भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुरानी सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित किए जाने के बाद अब एक वर्ष का समय पूरा हो चुका है। इस पूरे दौर में दोनों देशों के बीच जल संसाधनों को लेकर तनाव लगातार बना रहा है। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की, जबकि भारत ने अपने फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप बताया। एक साल बीतने के बावजूद दोनों देशों के बीच इस विषय पर कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है और भविष्य में भी इस गतिरोध के जल्द खत्म होने के संकेत फिलहाल नहीं दिख रहे हैं।
पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया था। नई दिल्ली का स्पष्ट मत रहा कि सीमा पार से लगातार जारी आतंकवाद और पाकिस्तान की नीतियों के बीच सामान्य सहयोग संभव नहीं है। भारत ने कई मौकों पर यह दोहराया कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय संबंध साथ-साथ नहीं चल सकते। इसी नीति के तहत जल समझौते को भी रोकने का निर्णय लिया गया।
दूसरी ओर पाकिस्तान ने इस कदम का लगातार विरोध किया है। इस्लामाबाद का कहना है कि यह फैसला अंतरराष्ट्रीय समझौतों की भावना के खिलाफ है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और कई वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक मंचों से भारत के फैसले की आलोचना की। पाकिस्तान की सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व की बैठकों में भी सिंधु जल संधि को प्रमुख मुद्दे के रूप में शामिल किया गया। जुलाई के पहले सप्ताह में हुई कोर कमांडर्स कॉन्फ्रेंस के बाद जारी आधिकारिक बयान में भी इस विषय का उल्लेख किया गया, जिससे स्पष्ट हुआ कि पाकिस्तान इसे रणनीतिक महत्व का मामला मानता है।
हालांकि भारत का तर्क इससे अलग है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि सिंधु जल संधि के संचालन के दौरान पाकिस्तान ने वर्षों तक लगभग हर महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजना पर आपत्ति दर्ज कराई। चाहे परियोजना का आकार छोटा रहा हो या बड़ा, जल संग्रहण की क्षमता सीमित रही हो या डिजाइन पूरी तरह संधि के अनुरूप रहा हो, पाकिस्तान की ओर से बार-बार विवाद खड़ा किया गया। इससे कई परियोजनाओं में देरी हुई और विकास कार्य प्रभावित हुए।
भारत का मानना है कि संधि में विवाद निपटाने की जो व्यवस्था बनाई गई थी, उसका उद्देश्य तकनीकी मतभेदों का समाधान करना था। लेकिन समय के साथ पाकिस्तान ने उन्हीं प्रावधानों का इस्तेमाल परियोजनाओं को लंबे समय तक अटकाने के लिए किया। भारतीय पक्ष का कहना है कि इससे जम्मू-कश्मीर समेत कई क्षेत्रों में बिजली उत्पादन और जल प्रबंधन से जुड़े विकास कार्य प्रभावित हुए।
भारत की एक और प्रमुख चिंता बदलती जल परिस्थितियाँ हैं। देश के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, जिसके कारण सतही जल संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग राष्ट्रीय आवश्यकता बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले छह दशकों में जलवायु परिवर्तन और वर्षा के पैटर्न में आए बदलावों ने नदियों के बहाव को भी प्रभावित किया है। पूर्वी नदियों में पानी की उपलब्धता पहले की तुलना में कम हुई है, जबकि पश्चिमी नदियों के प्रवाह में अपेक्षाकृत अधिक स्थिरता बनी हुई है। ऐसे में भारत अपने हिस्से के उपलब्ध जल का बेहतर उपयोग करना चाहता है।
इसके अलावा 1960 में जब सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे, उस समय जल प्रबंधन और बांध निर्माण की तकनीक आज जैसी विकसित नहीं थी। वर्तमान समय में आधुनिक बांधों में सुरक्षा, तलछट प्रबंधन, नियंत्रित जल निकासी, गेट वाले स्पिलवे और जलाशयों के लचीले संचालन जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। भारत का कहना है कि मौजूदा तकनीकी जरूरतों को देखते हुए पुराने प्रावधानों में संशोधन या नए दृष्टिकोण की आवश्यकता महसूस होती है।
भारत का यह भी तर्क है कि देश की बढ़ती आबादी, ऊर्जा की बढ़ती मांग और सिंचाई की आवश्यकताओं को देखते हुए उपलब्ध जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना समय की जरूरत है। यदि आधुनिक तकनीकों का उपयोग नहीं किया जाएगा तो जल संरक्षण और बिजली उत्पादन दोनों क्षेत्रों में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
उधर पाकिस्तान लगातार जल संकट की गंभीरता को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने रखता रहा है। वहां की सरकार का दावा है कि सिंधु प्रणाली पर किसी भी प्रकार का असर कृषि, पेयजल और अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। हालांकि कई विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान की अपनी जल प्रबंधन व्यवस्था भी लंबे समय से गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है।
पाकिस्तान की राष्ट्रीय जल नीति में स्वयं यह स्वीकार किया गया है कि हर वर्ष बड़ी मात्रा में पानी बिना किसी उपयोग के समुद्र में चला जाता है। इसके अलावा नहरों के माध्यम से पानी पहुंचाने के दौरान भी भारी मात्रा में जल की बर्बादी होती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार नहर प्रणाली में मोड़े गए पानी का एक बड़ा हिस्सा खेतों तक पहुंचने से पहले ही रिसाव, खराब रखरखाव और अन्य कारणों से नष्ट हो जाता है।
जल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान अपनी सिंचाई व्यवस्था को आधुनिक बनाए, नहरों की मरम्मत करे, जल संरक्षण तकनीकों को अपनाए और जल प्रबंधन में सुधार करे तो काफी हद तक संकट को कम किया जा सकता है। इसके बावजूद पाकिस्तान का जोर अधिकतर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के फैसले का विरोध करने पर दिखाई देता है।
भारत का रुख फिलहाल स्पष्ट बना हुआ है। सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और सीमा पार आतंकवाद जारी रहने तक सामान्य परिस्थितियों की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसी कारण सिंधु जल संधि को लेकर भी भारत अपने निर्णय पर कायम है। भारतीय अधिकारियों का यह भी कहना है कि देश के हितों की रक्षा करते हुए उपलब्ध जल संसाधनों का वैज्ञानिक और प्रभावी उपयोग किया जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में यह मुद्दा केवल जल बंटवारे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, कृषि, पर्यावरण और क्षेत्रीय कूटनीति जैसे कई पहलू भी जुड़ते जाएंगे। यदि दोनों देशों के बीच भविष्य में किसी स्तर पर बातचीत शुरू होती है तो संभव है कि संधि के तकनीकी और प्रशासनिक पहलुओं पर नए सिरे से चर्चा हो। हालांकि वर्तमान हालात को देखते हुए ऐसी संभावना निकट भविष्य में सीमित नज़र आती है।
एक वर्ष बीत जाने के बाद भी सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेद पहले जैसे ही बने हुए हैं। पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है, जबकि भारत सुरक्षा, बदलती जल आवश्यकताओं और आधुनिक तकनीकी जरूरतों का हवाला देते हुए अपने फैसले को उचित ठहरा रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि सिंधु जल संधि का भविष्य दोनों देशों के व्यापक द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति पर काफी हद तक निर्भर करेगा।



