आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल चैटबॉट, रोबोट या ऑटोमेशन तक सीमित नहीं रह गया है। स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान में भी इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा एआई मॉडल विकसित किया है, जो किसी व्यक्ति के मस्तिष्क की वास्तविक जैविक उम्र (Brain Age) का अनुमान लगाने में मदद कर सकता है। यह तकनीक भविष्य में अल्जाइमर, डिमेंशिया और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की शुरुआती पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
नई रिसर्च में सामने आया है कि इंसान का पूरा मस्तिष्क एक समान गति से बूढ़ा नहीं होता। अब तक अधिकांश अध्ययन पूरे दिमाग को एक इकाई मानकर उसकी औसत उम्र का अनुमान लगाते थे, लेकिन इस नए एआई मॉडल ने दिखाया कि मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग गति से उम्र बढ़ाते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने एक विस्तृत “ब्रेन एज मैप” तैयार किया है, जो यह बताता है कि दिमाग का कौन-सा क्षेत्र अधिक तेजी से बदल रहा है और कौन-सा हिस्सा अपेक्षाकृत स्वस्थ बना हुआ है।
मस्तिष्क की उम्र जानना केवल बढ़ती उम्र का आकलन करना नहीं है, बल्कि इससे व्यक्ति की मानसिक क्षमता, याददाश्त, निर्णय लेने की शक्ति और भविष्य में होने वाली संभावित न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का भी संकेत मिल सकता है। यदि किसी व्यक्ति के मस्तिष्क का कोई विशेष हिस्सा उसकी वास्तविक उम्र की तुलना में अधिक तेजी से बूढ़ा हो रहा है, तो यह कई गंभीर बीमारियों का शुरुआती संकेत हो सकता है।
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डीप लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल किया। इसके लिए एक उन्नत न्यूरल नेटवर्क को प्रशिक्षित किया गया, जिसने हजारों एमआरआई स्कैन का विश्लेषण करके उम्र बढ़ने के अलग-अलग पैटर्न को समझा। यह मॉडल पारंपरिक तरीकों की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत जानकारी देने में सक्षम बताया गया है।
अध्ययन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें 19 वर्ष से लेकर 100 वर्ष तक की आयु के 14,748 संज्ञानात्मक रूप से सामान्य वयस्कों के एमआरआई स्कैन का विश्लेषण किया गया। यह डेटा छह बड़े सार्वजनिक डेटासेट से लिया गया था। इतने बड़े स्तर पर अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों के मस्तिष्क की संरचना का अध्ययन करने से वैज्ञानिकों को उम्र बढ़ने की प्राकृतिक प्रक्रिया को बेहतर तरीके से समझने का अवसर मिला।
रिसर्च के अनुसार, दिमाग के कुछ हिस्से जीवनभर अपेक्षाकृत लचीले बने रहते हैं और उनमें उम्र का प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई देता है। दूसरी ओर कुछ क्षेत्र ऐसे होते हैं जो उम्र बढ़ने, तनाव, बीमारियों या न्यूरोडीजेनेरेटिव विकारों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। एआई मॉडल इन सभी क्षेत्रों की अलग-अलग उम्र का अनुमान लगाकर विस्तृत मानचित्र तैयार करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक इस्तेमाल होने वाले अधिकांश मॉडल पूरे मस्तिष्क को एक औसत उम्र प्रदान कर देते थे। इससे यह समझना कठिन हो जाता था कि आखिर दिमाग का कौन-सा हिस्सा सामान्य रूप से काम कर रहा है और किस हिस्से में अपेक्षा से अधिक बदलाव हो चुके हैं। नई तकनीक इस कमी को दूर करने का प्रयास करती है क्योंकि यह क्षेत्रवार विश्लेषण उपलब्ध कराती है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि मस्तिष्क में दिखाई देने वाले संरचनात्मक बदलाव व्यक्ति की सोचने, समझने, सीखने और निर्णय लेने जैसी संज्ञानात्मक क्षमताओं से जुड़े होते हैं। अलग-अलग हिस्सों में उम्र बढ़ने का पैटर्न मानसिक कार्यों पर भी अलग-अलग प्रभाव डाल सकता है। यही वजह है कि भविष्य में यह तकनीक डॉक्टरों को किसी व्यक्ति की मानसिक कार्यक्षमता का अधिक सटीक मूल्यांकन करने में सहायता दे सकती है।
“ब्रेन एज” भविष्य का एक महत्वपूर्ण न्यूरोइमेजिंग बायोमार्कर बन सकता है। इसका अर्थ यह है कि डॉक्टर किसी व्यक्ति के एमआरआई स्कैन के आधार पर यह समझ पाएंगे कि उसका मस्तिष्क सामान्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया का पालन कर रहा है या उसमें असामान्य परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। यदि समय रहते ऐसे बदलावों का पता चल जाए तो कई बीमारियों की रोकथाम और उपचार की योजना पहले ही बनाई जा सकती है।
एआई आधारित यह मॉडल मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को पहचानने में सक्षम है। वैज्ञानिकों के अनुसार, उम्र बढ़ने के दौरान हर व्यक्ति में बदलाव का पैटर्न अलग हो सकता है। ऐसे में व्यक्तिगत स्तर पर विश्लेषण करना बेहद जरूरी हो जाता है। यही कारण है कि यह तकनीक भविष्य में व्यक्तिगत चिकित्सा यानी पर्सनलाइज्ड मेडिसिन के क्षेत्र में भी उपयोगी साबित हो सकती है।
इस तरह की तकनीक केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहेगी। कम उम्र के लोगों में भी यदि मस्तिष्क अपेक्षा से अधिक तेजी से उम्र बढ़ने के संकेत दिखाता है तो समय रहते जीवनशैली में बदलाव, नियमित निगरानी और आवश्यक चिकित्सकीय सलाह के जरिए जोखिम कम किया जा सकता है।
हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस तकनीक का उद्देश्य केवल उम्र बताना नहीं है। इसका मुख्य लक्ष्य मस्तिष्क की वास्तविक स्थिति का आकलन करना और उन क्षेत्रों की पहचान करना है जहां सामान्य से अधिक बदलाव हो रहे हैं। इससे भविष्य में न्यूरोलॉजिकल रोगों पर होने वाले शोध को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
नई रिसर्च यह संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्वास्थ्य सेवाओं में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि इस मॉडल को आगे के क्लिनिकल परीक्षणों में भी सफलता मिलती है, तो डॉक्टर एमआरआई स्कैन के जरिए किसी व्यक्ति के मस्तिष्क की जैविक उम्र का अधिक सटीक अनुमान लगा सकेंगे। इससे न केवल उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की समय रहते पहचान और उपचार में भी बड़ी मदद मिलने की संभावना है।
(Photo : AI Generated)




