फ्रांस में सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा एक बार फिर सड़कों पर दिखाई दिया। महंगाई, सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की कमी और पुलिस की सख्त कार्रवाई से नाराज हजारों नहीं, बल्कि लाखों लोग शनिवार को विरोध प्रदर्शन करने के लिए बाहर निकले। राजधानी पेरिस समेत देश के कई प्रमुख शहरों में प्रदर्शनकारियों ने मार्च निकालकर सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। शुरुआत में कई जगह प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ इलाकों में हालात बिगड़ने के बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हो गया।
पेरिस में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस, वाटर कैनन और अन्य उपकरणों का इस्तेमाल किया। कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज भी किया गया। फ्रांस के गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देशभर में हुई कार्रवाई के दौरान लगभग 1300 लोगों को गिरफ्तार किया गया। प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या को लेकर सरकार और ट्रेड यूनियनों के दावों में अंतर रहा। सरकारी आंकड़ों में करीब चार लाख लोगों के शामिल होने की बात कही गई, जबकि यूनियनों ने यह संख्या लगभग आठ लाख बताई।
स्कूलों की समस्याओं से शुरू हुआ विरोध, अब महंगाई भी बड़ा मुद्दा
फ्रांस में जारी विरोध प्रदर्शन की शुरुआत सितंबर में हाईस्कूल के विद्यार्थियों की नाराजगी से हुई थी। छात्र अपने स्कूलों की खराब स्थिति, शिक्षकों की कमी और पढ़ाई के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। कई स्कूलों की इमारतें जर्जर बताई गईं। कुछ जगहों पर छतों से पानी टपकने, कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा विद्यार्थियों के बैठने और पर्याप्त कुर्सियां उपलब्ध नहीं होने जैसी समस्याएं सामने आईं।
शुरुआत में यह आंदोलन मुख्य रूप से शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग तक सीमित था। हालांकि, समय बीतने के साथ इसमें शिक्षकों, अभिभावकों, सामाजिक संगठनों और ट्रेड यूनियनों की भागीदारी बढ़ती गई। प्रदर्शनकारियों ने स्कूलों की स्थिति सुधारने के साथ-साथ बढ़ती महंगाई और पुलिस के रवैये को भी अपने आंदोलन का हिस्सा बना लिया।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आम लोगों की आर्थिक परेशानियों को दूर करने और सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए सरकार पर्याप्त कदम नहीं उठा रही है। उनके मुताबिक, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधा की खराब स्थिति का असर सीधे बच्चों के भविष्य पर पड़ता है। वहीं, महंगाई के कारण परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है। इन मुद्दों को लेकर लोगों की नाराजगी अब व्यापक आंदोलन का रूप ले चुकी है।
राजधानी पेरिस में एक लाख से ज्यादा लोगों ने निकाला मार्च
शनिवार को सबसे बड़ा प्रदर्शन राजधानी पेरिस में देखने को मिला। सरकारी अनुमान के अनुसार, यहां लगभग 1.10 लाख लोगों ने मार्च में हिस्सा लिया। अलग-अलग आयु वर्ग के लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शन में विद्यार्थियों के अलावा उनके माता-पिता, बुजुर्ग और अन्य नागरिक भी शामिल हुए।
मार्च के दौरान लोगों ने सरकार के खिलाफ नारे लगाए और अपने अधिकारों की रक्षा की मांग की। प्रदर्शनकारियों के हाथों में कई तरह के पोस्टर और बैनर दिखाई दिए। कुछ पर लिखा था कि दमन से विद्रोह पैदा होता है, जबकि दूसरे बैनरों के जरिए यह संदेश दिया गया कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना नागरिकों का अधिकार है।
प्रदर्शनकारियों का उद्देश्य केवल शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करना नहीं था। वे सरकार की आर्थिक नीतियों और पुलिस की कार्रवाई के तरीके पर भी सवाल उठा रहे थे। उनका आरोप था कि सरकार असहमति जताने वाले नागरिकों की बात सुनने के बजाय उन पर सख्ती कर रही है।
हालांकि, मार्च के अंतिम चरण में स्थिति बिगड़ गई। कुछ नकाबपोश लोगों ने पुलिस की ओर पत्थर और कांच की बोतलें फेंकीं। कुछ जगहों पर कूड़ेदानों में आग लगा दी गई और पुलिस की दिशा में पटाखे भी फेंके गए। इसके बाद पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। कई स्थानों पर स्टन ग्रेनेड चलाए जाने और प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किए जाने की भी खबरें सामने आईं।
मार्सेई से टूलूज तक तनाव, दो लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर
पेरिस के अलावा फ्रांस के कई अन्य शहरों में भी सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए। लियोन, लिली, मॉन्टपेलियर, नांत और टूलूज में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। इन शहरों में पुलिस ने संवेदनशील इलाकों और प्रमुख स्थानों की ओर बढ़ रही भीड़ को रोकने की कोशिश की। कुछ जगहों पर आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया।
मार्सेई में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प होने की सूचना मिली। वहीं, क्लेरमों-फेरां और टूलूज में कम से कम दो लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक, टूलूज में एक व्यक्ति की उंगलियां पुलिस के विस्फोटक हथियार की वजह से कट गईं। इन घटनाओं ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों और भीड़ को नियंत्रित करने के तरीकों पर फिर से सवाल खड़े कर दिए।
हिंसा फैलने की आशंका को देखते हुए प्रशासन ने बड़े पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था की थी। देश के विभिन्न हिस्सों में 70 हजार से ज्यादा पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। दुकानदारों ने संभावित नुकसान से बचने के लिए अपनी दुकानों के बाहर लकड़ी के पटरे लगाए। कुछ संग्रहालयों को भी बंद रखा गया, ताकि हिंसा या तोड़फोड़ की स्थिति में लोगों और संपत्ति को सुरक्षित रखा जा सके।
प्रदर्शनकारियों ने मैक्रों सरकार पर लोकतांत्रिक अधिकार सीमित करने का लगाया आरोप
आंदोलन के दौरान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार भी निशाने पर रही। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार लोगों की नाराजगी दूर करने के बजाय विरोध प्रदर्शनों को रोकने पर ज्यादा ध्यान दे रही है। उनका कहना है कि कुछ प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाए गए और प्रदर्शनकारियों को शहरों के महत्वपूर्ण इलाकों तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की गई।
पेरिस में प्रदर्शन में शामिल 43 वर्षीय नादेज ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि पिछले सप्ताह एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान उन पर आंसू गैस छोड़ी गई थी। इसके बावजूद उन्होंने दोबारा आंदोलन में भाग लेने का फैसला किया। उनके अनुसार, सड़कों पर उतरकर अपनी बात रखना नागरिकों का कानूनी अधिकार है और इस अधिकार की रक्षा करना जरूरी है।
पेरिस के एक साइंस कॉलेज में पढ़ने वाले 21 वर्षीय छात्र ने भी सरकार के रवैये पर चिंता जताई। छात्र के मुताबिक, लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि सरकार लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करना चाहती है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के बजाय सरकार को उनकी समस्याओं पर बातचीत करनी चाहिए।
पुलिस के हथियारों से घायल हुए लोगों के मामलों की भी जांच
फ्रांस में पुलिस की कार्रवाई को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। मौजूदा आंदोलन में प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पुलिस की सख्ती के कारण कई लोग घायल हुए हैं। पुलिस के विस्फोटक हथियारों के इस्तेमाल से कुछ छात्रों और प्रदर्शनकारियों को चोट लगने के मामलों की जांच भी चल रही है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के अधिकार को नुकसान पहुंचे। दूसरी ओर, हिंसक घटनाओं के दौरान पुलिस पर पत्थर और बोतलें फेंके जाने जैसी घटनाओं ने भी सुरक्षा बलों के सामने चुनौती बढ़ाई।
इस तरह आंदोलन में दो अलग-अलग चिंताएं सामने आ रही हैं। एक ओर लोग सरकार की नीतियों, महंगाई और सार्वजनिक सुविधाओं की स्थिति से नाराज हैं, वहीं दूसरी ओर हिंसा और पुलिस की कार्रवाई के कारण हालात और तनावपूर्ण हो रहे हैं।
पिछले सप्ताह भी बड़े पैमाने पर हुई थी तोड़फोड़ और गिरफ्तारियां
फ्रांस में शनिवार को हुई कार्रवाई से पहले पिछले सप्ताह भी व्यापक हिंसा की घटनाएं सामने आई थीं। उस दौरान उपद्रवियों ने दुकानों के शीशे तोड़े, कई जगहों पर सामान लूटा, वाहनों में आग लगाई और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया। इन घटनाओं के बाद देशभर में कम से कम 2700 लोगों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
पिछले सप्ताह की घटनाओं को देखते हुए प्रशासन को आशंका थी कि शनिवार के प्रदर्शन भी हिंसक हो सकते हैं। इसी वजह से पुलिस बल की संख्या बढ़ाई गई और कई सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा के अतिरिक्त इंतजाम किए गए। दुकानों और अन्य प्रतिष्ठानों को नुकसान से बचाने के लिए भी एहतियाती कदम उठाए गए।
हालांकि, भारी पुलिस तैनाती के बावजूद कुछ शहरों में झड़पें हुईं। इससे स्पष्ट हुआ कि सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ आंदोलन के पीछे मौजूद असंतोष को समझना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
विपक्षी नेता मेलेनशों ने सरकार से मांगें स्वीकार करने को कहा
फ्रांस के वामपंथी नेता और राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ज्यां-ल्यूक मेलेनशों भी पेरिस में हुए प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति मैक्रों को लोगों की नाराजगी दूर करने के लिए उनकी मांगों पर ध्यान देना चाहिए। उनके अनुसार, यदि सरकार ने जनता की समस्याओं का समाधान नहीं किया, तो ऐसे विरोध प्रदर्शन आगे भी जारी रह सकते हैं।
इसी बीच, ओरलियॉं शहर में हजारों लोगों ने दक्षिणपंथी और आव्रजन विरोधी पार्टी नेशनल रैली के सम्मेलन के खिलाफ मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों ने पार्टी की नेता मरीन ले पेन और राष्ट्रपति मैक्रों के खिलाफ नारेबाजी की। इससे पता चलता है कि फ्रांस में राजनीतिक असहमति केवल शिक्षा और महंगाई तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की व्यापक राजनीतिक दिशा को लेकर भी मतभेद मौजूद हैं।
फिलहाल, फ्रांस में जारी आंदोलन सरकार के सामने कई सवाल खड़े कर रहा है। स्कूलों में सुविधाओं की कमी, महंगाई, पुलिस की सख्ती और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर उठ रही आवाजें एक बड़े जन असंतोष का संकेत दे रही हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि सरकार केवल सुरक्षा बलों के जरिए हालात संभालने की कोशिश न करे, बल्कि उन समस्याओं का समाधान भी निकाले जिनकी वजह से लोग लगातार सड़कों पर उतर रहे हैं। आने वाले दिनों में सरकार की प्रतिक्रिया और प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत की दिशा यह तय करने में अहम होगी कि देश में तनाव कम होता है या आंदोलन और व्यापक रूप लेता है।




