
पेंड्री के शोध ने इस बात को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि किसी कृत्रिम संरचना की मदद से प्रकाश और विद्युतचुंबकीय तरंगों के व्यवहार को किस तरह नियंत्रित किया जा सकता है। इस क्षेत्र ने वैज्ञानिकों के सामने ऐसी संभावनाएं भी रखीं, जिनमें प्रकाश को असामान्य तरीके से मोड़ना या किसी वस्तु को एक विशेष परिस्थिति में छिपा हुआ दिखाने जैसा प्रभाव पैदा करना संभव हो सकता है।
मेटामटेरियल्स से जुड़े शोध में डेविड स्मिथ और फेडेरिको कैपासो जैसे वैज्ञानिकों के नाम भी संभावित सम्मान को लेकर चर्चा में हैं। यह क्षेत्र सिर्फ सैद्धांतिक भौतिकी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके संभावित उपयोग ऑप्टिक्स, सेंसर, संचार और दूसरी उन्नत तकनीकों में देखे जाते हैं।
ग्राफीन की दो परतों को घुमाने से खुला नया रास्ता
फिजिक्स नोबेल की संभावित सूची में एक और बेहद चर्चित क्षेत्र ट्विस्ट्रोनिक्स है। इस क्षेत्र में ग्राफीन जैसी बेहद पतली सामग्री की परतों को एक-दूसरे के ऊपर एक निश्चित कोण से घुमाकर उनके भौतिक गुणों में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जाता है।
इस शोध से जुड़े पाब्लो जारिलो-हरेरो, एलन मैकडोनाल्ड और ईवा अंद्रेई के नाम भी चर्चा में हैं। ग्राफीन कार्बन की एक अत्यंत पतली परत है, लेकिन इसकी इलेक्ट्रॉनिक और भौतिक विशेषताएं इसे वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाती हैं। जब ग्राफीन की दो परतों को एक खास कोण पर मोड़ा या घुमाया जाता है, तो उनके इलेक्ट्रॉनिक गुणों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकता है।
कुछ परिस्थितियों में ऐसी संरचनाओं में सुपरकंडक्टिविटी जैसे गुण दिखाई दे सकते हैं। इस खोज ने पदार्थों के व्यवहार को नियंत्रित करने और नई क्वांटम अवस्थाओं को समझने के लिए एक नया शोध क्षेत्र तैयार किया। ट्विस्ट्रोनिक्स से जुड़े इन तीनों वैज्ञानिकों को 2026 में कावली नैनोसाइंस पुरस्कार भी मिल चुका है, जिसके बाद फिजिक्स नोबेल को लेकर उनके नामों की चर्चा और बढ़ी है।
क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में भी बड़े नाम दावेदार
इस साल की संभावित चर्चाओं में क्वांटम कंप्यूटिंग भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है। क्वांटम कंप्यूटर पारंपरिक कंप्यूटरों से बिल्कुल अलग सिद्धांतों पर काम करते हैं। इनमें जानकारी को क्वांटम अवस्था के रूप में संभाला जाता है और यही वजह है कि इनके निर्माण और संचालन में बेहद जटिल वैज्ञानिक चुनौतियां सामने आती हैं।
क्वांटम सिस्टम की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक उनकी संवेदनशीलता है। बाहरी वातावरण से होने वाली मामूली गड़बड़ी भी क्वांटम जानकारी को प्रभावित कर सकती है। इसी कारण क्वांटम एरर करेक्शन यानी क्वांटम जानकारी को त्रुटियों से बचाने की तकनीक इस क्षेत्र का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
इसी क्षेत्र से जुड़े अलेक्सी किताएव, जॉन प्रेस्किल और पीटर शोर के नाम भी 2026 के फिजिक्स नोबेल के संभावित दावेदारों में शामिल किए जा रहे हैं। इन वैज्ञानिकों के शोध ने क्वांटम सूचना विज्ञान, क्वांटम एरर करेक्शन और क्वांटम कंप्यूटिंग के सैद्धांतिक आधार को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है।
क्वांटम कंप्यूटिंग को भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीकों में गिना जा रहा है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि पर्याप्त विश्वसनीय क्वांटम मशीनें विकसित होने पर वे ऐसे जटिल सवालों को हल करने में मदद कर सकती हैं, जिन्हें पारंपरिक कंप्यूटरों के लिए हल करना बेहद कठिन है।
समय को पहले से कहीं ज्यादा सटीक तरीके से मापने की तकनीक
फिजिक्स नोबेल की चर्चा में एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र ऑप्टिकल लैटिस क्लॉक है। इस तकनीक से जुड़ा काम हिदेतोशी कातोरी और जून ये जैसे वैज्ञानिकों ने किया है। ऑप्टिकल लैटिस क्लॉक को दुनिया की सबसे सटीक समय मापने वाली तकनीकों में शामिल किया जाता है।
इन घड़ियों में परमाणुओं और लेजर तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। सामान्य घड़ियों की तुलना में ये बेहद सूक्ष्म स्तर पर समय को माप सकती हैं। इतनी अधिक सटीकता के कारण इनका महत्व केवल समय बताने तक सीमित नहीं है। इनका इस्तेमाल मूलभूत भौतिकी के प्रयोगों, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में होने वाले बेहद छोटे बदलावों के अध्ययन और भविष्य की उन्नत तकनीकों में किया जा सकता है।
बेहद सटीक घड़ियों की तकनीक का असर नेविगेशन, संचार और GPS जैसी प्रणालियों पर भी पड़ सकता है। इसी वजह से ऑप्टिकल क्लॉक को आधुनिक विज्ञान की उन तकनीकों में माना जाता है, जो आगे चलकर कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
2025 में तीन वैज्ञानिकों को मिला था फिजिक्स नोबेल
पिछले साल यानी 2025 के भौतिकी के नोबेल पुरस्कार का संबंध क्वांटम भौतिकी से जुड़ी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि से था। यह सम्मान जॉन क्लार्क, मिशेल एच. डेवोरेट और जॉन एम. मार्टिनिस को दिया गया था।
तीनों वैज्ञानिकों को ऐसे प्रयोगात्मक काम के लिए सम्मानित किया गया, जिसमें क्वांटम प्रभावों को इलेक्ट्रिक सर्किट के स्तर पर देखा गया। इससे यह समझ मजबूत हुई कि क्वांटम दुनिया के नियम केवल परमाणु या बेहद सूक्ष्म कणों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उपयुक्त परिस्थितियों में इलेक्ट्रिक सर्किट जैसी प्रणालियों में भी उनके प्रभाव देखे जा सकते हैं।
इस उपलब्धि को क्वांटम तकनीक के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया। क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम सूचना और दूसरी उन्नत तकनीकों को समझने के लिए ऐसे प्रयोग बेहद महत्वपूर्ण हैं।
दिसंबर में स्टॉकहोम में होगा सम्मान समारोह
2026 के फिजिक्स नोबेल के विजेता का नाम आज सामने आने के बाद पुरस्कार प्रक्रिया का अगला बड़ा चरण दिसंबर में होगा। नोबेल पुरस्कार विजेताओं को स्वीडन के स्टॉकहोम में आयोजित समारोह में सम्मानित किया जाएगा। विजेताओं को नोबेल मेडल और डिप्लोमा के साथ पुरस्कार राशि भी प्रदान की जाएगी।
2026 में प्रत्येक नोबेल पुरस्कार की कुल राशि करीब 11.5 करोड़ रुपये के बराबर बताई जा रही है। यदि किसी एक श्रेणी में पुरस्कार एक से अधिक वैज्ञानिकों को दिया जाता है, तो निर्धारित पुरस्कार राशि उनके बीच बांटी जाती है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस साल नोबेल कमेटी किस वैज्ञानिक उपलब्धि को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक सम्मानों में से एक के लिए चुनेगी। मेटामटेरियल्स, ट्विस्ट्रोनिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग और ऑप्टिकल क्लॉक जैसे क्षेत्रों के कई बड़े नाम चर्चा में जरूर हैं, लेकिन अंतिम फैसला केवल नोबेल कमेटी की आधिकारिक घोषणा के बाद ही सामने आएगा।




