भारत में किन महिलाओं को सुनाई गई फांसी की सजा? मेरठ हत्याकांड के बाद फिर चर्चा में आया मृत्युदंड का इतिहास

भारत में किन महिलाओं को सुनाई गई फांसी की सजा? मेरठ हत्याकांड के बाद फिर चर्चा में आया मृत्युदंड का इतिहास

उत्तर प्रदेश के मेरठ में सामने आए चर्चित नीले ड्रम हत्याकांड ने एक बार फिर देश में जघन्य अपराधों और उनके लिए निर्धारित सजा को लेकर बहस छेड़ दी है। मार्च 2025 में हुए इस मामले में सौरभ राजपूत की हत्या और उसके शव को प्लास्टिक के नीले ड्रम में छिपाने की घटना ने लोगों को झकझोर दिया था। मामले में मुख्य आरोपी मुस्कान रस्तोगी और उसके पति साहिल का नाम सामने आने के बाद यह प्रकरण लगातार सुर्खियों में बना रहा। हालांकि, इस मामले में सजा से जुड़ी किसी भी जानकारी को अंतिम रूप से प्रस्तुत करने से पहले संबंधित अदालत के फैसले और आधिकारिक रिकॉर्ड की पुष्टि जरूरी है। इस घटना के बीच एक सवाल भी चर्चा में है कि भारत में अब तक कितनी महिलाओं को मौत की सजा सुनाई गई है और आखिरी बार किस महिला को वास्तव में फांसी दी गई थी।

भारत में मृत्युदंड सबसे गंभीर आपराधिक सजा है। अदालतें इसे सामान्य अपराधों में नहीं, बल्कि असाधारण रूप से गंभीर मामलों में ही देने पर विचार करती हैं। हत्या, आतंकवाद और कुछ अन्य गंभीर अपराधों में कानून के प्रावधानों के तहत मृत्युदंड का विकल्प मौजूद है। हालांकि, अदालत से फांसी की सजा मिलना और दोषी को वास्तव में फांसी पर लटकाया जाना दो अलग-अलग बातें हैं। दोषी को ऊपरी अदालतों में अपील करने, पुनर्विचार याचिका दायर करने और राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष दया याचिका प्रस्तुत करने का अवसर मिल सकता है। इसी कारण कई मामलों में मृत्युदंड सुनाए जाने के बावजूद सजा को अंतिम रूप से लागू नहीं किया जाता।

भारत में आखिरी बार किस महिला को दी गई थी फांसी?

महिलाओं को मृत्युदंड दिए जाने के इतिहास में रतन बाई जैन का नाम अक्सर सामने आता है। प्रचलित विवरणों के अनुसार, उन्हें 1955 में दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। उन पर तीन बच्चियों की हत्या करने का आरोप था और अदालत ने उन्हें इस मामले में दोषी ठहराया था। इस घटना को स्वतंत्र भारत में किसी महिला को फांसी दिए जाने के शुरुआती चर्चित मामलों में गिना जाता है।

हालांकि, यह दावा कि रतन बाई जैन ही स्वतंत्र भारत में फांसी पाने वाली आखिरी महिला थीं, विश्वसनीय ऐतिहासिक और जेल रिकॉर्ड से अलग से सत्यापित किया जाना चाहिए। ऐसे संवेदनशील विषय पर किसी व्यक्ति का नाम, अपराध और फांसी की तारीख बताते समय आधिकारिक दस्तावेजों का सहारा लेना जरूरी है। पुराने आपराधिक मामलों की जानकारी अलग-अलग लेखों और वेबसाइटों पर मिल सकती है, लेकिन सभी विवरण समान रूप से प्रमाणित नहीं होते। इसलिए भारत में आखिरी बार किसी महिला को फांसी दिए जाने का सवाल उठने पर न्यायिक दस्तावेजों और ऐतिहासिक अभिलेखों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।

शबनम अली का मामला क्यों बना राष्ट्रीय चर्चा का विषय?

भारत में किसी महिला को फांसी दिए जाने की चर्चा होती है, तो उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के बावनखेड़ी गांव में हुए सामूहिक हत्याकांड का जिक्र भी सामने आता है। इस मामले में शबनम अली को अपने ही परिवार के सात सदस्यों की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था। अप्रैल 2008 में हुई इस वारदात ने पूरे देश को हैरान कर दिया था, क्योंकि मृतकों में उसके माता-पिता और परिवार के दूसरे सदस्य शामिल थे। मरने वालों में एक छोटा बच्चा भी था।

जांच और सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि शबनम ने अपने प्रेमी सलीम के साथ मिलकर इस अपराध को अंजाम दिया था। मामले में सामने आए तथ्यों और अदालत में पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर दोनों को दोषी ठहराया गया। इस हत्याकांड की गंभीरता को देखते हुए निचली अदालत ने शबनम और सलीम को मृत्युदंड सुनाया था। इसके बाद मामला ऊपरी अदालतों तक पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने भी शबनम की सजा को बरकरार रखा।

शबनम का मामला इसलिए भी सुर्खियों में रहा, क्योंकि वह उन महिला दोषियों में शामिल हो गईं जिनकी फांसी की सजा पर कानूनी प्रक्रिया के दौरान लंबे समय तक चर्चा हुई। उनकी दया याचिका राष्ट्रपति के समक्ष भी पहुंची थी। इस मामले में फांसी देने की संभावनाओं को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियों की खबरें भी सामने आई थीं। हालांकि, सजा सुनाए जाने, दया याचिका खारिज होने और वास्तविक फांसी के बीच का अंतर यहां भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, शबनम को फांसी नहीं दी गई है। इसलिए उन्हें भारत में फांसी पर चढ़ाई गई आखिरी महिला कहना गलत होगा।

सोनिया हत्याकांड में भी सुनाई गई थी मौत की सजा

महिला अपराधियों से जुड़े चर्चित मामलों में हरियाणा की सोनिया और उसके पति संजीव का मामला भी शामिल है। दोनों पर अपने ही परिवार के कई सदस्यों की हत्या करने का आरोप था। इस मामले में आठ लोगों की हत्या का उल्लेख मिलता है और अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोनों को मृत्युदंड सुनाया था।

मामले की सुनवाई के दौरान पारिवारिक संबंधों और हत्या की परिस्थितियों को लेकर कई गंभीर तथ्य सामने आए। सोनिया की दया याचिका तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के समक्ष भी पहुंची थी और 2013 में उसे खारिज किए जाने की खबरें प्रकाशित हुई थीं। इस घटनाक्रम के बाद मृत्युदंड लागू होने की संभावना को लेकर चर्चा तेज हुई थी।

हालांकि, किसी दया याचिका के खारिज होने को फांसी दिए जाने के बराबर नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में आगे की न्यायिक कार्यवाही, पुनर्विचार और अन्य संवैधानिक विकल्पों की स्थिति भी देखनी होती है। इसलिए सोनिया के मामले की वर्तमान कानूनी स्थिति के बारे में जानकारी देते समय संबंधित अदालतों के अंतिम आदेशों को आधार बनाना जरूरी है।

रेणुका शिंदे और सीमा गावित की सजा क्यों बदली गई?

महाराष्ट्र के कोल्हापुर से जुड़ा रेणुका शिंदे और सीमा गावित का मामला भी भारतीय आपराधिक इतिहास में बेहद गंभीर माना जाता है। दोनों बहनों पर 1990 से 1996 के बीच कई बच्चों के अपहरण और हत्याओं में शामिल होने का आरोप था। जांच और मुकदमे के बाद उन्हें दोषी ठहराया गया और निचली अदालत ने मृत्युदंड सुनाया। बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी मौत की सजा को बरकरार रखा था।

इस मामले में कुल 13 बच्चों के अपहरण और उनमें से कई की हत्या का विवरण न्यायिक रिकॉर्ड में मिलता है। अदालतों में इस बात पर विचार किया गया कि बच्चों को अगवा करने और उनके साथ किए गए अपराध कितने गंभीर थे। मामले की भयावहता के कारण दोनों बहनों को मृत्युदंड दिए जाने का फैसला लंबे समय तक चर्चा में रहा।

लेकिन इस मामले में आगे एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ आया। दोनों की दया याचिकाओं के निपटारे में काफी देरी हुई थी। इस देरी को चुनौती देते हुए उन्होंने अपनी मृत्युदंड की सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग की। 18 जनवरी 2022 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनकी दया याचिकाओं के निपटारे में हुई लंबी देरी को ध्यान में रखते हुए दोनों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ उन्हें तत्काल रिहा करना नहीं है।

यह फैसला बताता है कि गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए जाने और मृत्युदंड की पुष्टि हो जाने के बाद भी संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया का महत्व बना रहता है। किसी मामले में अपराध की गंभीरता के साथ-साथ यह भी देखा जाता है कि सजा लागू करने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप पूरी हुई या नहीं।

भारत में महिलाओं को फांसी देने का मामला इतना दुर्लभ क्यों है?

भारत में मृत्युदंड का प्रावधान मौजूद है, लेकिन अदालतें इसे असाधारण परिस्थितियों में ही देने का सिद्धांत अपनाती हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार, मृत्युदंड उन मामलों में दिया जा सकता है जिन्हें दुर्लभतम से दुर्लभ श्रेणी में रखा जाए। इसका मतलब है कि केवल अपराध का गंभीर होना ही पर्याप्त नहीं है; अदालत को मामले के सभी पहलुओं, अपराध की परिस्थितियों और दोषी से जुड़े प्रासंगिक तथ्यों पर भी विचार करना होता है।

महिला दोषियों के मामलों में भी यही कानूनी कसौटी लागू होती है। अदालत मृत्युदंड सुनाती है तो दोषी के पास कानून के तहत उपलब्ध अपील और अन्य उपायों का सहारा लेने का अवसर रहता है। इसके बाद दया याचिका की प्रक्रिया भी हो सकती है। किसी मामले में सजा उम्रकैद में बदल सकती है, जबकि दूसरे मामले में मृत्युदंड बरकरार रह सकता है।

इसी वजह से देश में मृत्युदंड पाने वाली महिलाओं की संख्या और वास्तव में फांसी पर चढ़ाई गई महिलाओं की संख्या को अलग-अलग समझना आवश्यक है। शबनम, सोनिया, रेणुका शिंदे और सीमा गावित जैसे मामलों में सजा सुनाए जाने और उसके अंतिम परिणाम के बीच कानूनी प्रक्रिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मेरठ के मामले के बाद फिर क्यों उठ रहा है यह सवाल?

मेरठ के नीले ड्रम हत्याकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि जघन्य अपराधों में दोषियों को किस तरह की सजा मिलनी चाहिए। ऐसे मामलों में जनता की नजर अदालत के फैसले पर रहती है, लेकिन किसी भी आरोपी की सजा का निर्धारण सबूतों, सुनवाई और लागू कानून के आधार पर ही किया जाता है। मीडिया में सामने आने वाली खबरों और अदालत के अंतिम आदेश के बीच अंतर को समझना भी जरूरी है।

महिला अपराधियों को मृत्युदंड मिलने के इतिहास को देखें तो कई चर्चित मामलों में अदालतों ने फांसी की सजा सुनाई, लेकिन हर मामले में उसे लागू नहीं किया गया। रतन बाई जैन का नाम स्वतंत्र भारत में फांसी पाने वाली महिला के रूप में प्रचलित है, जबकि शबनम का मामला मृत्युदंड सुनाए जाने के बावजूद वास्तविक फांसी तक नहीं पहुंचा है। रेणुका शिंदे और सीमा गावित की सजा भी बाद में उम्रकैद में बदल दी गई।

इसलिए इस विषय पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मृत्युदंड मिलना और वास्तव में फांसी दिया जाना अलग-अलग घटनाएं हैं। किसी महिला को देश में आखिरी बार कब फांसी दी गई, इसका जवाब देते समय ऐतिहासिक रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेजों की पुष्टि करना आवश्यक है। मेरठ हत्याकांड की चर्चा के बीच यही अंतर समझना भारतीय न्याय व्यवस्था और मृत्युदंड के इतिहास को सही संदर्भ में देखने के लिए जरूरी है।