अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में कांटे की टक्कर: ट्रम्प की नीतियों से नाराजगी के बीच वोटिंग शुरू, कई राज्यों में तकनीकी और मौसम की चुनौतियां

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में कांटे की टक्कर: ट्रम्प की नीतियों से नाराजगी के बीच वोटिंग शुरू, कई राज्यों में तकनीकी और मौसम की चुनौतियां

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल के बीच हो रहे इस चुनाव को उनकी लोकप्रियता और सरकार की नीतियों पर जनता के रुख की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। मतदान शुरू होते ही कई राज्यों से चुनावी व्यवस्थाओं में गड़बड़ी की खबरें सामने आने लगी हैं। न्यूयॉर्क में वोटिंग मशीनों के बैलट स्कैन नहीं करने की शिकायत मिली है, जबकि फ्लोरिडा में बाढ़ के कारण कई मतदान केंद्रों को दूसरी जगह स्थानांतरित करना पड़ा है।

इस बार मुकाबला केवल रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के बीच सीटें हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में सत्ता का संतुलन भी इसी चुनाव से तय होगा। फिलहाल ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में बहुमत हासिल है। ऐसे में डेमोक्रेटिक पार्टी के पास सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका है।

भारतीय समय के अनुसार मंगलवार शाम 4:30 बजे मतदान की प्रक्रिया शुरू हुई। यह बुधवार सुबह 11:30 बजे तक जारी रहेगी। चुनाव के दौरान सामने आ रही तकनीकी परेशानियों, सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंकाओं ने भी माहौल को गर्म कर दिया है।

न्यूयॉर्क में मशीनों की परेशानी, फ्लोरिडा में बदले मतदान केंद्र

मतदान के शुरुआती घंटों में न्यूयॉर्क के वेस्टचेस्टर जिले से वोटिंग मशीनों में तकनीकी समस्या की जानकारी मिली। यहां कुछ मशीनें मतदाताओं के बैलट को स्कैन करने में असमर्थ रहीं। इससे मतदान प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका पैदा हो गई है। अधिकारियों के सामने मशीनों की खराबी को जल्द ठीक करने की चुनौती है।

दूसरी तरफ फ्लोरिडा में खराब मौसम और बाढ़ ने चुनावी तैयारियों को प्रभावित किया। पानी भरने की वजह से प्रशासन को 21 मतदान केंद्रों के स्थान बदलने पड़े। इससे मतदाताओं को अपने निर्धारित बूथ के बजाय दूसरे केंद्रों पर जाकर मतदान करना पड़ रहा है।

इन घटनाओं के बीच कुछ राज्य अधिकारियों ने ट्रम्प प्रशासन की भूमिका को लेकर भी चिंता जताई है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि संघीय सरकार मतदान और मतगणना की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर सकती है। ट्रम्प प्रशासन की तरफ से गैर-अमेरिकी नागरिकों द्वारा मतदान किए जाने की आशंका जताई गई है। इसी आधार पर कई राज्यों के मतदान केंद्रों के आसपास सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी आशंका जताई गई है कि वोटिंग मशीनों की जांच के नाम पर मतदान में व्यवधान पैदा हो सकता है। हालांकि, अमेरिकी संविधान चुनाव कराने की जिम्मेदारी राज्यों को देता है। राष्ट्रपति के पास सीधे तौर पर राज्य स्तर पर चुनाव संचालित करने का अधिकार नहीं है।

चुनाव से पहले 5.76 करोड़ मतदाताओं ने डाले वोट

इस बार अमेरिकी मतदाताओं में शुरुआती मतदान को लेकर काफी उत्साह देखने को मिला है। मतदान के आधिकारिक दिन से पहले ही 5.76 करोड़ लोग अर्ली वोटिंग के माध्यम से अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर चुके थे।

यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, इस बार शुरुआती मतदान का आंकड़ा 2022 के मिडटर्म चुनाव से काफी आगे निकल गया है। पिछले मिडटर्म चुनाव में लगभग 4.59 करोड़ मतदाताओं ने मतदान की निर्धारित तारीख से पहले ही वोट डाल दिया था।

इस बार शुरुआती वोटिंग में डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों की भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक रही है। वहीं, रिपब्लिकन पार्टी के मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा मतदान के मुख्य दिन वोट डालना पसंद करता है। इसलिए शुरुआती मतदान के आंकड़ों के आधार पर किसी पार्टी की जीत का अनुमान लगाना आसान नहीं होगा।

देशभर में निगरानी के लिए 1,000 चुनाव मॉनिटर तैनात

चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने के लिए अमेरिकी न्याय विभाग ने भी बड़े स्तर पर निगरानी व्यवस्था की है। विभाग की तरफ से सभी 50 राज्यों में लगभग 1,000 चुनाव मॉनिटर नियुक्त किए गए हैं। इसे न्याय विभाग का अब तक का सबसे बड़ा चुनाव निगरानी अभियान बताया जा रहा है।

ये अधिकारी देश के 126 चुनावी क्षेत्रों में तैनात रहेंगे। इनकी जिम्मेदारी मतदान के दौरान संघीय चुनाव कानूनों के पालन पर नजर रखना है। इसके अलावा मतदाताओं के साथ नस्लीय भेदभाव, वोट डालने से रोकने की कोशिश, डराने-धमकाने और भाषा संबंधी सहायता उपलब्ध नहीं होने जैसी शिकायतों पर भी ध्यान दिया जाएगा।

संसद में बहुमत के लिए दोनों पार्टियों की अलग-अलग रणनीति

अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दो सदन हैं। इनमें ऊपरी सदन सीनेट और निचला सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स कहलाता है। दोनों सदनों में बहुमत हासिल करने के लिए अलग-अलग सीटों का गणित समझना जरूरी है।

सीनेट में कुल 100 सदस्य होते हैं। फिलहाल रिपब्लिकन पार्टी के पास 53 सीटें हैं, जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 45 सीटें हैं। दो निर्दलीय सांसद भी हैं, जो डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर काम करते हैं। इस तरह दोनों राजनीतिक खेमों के बीच सीटों का अनुपात 53-47 है।

सीनेट में सामान्य तौर पर बहुमत के लिए 51 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। हालांकि, दोनों पार्टियों के बीच 50-50 का मुकाबला होने पर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को निर्णायक वोट देने का अधिकार है।

इस बार सीनेट की 35 सीटों पर चुनाव हो रहा है। इनमें से 22 सीटें फिलहाल रिपब्लिकन और 13 सीटें डेमोक्रेटिक पार्टी के पास हैं। डेमोक्रेट्स को सीनेट में बहुमत हासिल करने के लिए मौजूदा स्थिति से कम से कम चार सीटों का शुद्ध फायदा उठाना होगा।

दूसरी तरफ हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में कुल 435 सदस्य होते हैं। इस बार सभी सीटों पर मतदान कराया जा रहा है। यहां बहुमत का आंकड़ा 218 है। जिस पार्टी को 218 या इससे ज्यादा सीटें मिलेंगी, उसका निचले सदन पर नियंत्रण हो जाएगा। रिपब्लिकन पार्टी के सामने अपना मौजूदा वर्चस्व कायम रखने की चुनौती है, जबकि डेमोक्रेट्स दोनों सदनों में बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

ट्रम्प सरकार की चार नीतियां बनीं चुनाव का बड़ा मुद्दा

इस चुनाव में मतदाताओं के सामने कई ऐसे मुद्दे हैं, जिनका सीधा संबंध उनके रोजमर्रा के जीवन और आर्थिक स्थिति से है। ईंधन की कीमतों से लेकर इमिग्रेशन, व्यापार शुल्क और स्वास्थ्य सुविधाओं तक, कई विषय चुनावी बहस के केंद्र में हैं।

1. ईरान युद्ध और बढ़ती महंगाई

ईरान युद्ध के बाद अमेरिका में ईंधन की कीमतों में तेजी आने का दावा किया जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, डीजल लगभग 70 प्रतिशत और पेट्रोल करीब 50 प्रतिशत तक महंगा हुआ है। इससे आम परिवारों के खर्च पर दबाव बढ़ा है।

ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 31 प्रतिशत तक पहुंचने की बात कही जा रही है। रूस से तीन लाख मीट्रिक टन से अधिक डीजल खरीदने के फैसले को लेकर भी उनकी आलोचना हो रही है। विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहा है और बढ़ती कीमतों को उसकी नीतियों का परिणाम बता रहा है।

2. अवैध प्रवासियों पर सख्ती और इमिग्रेशन नीति

ट्रम्प प्रशासन ने अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त अभियान चलाया है। उनके दूसरे कार्यकाल के शुरुआती 18 महीनों में करीब 9.8 लाख लोगों को अमेरिका से वापस भेजे जाने का दावा है। वहीं, मेक्सिको सीमा से होने वाली अवैध घुसपैठ में 95 प्रतिशत की कमी दर्ज होने की बात कही गई है।

हालांकि, इस नीति का विरोध भी हो रहा है। डेमोक्रेट्स का कहना है कि कार्रवाई के दौरान ऐसे लोगों को भी निशाना बनाया जा रहा है, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। इससे परिवारों के अलग होने और खेती तथा निर्माण जैसे उद्योगों में श्रमिकों की कमी पैदा होने का खतरा है।

3. टैरिफ के कारण महंगी होती चीजें और रोजगार

ट्रम्प ने आयात पर टैरिफ लगाने को अमेरिकी उद्योगों और स्थानीय रोजगार को मजबूत करने का तरीका बताया था। लेकिन दूसरी तरफ आलोचकों का दावा है कि इससे गाड़ियों, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ों और निर्माण सामग्री जैसी वस्तुओं की कीमतों में 12 से 18 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है।

टैरिफ के कारण अमेरिकी परिवारों का घरेलू बजट प्रभावित होने के साथ किसानों की मुश्किलें भी बढ़ी हैं। दूसरे देशों की तरफ से लगाए गए जवाबी शुल्क के चलते सोयाबीन और मक्का के कारोबार पर असर पड़ने की चिंता है।

4. गर्भपात का अधिकार और स्वास्थ्य बीमा

महिलाओं के गर्भपात के अधिकार को लेकर भी दोनों पार्टियों की राय अलग-अलग है। केएफएफ के सर्वे के अनुसार, 68 प्रतिशत महिला मतदाताओं और 18 से 29 वर्ष के 74 प्रतिशत युवाओं के लिए यह महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा है।

डेमोक्रेट्स चाहते हैं कि महिलाओं को देशभर में गर्भपात का कानूनी अधिकार मिले। इसके विपरीत रिपब्लिकन पार्टी का रुख है कि प्रत्येक राज्य को अपने स्तर पर इस संबंध में फैसला लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

इसके साथ ही स्वास्थ्य बीमा की बढ़ती लागत भी मतदाताओं की चिंता बनी हुई है। ओबामाकेयर के तहत करीब 2.13 करोड़ लोग स्वास्थ्य बीमा का लाभ उठा रहे हैं। सरकारी सहायता में संभावित कटौती से बीमा महंगा होने का मुद्दा भी चुनावी बहस में शामिल है।

सीनेट की पांच सीटों पर मुकाबला सबसे दिलचस्प

इस बार कई राज्यों में सीनेट की सीटों पर बेहद करीबी मुकाबले देखने को मिल रहे हैं। टेक्सास, ओहायो, नॉर्थ कैरोलाइना, मिशिगन और मेन ऐसी सीटें हैं, जहां चुनावी नतीजे दोनों पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

टेक्सास में रिपब्लिकन उम्मीदवार केन पैक्सटन और डेमोक्रेट जेम्स टैलारिको के बीच मुकाबला बराबरी का बताया जा रहा है। अक्टूबर में आए दो सर्वे में दोनों को 49-49 प्रतिशत समर्थन मिला। एक अन्य सर्वे में टैलारिको को 3.8 अंकों की बढ़त दिखाई गई।

ओहायो में रिपब्लिकन जॉन हस्टेड के सामने डेमोक्रेट शेरोड ब्राउन की चुनौती है। सर्वेक्षणों में ब्राउन को चार से छह अंकों की बढ़त मिलने की बात सामने आई है। यह सीट रिपब्लिकन पार्टी के लिए काफी अहम है।

नॉर्थ कैरोलाइना में डेमोक्रेट रॉय कूपर 52 प्रतिशत समर्थन के साथ रिपब्लिकन माइकल वाटले से आगे बताए जा रहे हैं। वाटले को 39 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है।

मिशिगन में डेमोक्रेट अब्दुल अल-सईद और रिपब्लिकन माइक रोजर्स के बीच कड़ी टक्कर है। सर्वे में अल-सईद को 50 प्रतिशत और रोजर्स को 48 प्रतिशत समर्थन मिला है।

मेन में डेमोक्रेट ट्रॉय जैक्सन को 49 प्रतिशत समर्थन के साथ रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स पर दो अंकों की बढ़त बताई गई है। कॉलिन्स को 47 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है।

भारतीय मूल के नेताओं पर भी टिकी नजर, रामास्वामी की प्रतिष्ठा दांव पर

अमेरिकी राजनीति में भारतीय मूल के नेताओं की भागीदारी भी इस बार चर्चा का विषय है। भारतीय मूल के सांसदों के समूह को लोकप्रिय रूप से ‘समोसा कॉकस’ कहा जाता है। इस चुनाव में इस समूह के छह नेता अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए मैदान में हैं।

मौजूदा सांसद अमी बेरा, रो खन्ना, प्रमिला जयपाल और सुहास सुब्रमण्यम फिर से चुनाव लड़ रहे हैं। इनके अलावा एरिजोना से अमीश शाह और फ्लोरिडा से पिया डांडिया भी प्रतिनिधि सभा के उम्मीदवार हैं। ये सभी डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े हैं।

दो सीटों पर भारतीय मूल के उम्मीदवारों के बीच सीधा मुकाबला भी देखने को मिलेगा। कैलिफोर्निया में रो खन्ना के सामने रिपब्लिकन उम्मीदवार रितेश टंडन हैं। वहीं, वॉशिंगटन में प्रमिला जयपाल को रिपब्लिकन नीरव शेठ चुनौती दे रहे हैं।

हालांकि, भारतीय मूल के कुछ नेता पहले ही चुनावी दौड़ से बाहर हो चुके हैं। राजा कृष्णमूर्ति सीनेट चुनाव की डेमोक्रेटिक प्राइमरी में हार गए, जबकि श्री थानेदार हाउस की प्राइमरी में जीत हासिल नहीं कर सके। अगर अमीश शाह और पिया डांडिया चुनाव जीतते हैं तो समोसा कॉकस में भारतीय मूल के छह सदस्यों की मौजूदगी बनी रह सकती है।

इसी बीच रिपब्लिकन नेता विवेक रामास्वामी भी ओहायो के गवर्नर पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एमी एक्टन से है। यदि रामास्वामी जीत हासिल करते हैं तो वे बॉबी जिंदल और निक्की हेली के बाद अमेरिका के तीसरे भारतीय मूल के गवर्नर बन सकते हैं।

इस मिडटर्म चुनाव का परिणाम ट्रम्प प्रशासन की राजनीतिक ताकत और आने वाले समय में अमेरिकी नीतियों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा। रिपब्लिकन पार्टी के लिए दोनों सदनों में बहुमत बनाए रखना बड़ी चुनौती है, जबकि डेमोक्रेट्स सत्ता के संतुलन को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। अब सभी की निगाहें मतदान के बाद आने वाले नतीजों पर टिकी हैं।