भारत के युवा खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर अपनी प्रतिभा का एक बार फिर शानदार प्रदर्शन किया है। सेनेगल की राजधानी डकार में आयोजित यूथ ओलंपिक 2026 में भारतीय खिलाड़ी राजकुमारी लंचेनबी चानू ने ऐसा मुकाम हासिल किया है, जिसने देश के वुशु खेल के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। मणिपुर की इस प्रतिभाशाली खिलाड़ी ने महिला चांगक्वान संयुक्त स्पर्धा में कांस्य पदक अपने नाम किया। इस उपलब्धि के साथ ही वह यूथ ओलंपिक के इतिहास में वुशु में पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं।
चानू की इस कामयाबी ने न केवल भारतीय खेल प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वुशु में भारत की मौजूदगी को भी मजबूती दी है। खास बात यह है कि उन्होंने ऐसे मुकाबले में पदक हासिल किया, जिसमें दुनिया के अलग-अलग देशों से आई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था। फाइनल में भारतीय खिलाड़ी ने 18.039 अंक हासिल किए और तीसरे स्थान पर रहते हुए पोडियम पर जगह बनाई।
इस जीत के साथ डकार में चल रहे युवा ओलंपिक खेलों में भारत के पदकों की संख्या भी तीन हो गई है। भारतीय दल अब तक एक सिल्वर और दो ब्रॉन्ज मेडल जीत चुका है। चानू से पहले जूडो और तैराकी में भी भारतीय खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन किया था।
आखिरी मुकाबले में शानदार वापसी ने दिलाया कांस्य पदक
राजकुमारी लंचेनबी चानू का फाइनल मुकाबला आसान नहीं था। महिला चांगक्वान संयुक्त स्पर्धा में खिलाड़ियों को दो अलग-अलग रूटीन में अपना कौशल दिखाना होता है। इनमें गुनशु और चांगक्वान शामिल हैं। दोनों रूटीन में प्राप्त अंकों को जोड़कर खिलाड़ी की अंतिम रैंकिंग तय की जाती है।
भारतीय खिलाड़ी ने प्रतियोगिता में दोनों स्पर्धाओं के दौरान बेहतरीन संतुलन और तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया। गुनशु रूटीन में उन्हें 8.723 अंक मिले। इस प्रदर्शन के आधार पर वह उस चरण में चौथे स्थान पर रहीं। हालांकि, इसके बाद चांगक्वान रूटीन में उन्होंने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 9.316 अंक हासिल किए।
दूसरे रूटीन में मिले अंकों ने उनकी स्थिति बदल दी और वह कुल 18.039 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर पहुंच गईं। इस तरह उन्होंने कांस्य पदक अपने नाम कर लिया। खास बात यह रही कि चांगक्वान रूटीन में उनका प्रदर्शन फाइनल में मौजूद खिलाड़ियों में दूसरे स्थान पर रहा। बेहतर प्रदर्शन के दम पर उन्होंने गुनशु में पीछे रहने के बावजूद पदक तक का सफर तय किया।
फाइनल में मिस्र की सोंडोस सोनबोल ने दोनों रूटीन में शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 18.660 अंक हासिल किए और गोल्ड मेडल जीत लिया। वेनेजुएला की वालेरिया फ्रैनरीस डुडामेल 18.199 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। भारतीय खिलाड़ी उनसे मामूली अंतर से पीछे रहते हुए तीसरे स्थान पर रहीं।
प्रतियोगिता से पहले भी दिखाया था दम, क्वालीफाइंग राउंड में रहीं दूसरे नंबर पर
राजकुमारी चानू की यह उपलब्धि अचानक मिली सफलता नहीं है। उन्होंने फाइनल तक पहुंचने से पहले ही अपने प्रदर्शन से पदक की दावेदारी मजबूत कर दी थी। प्रतियोगिता के शुरुआती चरण में भी भारतीय खिलाड़ी ने अपनी तकनीक और खेल कौशल से दूसरी प्रतिभागियों को कड़ी चुनौती दी थी।
महिला चांगक्वान संयुक्त स्पर्धा के प्रारंभिक दौर में चानू ने कुल 17.982 अंक हासिल किए थे। इसमें गुनशु में उनके 8.876 अंक और चांगक्वान में 9.106 अंक शामिल थे। इस प्रदर्शन के साथ वह 12 खिलाड़ियों के बीच दूसरे स्थान पर रही थीं। मिस्र की सोंडोस सोनबोल उनसे आगे थीं। शीर्ष आठ खिलाड़ियों को फाइनल में पहुंचने का मौका मिला था।
फाइनल में पहुंचने के बाद भारतीय खिलाड़ी के सामने अपने शुरुआती प्रदर्शन को बरकरार रखने और बेहतर परिणाम हासिल करने की चुनौती थी। गुनशु में चौथे स्थान पर रहने के बाद उन्होंने चांगक्वान में शानदार प्रदर्शन किया और अंततः तीसरा स्थान हासिल कर लिया।
यह प्रदर्शन बताता है कि बड़े अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में दबाव के बीच भी चानू ने अपना आत्मविश्वास बनाए रखा। शुरुआती चरण में दूसरे नंबर पर रहना और फाइनल में कांस्य पदक हासिल करना उनके लगातार अच्छे प्रदर्शन का प्रमाण है।
आखिर क्या है वुशु और कैसे तय होता है इसमें विजेता?
राजकुमारी चानू की उपलब्धि को समझने के लिए वुशु खेल के बारे में जानना भी जरूरी है। वुशु चीन की पारंपरिक मार्शल आर्ट पर आधारित खेल है। इसमें शारीरिक ताकत के साथ-साथ संतुलन, फुर्ती, लचीलापन, एकाग्रता और तकनीकी कौशल की अहम भूमिका होती है। इस खेल में खिलाड़ियों को अपनी शारीरिक क्षमता और निर्धारित तकनीकों का बेहतरीन तालमेल दिखाना पड़ता है।
वुशु की प्रतियोगिताओं में अलग-अलग प्रारूप होते हैं। इनमें ताओलू एक प्रमुख प्रारूप है, जिसमें खिलाड़ी निर्धारित गतिविधियों और मार्शल आर्ट तकनीकों का प्रदर्शन करते हैं। चांगक्वान और गुनशु इसी का हिस्सा हैं।
चांगक्वान: इस रूटीन में खिलाड़ी बिना किसी हथियार के अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। इसमें तेज गति, ऊंची छलांग, किक, हाथों की तकनीक, शरीर का संतुलन और लचीलेपन का विशेष महत्व होता है। खिलाड़ियों को निर्धारित क्रम में अपनी गतिविधियां पूरी करनी होती हैं।
गुनशु: यह हथियारों के साथ किया जाने वाला प्रदर्शन है। इसमें खिलाड़ी पारंपरिक वुशु हथियार का इस्तेमाल करते हुए अपनी तकनीक, नियंत्रण, गति और तालमेल दिखाते हैं। इस रूटीन में हथियार को संभालने की क्षमता के साथ शरीर का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी होता है।
राजकुमारी ने इन दोनों रूटीन में हिस्सा लिया था। उनके दोनों प्रदर्शनों के अंकों को जोड़कर अंतिम परिणाम तैयार किया गया। यही वजह रही कि चांगक्वान में बेहतर स्कोर हासिल करने के बाद वह पदक जीतने में सफल रहीं।
इस प्रतियोगिता में खिलाड़ियों को सिर्फ ताकत के आधार पर अंक नहीं मिलते, बल्कि उनके प्रदर्शन की तकनीकी गुणवत्ता और निर्धारित गतिविधियों को सही तरीके से पूरा करने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है। इस लिहाज से चानू का प्रदर्शन भारतीय वुशु के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
यूथ ओलंपिक में पहली बार पदक स्पर्धा के रूप में शामिल हुआ वुशु
चानू के कांस्य पदक की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि डकार में आयोजित 2026 यूथ ओलंपिक में वुशु को पहली बार पदक जीतने वाले खेल के रूप में शामिल किया गया है। यानी इस प्रतियोगिता में दुनिया के युवा वुशु खिलाड़ियों को पहली बार यूथ ओलंपिक के मंच पर पदक के लिए मुकाबला करने का अवसर मिला।
ऐसे में भारतीय खिलाड़ी का इस खेल के पहले ही यूथ ओलंपिक संस्करण में पदक जीतना देश के लिए खास उपलब्धि है। उन्होंने न केवल अपने नाम एक ऐतिहासिक मेडल दर्ज कराया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय वुशु को भी पहचान दिलाई।
इस प्रतियोगिता में महिला चांगक्वान संयुक्त स्पर्धा के अलावा पुरुष चांगक्वान और महिला-पुरुष ताइजिचुआन संयुक्त स्पर्धाएं भी आयोजित की गईं। इन मुकाबलों में विभिन्न देशों के खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। महिला चांगक्वान में भारत की तरफ से राजकुमारी चानू ने चुनौती पेश की और पोडियम पर जगह बनाने में कामयाबी हासिल की।
डकार 2026 यूथ ओलंपिक का आयोजन 31 अक्टूबर से 13 नवंबर तक सेनेगल में किया जा रहा है। यह प्रतियोगिता अफ्रीकी महाद्वीप पर आयोजित होने वाला पहला ओलंपिक खेल आयोजन भी है। इसमें दुनिया भर के युवा खिलाड़ी अलग-अलग खेलों में अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं।
मणिपुर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचीं चानू
राजकुमारी लंचेनबी चानू मणिपुर से आती हैं। यह राज्य भारत में मार्शल आर्ट और वुशु जैसे खेलों के लिए जाना जाता है। यहां के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। चानू की उपलब्धि भी इसी खेल परंपरा को आगे बढ़ाने वाली मानी जा रही है।
डकार में पदक जीतने से पहले भी वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी थीं। साल 2026 में चीन के तियानजिन में आयोजित वर्ल्ड जूनियर वुशु चैंपियनशिप में उन्होंने लड़कियों की युवा चांगक्वान स्पर्धा में कांस्य पदक हासिल किया था। इस प्रदर्शन ने उनके अंतरराष्ट्रीय करियर को नई मजबूती दी।
अब यूथ ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने एक और बड़ी उपलब्धि अपने नाम कर ली है। जूनियर स्तर पर विश्व प्रतियोगिता में पदक हासिल करने के बाद ओलंपिक स्तर की युवा प्रतियोगिता में भी पोडियम तक पहुंचना उनके लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
मणिपुर की एक अन्य वुशु खिलाड़ी नाओरेम रोशिबिना देवी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर चुकी हैं। उन्होंने 2022 एशियन गेम्स में वुशु की महिलाओं की 60 किलोग्राम स्पर्धा में कांस्य पदक जीता था। ऐसे में चानू की सफलता को मणिपुर से निकल रही नई खेल प्रतिभाओं की उपलब्धि के रूप में भी देखा जा रहा है।
जूडो और तैराकी में भी भारतीय खिलाड़ियों ने दिखाया दम
डकार यूथ ओलंपिक में भारत का प्रदर्शन सिर्फ वुशु तक सीमित नहीं रहा। इससे पहले भी भारतीय खिलाड़ियों ने अलग-अलग खेलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश के खाते में पदक जोड़े थे। राजकुमारी चानू का कांस्य पदक आने से पहले भारत एक सिल्वर और एक ब्रॉन्ज मेडल जीत चुका था।
भारतीय दल के लिए पहला पदक तैराकी में धिनिधि देसिंघु ने हासिल किया था। उन्होंने महिलाओं की 100 मीटर फ्रीस्टाइल स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। 16 वर्षीय धिनिधि ने फाइनल में 56.27 सेकंड का समय निकालकर तीसरा स्थान हासिल किया। इस दौरान उन्होंने अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड बेहतर किया।
इस मुकाबले में क्रोएशिया की एना बोबानोविच ने 55.89 सेकंड के समय के साथ गोल्ड मेडल जीता, जबकि न्यूजीलैंड की एलिसा लॉसन 56.13 सेकंड के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। धिनिधि का यह पदक इसलिए भी खास रहा, क्योंकि वह यूथ ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय तैराक बनीं।
इसके बाद भारतीय जूडो खिलाड़ी खुशबू राजकभाई दरजादा ने महिलाओं की 63 किलोग्राम भार वर्ग स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीतकर देश को दूसरी बड़ी सफलता दिलाई। फाइनल मुकाबले में उनका सामना जर्मनी की जोलिना राइनहोल्ड से हुआ, जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा और उन्होंने रजत पदक के साथ अपना अभियान समाप्त किया।
खुशबू ने फाइनल तक पहुंचने के लिए शानदार खेल दिखाया था। उन्होंने शुरुआती मुकाबले में गिनी की मामाइसाता कामारा को हराया। इसके बाद क्वार्टर फाइनल में मोरक्को की अबीर बुआज्जाउई और सेमीफाइनल में अल्जीरिया की दुनिया बेराहौआल को मात देकर फाइनल में जगह बनाई।
खुशबू यूथ ओलंपिक में पदक जीतने वाली दूसरी भारतीय महिला जूडो खिलाड़ी भी बनीं। उनसे पहले 2018 में तबाबी देवी थांगजाम ने रजत पदक जीता था।
भारत के लिए आगे बढ़ने की नई उम्मीद
राजकुमारी लंचेनबी चानू का कांस्य पदक भारतीय खेलों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया है। इससे पता चलता है कि भारत के युवा खिलाड़ी अब पारंपरिक रूप से लोकप्रिय खेलों के अलावा वुशु जैसी विधाओं में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बना रहे हैं।
किसी भी खेल में पहली ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करना आसान नहीं होता। इसके लिए वर्षों की मेहनत, अनुशासन, नियमित अभ्यास और बड़े मुकाबलों में दबाव का सामना करने की क्षमता जरूरी होती है। चानू ने अपने प्रदर्शन से इन सभी पहलुओं की झलक दिखाई है।
उनकी सफलता से देश में वुशु को लेकर दिलचस्पी बढ़ने की उम्मीद है। खासकर पूर्वोत्तर भारत के उन युवा खिलाड़ियों को इससे प्रेरणा मिल सकती है, जो इस खेल में अपना भविष्य बनाना चाहते हैं।
डकार में भारत के खाते में अब तक एक रजत और दो कांस्य पदक आ चुके हैं। धिनिधि देसिंघु ने तैराकी, खुशबू दरजादा ने जूडो और राजकुमारी चानू ने वुशु में देश को गौरवान्वित किया है। तीनों खिलाड़ियों की उपलब्धियां अलग-अलग खेलों में भारत की बढ़ती संभावनाओं को दिखाती हैं।
फिलहाल चानू की ऐतिहासिक सफलता सबसे खास इसलिए है, क्योंकि उन्होंने यूथ ओलंपिक में वुशु का पहला भारतीय पदक दिलाया है। उनका यह कांस्य पदक आने वाले समय में भारतीय वुशु के लिए नई संभावनाओं के दरवाजे खोल सकता है।




