कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल राहुल गांधी पिछले दो दिनों से लगातार सड़क पर नजर आ रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया को रद्द करने की मांग को लेकर राहुल गांधी ने 6 और 7 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों के साथ लगातार प्रदर्शन किया। इन दो दिनों के दौरान करीब 48 घंटे के अंतराल में उन्होंने 14 घंटे से ज्यादा समय विरोध-प्रदर्शन में बिताया। इस दौरान उन्हें कई बार पुलिस की कार्रवाई का सामना करना पड़ा और कुल तीन मौकों पर हिरासत में लिया गया। प्रदर्शन के दौरान राहुल कभी बैरिकेड पर चढ़ते दिखाई दिए तो कभी सड़क पर खड़े होकर विरोध जताते नजर आए। एक मौके पर वह जमीन पर बैठकर खाना खाते भी दिखे।
राहुल गांधी के लिए यह गतिविधि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि 2023 में भारत जोड़ो यात्रा समाप्त होने के बाद यह उनका सड़क पर अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों में से एक है। हालांकि इसके बाद भी वह समय-समय पर अलग-अलग मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शनों में शामिल होते रहे हैं, लेकिन इस बार लगातार दो दिनों तक आंदोलन में उनकी मौजूदगी ने इसे ज्यादा बड़ा राजनीतिक रूप दे दिया है। कांग्रेस और विपक्ष की कोशिश SIR को केवल चुनाव आयोग से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया के तौर पर पेश करने के बजाय इसे मताधिकार, चुनावी पारदर्शिता और लोकतंत्र के व्यापक मुद्दे से जोड़ने की दिखाई दे रही है।
6 अक्टूबर को संसद से शुरू हुआ विरोध
6 अक्टूबर को INDIA ब्लॉक के विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर से चुनाव आयोग के कार्यालय की ओर मार्च करने की योजना बनाई। इस मार्च की अगुआई राहुल गांधी कर रहे थे। विपक्षी दलों की प्रमुख मांगों में SIR पर सवाल उठाना, मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग करना और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग शामिल थी।
मार्च के दौरान दिल्ली में NITI Aayog के पास पुलिस ने बैरिकेड लगाकर प्रदर्शनकारियों को आगे जाने से रोक दिया। इसके बाद स्थिति उस समय और ज्यादा चर्चा में आ गई जब राहुल गांधी बैरिकेड पर चढ़ गए और वहां तिरंगा लहराया। कई दूसरे विपक्षी सांसद भी पुलिस के साथ बहस करते और आगे बढ़ने की कोशिश करते दिखाई दिए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बैरिकेडिंग के साथ सुरक्षा बलों की तैनाती की थी।
मार्च को आगे नहीं बढ़ने देने के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी आकाशवाणी भवन परिसर की ओर चले गए। उनके साथ विपक्ष के दूसरे सांसद भी पहुंच गए। वहां पहुंचने के बाद प्रदर्शनकारियों ने चुनाव आयोग से मुलाकात की मांग करते हुए धरना शुरू कर दिया। विपक्ष की इच्छा थी कि उसके लगभग 240 सांसदों का प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग के अधिकारियों से मिलकर SIR और मतदाता सूची से जुड़े अपने सवाल सीधे रखे।
आकाशवाणी परिसर में घंटों चला धरना
आकाशवाणी भवन परिसर में राहुल गांधी लंबे समय तक धरने पर बैठे रहे। इस दौरान उन्होंने मीडिया से बातचीत भी की और अपने आंदोलन को लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई बताया। प्रदर्शन के दौरान उनकी एक तस्वीर भी सामने आई जिसमें वह पेड़ के नीचे जमीन पर बैठकर खाना खाते दिखाई दिए। उनके साथ प्रियंका गांधी और अन्य विपक्षी सांसद भी मौजूद थे।
हालांकि चुनाव आयोग की ओर से विपक्ष की मुलाकात की मांग को लेकर अलग रुख सामने आया। आयोग ने कहा कि शाम 4 बजे तक किसी राजनीतिक दल की ओर से औपचारिक रूप से मुलाकात का अनुरोध नहीं किया गया था। बाद में आयोग ने यह भी कहा कि करीब 240 सांसदों के प्रतिनिधिमंडल से संसद परिसर में मिलने का प्रस्ताव उसके निर्धारित प्रोटोकॉल के मुताबिक नहीं था।
इस बीच प्रदर्शन कई घंटे तक जारी रहा। रात होने तक भी विपक्षी सांसद वहां से हटने को तैयार नहीं हुए। इसके बाद पुलिस ने परिसर खाली कराने की कार्रवाई शुरू की। दिल्ली पुलिस के मुताबिक करीब 260 लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें लगभग 10 सांसद भी शामिल थे। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कई अन्य विपक्षी नेताओं को भी हिरासत में लिया गया। बाद में सभी को छोड़ दिया गया।
7 अक्टूबर को आंदोलन फिर सड़क पर पहुंचा
एक दिन की पुलिस कार्रवाई के बाद भी विपक्ष ने अपना आंदोलन रोकने का फैसला नहीं किया। 7 अक्टूबर को राहुल गांधी समेत INDIA ब्लॉक के सांसदों ने जंतर-मंतर की ओर जाने का कार्यक्रम बनाया। प्रदर्शन का उद्देश्य एक बार फिर SIR, मतदाता सूची और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से जुड़े मुद्दों को उठाना था।
इस दिन विपक्षी सांसदों के लिए लंच का भी आयोजन किया गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर से आयोजित लंच के बाद सांसद बसों में सवार होकर जंतर-मंतर के लिए रवाना हुए। इस दौरान करीब 300 सांसदों के एकजुट होने की बात सामने आई।
लेकिन जंतर-मंतर पहुंचने से पहले ही पुलिस ने बसों को रोक दिया। प्रदर्शनकारियों के मुताबिक बसों को जंतर-मंतर से लगभग 100 मीटर पहले ही रोक दिया गया था। इलाके में दिल्ली पुलिस के साथ RAF की भी तैनाती की गई थी। बसों को आगे जाने की अनुमति नहीं मिलने के बाद कई प्रदर्शनकारी नीचे उतर आए और सड़क पर ही विरोध शुरू कर दिया। कुछ कांग्रेस सांसद बसों की छत पर चढ़ गए और नारेबाजी करने लगे।
स्थिति धीरे-धीरे तनावपूर्ण हो गई। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति बनी। प्रियंका गांधी सड़क पर बैठ गईं, जबकि राहुल गांधी समेत कई विपक्षी सांसदों ने पुलिस की कार्रवाई का विरोध किया। इसके बाद पुलिस ने राहुल गांधी और दूसरे नेताओं को हिरासत में ले लिया। करीब दो घंटे बाद राहुल गांधी को छोड़ दिया गया।
राहुल बोले- हर FIR मेरे लिए मेडल जैसी
7 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी ने सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ अपना रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि वह CEC के इस्तीफे की मांग से पीछे हटने वाले नहीं हैं। पुलिस कार्रवाई और उनके खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर राहुल ने कहा कि उनके खिलाफ दर्ज हर FIR उनके लिए “मेडल” जैसी है।
लगातार दो दिनों तक सड़क पर उतरने की यह तस्वीर कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक रणनीति का भी संकेत देती है। पार्टी SIR के मुद्दे को संसद तक सीमित रखने के बजाय इसे जनता के बीच ले जाने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी की लगातार मौजूदगी का उद्देश्य इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक बहस का केंद्र बनाना भी माना जा रहा है।
2026 में राहुल की राजनीतिक सक्रियता बढ़ी
पिछले कुछ वर्षों की तुलना में 2026 राहुल गांधी की राजनीतिक सक्रियता के लिहाज से ज्यादा अहम नजर आ रहा है। 2024 में उन्होंने एक बड़े प्रदर्शन में हिस्सा लिया था, जबकि 2025 में भी विपक्षी दलों के साथ मार्च किया था। इसके मुकाबले 2026 में कुछ ही महीनों के भीतर वह कई बड़े आंदोलनों का हिस्सा बन चुके हैं।
NEET पेपर से जुड़े मुद्दे पर छात्रों के साथ हुए व्यवहार से लेकर SIR के विरोध तक राहुल ने सड़क पर विपक्षी राजनीति को आगे बढ़ाया है। चार महीनों में चार बड़े विरोध प्रदर्शनों में उनकी भागीदारी ने कांग्रेस के भीतर भी सड़क की राजनीति को दोबारा महत्वपूर्ण बना दिया है। भारत जोड़ो यात्रा के बाद लगातार बड़े पैमाने पर जनता और विपक्षी नेताओं के बीच सक्रिय दिखाई देना राहुल की राजनीतिक शैली में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।
कांग्रेस की रणनीति क्या है?
कांग्रेस के लिए SIR अब सिर्फ मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया का सवाल नहीं रह गया है। पार्टी इसे वोट के अधिकार और चुनाव की निष्पक्षता से जोड़ना चाहती है। इसका मकसद यह संदेश देना है कि अगर किसी योग्य मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से हटता है, तो इसका सीधा असर उसके लोकतांत्रिक अधिकार पर पड़ता है।
दूसरी रणनीति राहुल गांधी के सड़क पर उतरने को पार्टी के जमीनी संगठन से जोड़ने की है। दिल्ली में बड़े नेताओं के प्रदर्शन के बाद कांग्रेस का फोकस राज्यों, जिलों, ब्लॉक, गांव और बूथ स्तर तक अभियान पहुंचाने पर हो सकता है। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं को लगातार सक्रिय रखने और SIR को स्थानीय मुद्दे में बदलने की कोशिश की जा सकती है।
तीसरा लक्ष्य INDIA ब्लॉक में राहुल गांधी की भूमिका को मजबूत करना है। SIR जैसे राष्ट्रीय मुद्दे पर लगातार विपक्षी सांसदों के साथ आंदोलन की अगुआई करके राहुल खुद को विपक्षी एकजुटता के प्रमुख चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
अगर यह अभियान लंबे समय तक जारी रहता है, तो कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची, SIR और चुनावी पारदर्शिता को बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर सकती है।
विपक्ष की एकता और आरोपों की विश्वसनीयता बनी चुनौती
हालांकि इस रणनीति के सामने कई चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती INDIA ब्लॉक के अलग-अलग दलों को एक मंच पर बनाए रखना है। 6 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान कुछ विपक्षी नेताओं की ओर से यह सवाल उठाया गया कि राहुल और प्रियंका गांधी का आकाशवाणी भवन में धरना सहयोगी दलों से पर्याप्त चर्चा के बिना हुआ और आंदोलन का फोकस गांधी परिवार पर ज्यादा चला गया। तमिलनाडु जैसे राज्यों में सहयोगी दलों के साथ मतभेद भी इस चुनौती को और स्पष्ट करते हैं।
दूसरी चुनौती SIR को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को ठोस और सत्यापित आंकड़ों के साथ साबित करने की है। कांग्रेस के लिए यह दिखाना जरूरी होगा कि वास्तव में कितने योग्य मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटे और ऐसे कितने मामलों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जा सकती है।
वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि SIR के तहत हटाए गए नामों में मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित, अनुपस्थित या डुप्लीकेट मतदाता शामिल हैं। आयोग की ओर से यह भी कहा गया है कि जिन योग्य मतदाताओं के नाम छूट गए हैं, उनके लिए विशेष प्रक्रिया और अभियान की व्यवस्था की जा रही है।
इस तरह राहुल गांधी का मौजूदा आंदोलन केवल दो दिनों के विरोध तक सीमित नहीं दिखता। कांग्रेस इसे आने वाले महीनों में चुनावी प्रक्रिया, मतदाता अधिकार और SIR के मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक अभियान का आधार बनाने की कोशिश कर रही है। अब इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पार्टी इस मुद्दे को विपक्षी दलों की साझा आवाज बनाने के साथ-साथ आम मतदाताओं तक कितनी मजबूती से पहुंचा पाती है।




