2026 के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा का सिलसिला अब रसायन विज्ञान के प्रतिष्ठित पुरस्कार तक पहुंच गया है। बुधवार को 2026 के केमिस्ट्री नोबेल पुरस्कार के विजेता के नाम का ऐलान किया जाएगा। इस बार वैज्ञानिक जगत में भारतीय मूल के ब्रिटिश वैज्ञानिक प्रोफेसर शंकर बालासुब्रमण्यम का नाम संभावित दावेदारों में प्रमुखता से लिया जा रहा है। DNA सीक्वेंसिंग के क्षेत्र में उनके योगदान ने आधुनिक जीव विज्ञान और चिकित्सा अनुसंधान को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि नोबेल समिति की ओर से घोषणा से पहले किसी नाम की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन बालासुब्रमण्यम की उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें इस पुरस्कार का मजबूत उम्मीदवार माना जा रहा है।
शंकर बालासुब्रमण्यम को इस साल वैज्ञानिक डेविड क्लेनरमैन और पास्कल मेयर के साथ वुल्फ केमिस्ट्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। तीनों वैज्ञानिकों को अगली पीढ़ी की DNA सीक्वेंसिंग तकनीक विकसित करने में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए यह सम्मान मिला। इस तकनीक ने DNA को पढ़ने की प्रक्रिया को पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज, बड़े पैमाने पर इस्तेमाल योग्य और कम खर्चीला बनाने में मदद की। इसी वजह से उनका काम आनुवंशिक बीमारियों की पहचान से लेकर कैंसर रिसर्च और मरीज के अनुसार इलाज तैयार करने तक कई क्षेत्रों में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
DNA सीक्वेंसिंग में आई क्रांतिकारी तेजी
आधुनिक चिकित्सा में किसी व्यक्ति के DNA को पढ़ना बेहद महत्वपूर्ण हो चुका है। जीन में मौजूद बदलाव कई गंभीर बीमारियों से जुड़े हो सकते हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों के लिए कम समय और कम लागत में बड़ी मात्रा में आनुवंशिक जानकारी हासिल करना जरूरी है। शंकर बालासुब्रमण्यम और डेविड क्लेनरमैन के शोध ने इसी चुनौती को काफी हद तक आसान किया।
दोनों वैज्ञानिकों ने ऐसी सीक्वेंसिंग तकनीक के विकास में अहम भूमिका निभाई, जिसमें एक साथ DNA की बड़ी संख्या में प्रतियों को पढ़ना संभव हुआ। इस प्रक्रिया ने पारंपरिक तरीकों की तुलना में DNA विश्लेषण की क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस तकनीकी बदलाव के बाद DNA सीक्वेंसिंग की गति लगभग 10 लाख गुना तक बढ़ी और इसकी लागत में भी भारी गिरावट आई।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर जीनोमिक रिसर्च पर पड़ा। पहले इंसानी जीनोम की पूरी जानकारी हासिल करना अत्यंत महंगा और समय लेने वाला काम था। नई पीढ़ी की सीक्वेंसिंग तकनीकों ने इस काम को अधिक व्यावहारिक बना दिया। आज दुनिया भर में बड़े पैमाने पर होने वाली DNA सीक्वेंसिंग का अधिकांश हिस्सा इसी तरह की तकनीकों पर आधारित है।
कैंसर और जेनेटिक बीमारियों की रिसर्च में बड़ा फायदा
बालासुब्रमण्यम और उनके सहयोगियों के काम का असर केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा। DNA सीक्वेंसिंग सस्ती और तेज होने के कारण वैज्ञानिकों को अलग-अलग बीमारियों से जुड़े आनुवंशिक बदलावों का अध्ययन करने में मदद मिली। खास तौर पर कैंसर जैसी जटिल बीमारी को समझने में जीनोमिक डेटा की भूमिका लगातार बढ़ी है।
किसी मरीज के ट्यूमर में मौजूद आनुवंशिक बदलावों की पहचान करके डॉक्टर और वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि बीमारी किस तरह आगे बढ़ रही है और कौन-सा उपचार उसके लिए अधिक प्रभावी हो सकता है। इसी अवधारणा ने प्रिसीजन मेडिसिन को बढ़ावा दिया है, जिसमें इलाज को मरीज की जैविक और आनुवंशिक विशेषताओं के अनुसार तैयार करने की कोशिश की जाती है।
इसके अलावा दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों की पहचान, संक्रमणों के अध्ययन और नई दवाओं के विकास में भी हाई-थ्रूपुट सीक्वेंसिंग का इस्तेमाल बढ़ा है। इस लिहाज से बालासुब्रमण्यम का शोध बुनियादी विज्ञान और मेडिकल रिसर्च के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है।
पास्कल मेयर ने तकनीक को बड़े पैमाने तक पहुंचाने में निभाई भूमिका
DNA सीक्वेंसिंग की इस क्रांति में पास्कल मेयर का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा है। उनका काम इस तकनीक को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने योग्य सिस्टम में बदलने से जुड़ा रहा। इसके लिए उन्होंने केमिस्ट्री के साथ माइक्रोफ्लूडिक्स, ऑप्टिक्स और कंप्यूटिंग जैसी अलग-अलग तकनीकों को एक साथ जोड़ा।
इस तरह की बहु-विषयक तकनीक ने बड़ी मात्रा में DNA सैंपल को एक साथ प्रोसेस करना संभव बनाया। इसका परिणाम यह हुआ कि जीनोम सीक्वेंसिंग पहले की तुलना में तेज और ज्यादा किफायती होती गई। मानव जीनोम की सीक्वेंसिंग की लागत को 200 डॉलर से भी नीचे लाने में इस तकनीकी विकास की अहम भूमिका बताई जाती है।
आज जीनोमिक डेटा का इस्तेमाल केवल रिसर्च संस्थानों तक सीमित नहीं है। अस्पतालों, मेडिकल रिसर्च सेंटरों और बायोटेक्नोलॉजी कंपनियों में भी DNA विश्लेषण का इस्तेमाल बढ़ रहा है। यही कारण है कि अगली पीढ़ी की सीक्वेंसिंग को पिछले कुछ दशकों की सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिक तकनीकी उपलब्धियों में गिना जाता है।
चेन्नई में जन्मे शंकर बालासुब्रमण्यम का ब्रिटेन में बना वैज्ञानिक करियर
शंकर बालासुब्रमण्यम का जन्म वर्ष 1966 में मद्रास में हुआ था, जिसे अब चेन्नई के नाम से जाना जाता है। उनके जन्म के कुछ समय बाद ही उनका परिवार ब्रिटेन चला गया। आगे चलकर उन्होंने ब्रिटेन में उच्च शिक्षा हासिल की और विज्ञान के क्षेत्र में अपना करियर बनाया।
बालासुब्रमण्यम ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से नेचुरल साइंसेज में 1988 में BA की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने एंजाइम केमिस्ट्री के क्षेत्र में शोध किया और 1991 में PhD पूरी की। कुछ वर्षों बाद 1994 में वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की फैकल्टी से जुड़े।
वर्तमान में वे यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज में हर्शेल स्मिथ प्रोफेसर ऑफ मेडिसिनल केमिस्ट्री के पद पर हैं। इसके साथ ही वे कैंसर रिसर्च यूके के कैम्ब्रिज इंस्टीट्यूट में सीनियर ग्रुप लीडर के तौर पर भी काम कर रहे हैं। उनके शोध का प्रमुख क्षेत्र DNA और उससे जुड़ी रासायनिक प्रक्रियाएं रही हैं।
वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए मिल चुके हैं कई बड़े सम्मान
बालासुब्रमण्यम को उनके शोध के लिए पहले भी कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। वर्ष 2017 में उन्हें नाइटहुड से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें रॉयल मेडल और मिलेनियम टेक्नोलॉजी प्राइज जैसे महत्वपूर्ण सम्मान भी प्राप्त हुए हैं।
उन्हें ब्रेकथ्रू प्राइज फॉर लाइफ साइंसेज से भी सम्मानित किया जा चुका है। 2026 में डेविड क्लेनरमैन और पास्कल मेयर के साथ मिला वुल्फ केमिस्ट्री पुरस्कार उनकी वैज्ञानिक यात्रा में एक और बड़ी उपलब्धि के रूप में जुड़ा है।
नोबेल पुरस्कार के संदर्भ में ऐसे बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मान अक्सर किसी वैज्ञानिक के प्रभाव और उनके शोध की व्यापक उपयोगिता को रेखांकित करते हैं। हालांकि नोबेल समिति का अंतिम फैसला स्वतंत्र होता है और संभावित नामों को लेकर लगाई जा रही अटकलें आधिकारिक घोषणा का विकल्प नहीं होतीं।
इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर पर शोध भी चर्चा में
इस साल के केमिस्ट्री नोबेल के संभावित दावेदारों की चर्चा में केवल DNA सीक्वेंसिंग ही नहीं, बल्कि प्रोटीन के भीतर इलेक्ट्रॉन के स्थानांतरण को समझने वाले वैज्ञानिकों के नाम भी सामने आ रहे हैं। इस क्षेत्र में हैरी बी. ग्रे और जे. विंकलर के काम को खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जाता है।
शरीर में होने वाली कई रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं के लिए इलेक्ट्रॉनों का एक अणु या स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचना आवश्यक होता है। कोशिकाओं में ऊर्जा के निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं में भी इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
ग्रे और विंकलर के शोध ने इस सवाल को समझने में मदद की कि प्रोटीन जैसे जटिल जैविक अणुओं के भीतर इलेक्ट्रॉन लंबी दूरी तक किस तरह आगे बढ़ सकते हैं। वैज्ञानिकों के लिए यह केवल एक रासायनिक प्रक्रिया को समझने का विषय नहीं था, बल्कि इससे यह जानने में मदद मिली कि प्रोटीन की संरचना इलेक्ट्रॉन के आवागमन को किस तरह प्रभावित करती है।
सोलर सेल और आणविक विज्ञान से जुड़े काम भी दौड़ में
2026 के केमिस्ट्री नोबेल के संभावित नामों को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में कई अन्य शोध क्षेत्रों की भी चर्चा है। इनमें पेरोव्स्काइट सोलर सेल, खुद-ब-खुद बनने वाली आणविक परतों और ग्लाइकोप्रोटीन के निर्माण से संबंधित वैज्ञानिक उपलब्धियां शामिल हैं।
पेरोव्स्काइट आधारित सौर तकनीक ने पिछले वर्षों में वैज्ञानिकों का विशेष ध्यान खींचा है। इसके पीछे वजह यह है कि इस सामग्री में सौर ऊर्जा को बिजली में बदलने की क्षमता को लेकर काफी संभावनाएं देखी गई हैं। इसी तरह सेल्फ-असेंबलिंग आणविक परतों का अध्ययन नैनो टेक्नोलॉजी और उन्नत सामग्री विज्ञान में महत्वपूर्ण माना जाता है।
ग्लाइकोप्रोटीन से संबंधित रासायनिक शोध भी जैव चिकित्सा के लिहाज से उपयोगी है। इन जटिल अणुओं की संरचना और निर्माण को समझना दवाओं, जैविक प्रक्रियाओं और बीमारी से जुड़े कई अध्ययनों में मददगार हो सकता है।
दिसंबर में स्टॉकहोम में होगा सम्मान समारोह
केमिस्ट्री नोबेल के विजेता की घोषणा के बाद पुरस्कार पाने वाले वैज्ञानिकों को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में आयोजित समारोह में सम्मानित किया जाएगा। नोबेल पुरस्कार विजेताओं को पारंपरिक रूप से मेडल और डिप्लोमा के साथ पुरस्कार राशि प्रदान की जाती है।
2026 में प्रत्येक नोबेल पुरस्कार की पुरस्कार राशि करीब 11.5 करोड़ रुपये के आसपास बताई जा रही है। हालांकि राशि स्वीडिश क्रोना में तय होती है और भारतीय रुपये में इसका मूल्य विनिमय दर के अनुसार बदल सकता है।
अब सबसे ज्यादा उत्सुकता इस बात को लेकर है कि रसायन विज्ञान के क्षेत्र में इस वर्ष का सबसे बड़ा सम्मान किस वैज्ञानिक या वैज्ञानिकों के समूह को दिया जाएगा। यदि शंकर बालासुब्रमण्यम को नोबेल पुरस्कार मिलता है, तो DNA सीक्वेंसिंग में उनके योगदान को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक सम्मानों में से एक से मान्यता मिलेगी। फिलहाल अंतिम फैसला नोबेल समिति की घोषणा के साथ ही सामने आएगा।




