नई दिल्ली में शनिवार यानी 12 सितंबर से 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की शुरुआत हो रही है। भारत की मेजबानी में आयोजित हो रहे इस सम्मेलन पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि बैठक के दौरान आर्थिक और रणनीतिक सहयोग से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा के साथ-साथ ठोस फैसले सामने आने की उम्मीद है। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, पूरे साल चली बैठकों और चर्चाओं के बाद BRICS के अलग-अलग क्षेत्रों में 50 से अधिक परिणाम सामने आए हैं। इनमें कई फ्रेमवर्क, कार्ययोजनाएं और सहयोग से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं।
भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान BRICS की गतिविधियों को चार व्यापक आधारों—लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता—के इर्द-गिर्द आगे बढ़ाया है। इन प्राथमिकताओं के तहत विभिन्न क्षेत्रों में सदस्य देशों के बीच संवाद और समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया गया। अब शिखर सम्मेलन के दौरान इन प्रयासों को राजनीतिक स्तर पर आगे बढ़ाने की कोशिश होगी।
आतंकवाद के खिलाफ BRICS का सख्त रुख
भारत के लिए सम्मेलन के प्रमुख संभावित परिणामों में आतंकवाद का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारतीय पक्ष चाहता है कि BRICS के साझा दस्तावेज में आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों की स्पष्ट और कड़ी निंदा की जाए। इसके साथ ही आतंकवाद से प्रभावी तरीके से मुकाबला करने की सामूहिक प्रतिबद्धता भी दोहराई जाए।
भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई की मांग करता रहा है। ऐसे में BRICS जैसे बड़े बहुपक्षीय समूह से इस मुद्दे पर मजबूत संदेश भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप माना जा रहा है।
भारतीय अधिकारियों के अनुसार, सम्मेलन के दौरान आतंकवाद से जुड़े मुद्दे को केवल सुरक्षा के नजरिए से नहीं बल्कि व्यापक वैश्विक सहयोग के संदर्भ में भी देखा जाएगा। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आतंकवाद के खिलाफ साझा समझ और सहयोग को मजबूत करना है।
UNSC में सुधार और भारत की दावेदारी
BRICS सम्मेलन में वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बनाने का मुद्दा भी अहम रहने वाला है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र समेत विभिन्न बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर लगातार जोर दिया है।
इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में सुधार और उसमें भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी के समर्थन को महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। भारत का तर्क रहा है कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में दुनिया की बदलती आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
BRICS के मंच से वैश्विक संस्थाओं में सुधार की बात सामने आना भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक संदेश हो सकता है। इसके साथ ही बहुपक्षवाद को मजबूत करने की प्रतिबद्धता भी सम्मेलन के प्रमुख परिणामों में शामिल होने की संभावना है।
50 से ज्यादा ठोस परिणामों पर नजर
भारत की BRICS अध्यक्षता के दौरान पूरे साल विभिन्न स्तरों पर व्यापक गतिविधियां हुईं। अधिकारियों के अनुसार, इस अवधि में करीब 400 बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों में सदस्य देशों के बीच विचार-विमर्श हुआ और कई प्रस्तावों को अंतिम रूप दिया गया।
इन चर्चाओं का नतीजा अब 50 से अधिक ठोस और व्यावहारिक परिणामों के रूप में सामने आने की उम्मीद है। इनमें नीतिगत फ्रेमवर्क, एक्शन प्लान और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं।
भारत की कोशिश रही है कि अध्यक्षता केवल बैठकों तक सीमित न रहे, बल्कि BRICS देशों के बीच वास्तविक सहयोग के लिए ऐसे परिणाम तैयार किए जाएं जिन्हें आने वाले समय में लागू किया जा सके। इसी वजह से अलग-अलग विषयों पर पूरे साल बैठकें आयोजित की गईं और सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने का प्रयास किया गया।
पश्चिम एशिया का संकट बना चुनौती
हालांकि इस सम्मेलन से पहले एक बड़ी चुनौती पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर सामने आई। पश्चिम एशिया में जारी घटनाक्रम पर BRICS के सदस्य देशों के बीच पूरी तरह एक जैसी राय नहीं रही। खास तौर पर संयुक्त अरब अमीरात और ईरान के बीच मतभेदों ने साझा बयान को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी थी।
इसी वजह से यह सवाल उठ रहा था कि क्या शिखर सम्मेलन का समापन सभी सदस्य देशों की सहमति वाले साझा घोषणापत्र के साथ हो पाएगा। इससे पहले विदेश मंत्रियों की बैठक भी पश्चिम एशिया के मुद्दे पर मतभेदों के चलते किसी संयुक्त बयान के बिना समाप्त हुई थी।
इसके बावजूद भारतीय सरकारी सूत्रों को सम्मेलन के अंतिम परिणाम को लेकर उम्मीद बनी हुई है। उनका मानना है कि पूरे साल भारत द्वारा की गई व्यापक कूटनीतिक और संगठनात्मक कोशिशों से सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनाने की क्षमता मजबूत हुई है।
400 बैठकों के जरिए सहमति बनाने की कोशिश
भारतीय अधिकारियों का कहना है कि BRICS की अध्यक्षता के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार बातचीत होती रही। साल भर में लगभग 400 बैठकें आयोजित करना इस प्रक्रिया का हिस्सा था। इन बैठकों में केवल राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं, बल्कि विभिन्न मंत्रालयों, एजेंसियों और विशेषज्ञ संस्थानों ने भी भाग लिया।
इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच मतभेदों को संभालते हुए उन मुद्दों पर सहमति तैयार करना रहा जिन पर सामूहिक रूप से आगे बढ़ा जा सकता है। भारत का मानना है कि यही निरंतर संवाद सम्मेलन को सकारात्मक परिणामों की दिशा में ले जाने में मदद करेगा।
एक भारतीय अधिकारी के अनुसार, अलग-अलग सेक्टर में लगातार काम करने और पूरे वर्ष संवाद बनाए रखने से भारत की अध्यक्षता ने सदस्य देशों को एक मंच पर लाने की क्षमता दिखाई है। अधिकारी का यह भी कहना है कि अध्यक्षता के दौरान तैयार किए गए परिणाम BRICS देशों के आम लोगों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकते हैं।
ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने पर जोर
भारत ने अपनी BRICS अध्यक्षता के दौरान ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता दी। विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की समस्याओं, आकांक्षाओं और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी को लेकर भारत ने अपना पक्ष मजबूती से रखा।
भारतीय पक्ष का मानना है कि दुनिया तेजी से बदल रही है और वैश्विक संस्थानों में भी इस बदलाव का प्रतिबिंब दिखाई देना चाहिए। ऐसे समय में ग्लोबल साउथ की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक प्रभावी तरीके से सामने लाना भारत की महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में रहा।
BRICS को इसी व्यापक उद्देश्य के लिए एक प्रभावी मंच के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की गई। भारत ने विभिन्न देशों के बीच संवाद बढ़ाने और अलग-अलग दृष्टिकोणों को एक साथ लाने पर जोर दिया।
मोदी की अध्यक्षता में शुरू होगा अहम सत्र
शिखर सम्मेलन की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में होने वाले एक महत्वपूर्ण सत्र से होगी। इस सत्र का मुख्य फोकस बहुपक्षवाद को मजबूत करने पर रहेगा। इसमें वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका और उन्हें अधिक प्रभावी बनाने के तरीकों पर चर्चा होने की उम्मीद है।
भारत का मानना है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में देशों के बीच सहयोग पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, तकनीक और क्षेत्रीय संकटों से जुड़े मुद्दों का समाधान केवल किसी एक देश के स्तर पर नहीं किया जा सकता। ऐसे में बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करना आवश्यक है।
भारत ने निभाई ‘ब्रिज बिल्डर’ की भूमिका
सरकार के अनुसार, BRICS की अध्यक्षता के दौरान भारत ने खुद को केवल मेजबान देश के रूप में सीमित नहीं रखा, बल्कि विभिन्न देशों और उनके अलग-अलग विचारों के बीच पुल बनाने की कोशिश की।
मंत्रियों और विभिन्न एजेंसियों के प्रमुखों की बैठकों से सामने आए सहमति वाले दस्तावेजों को भारत की इस भूमिका का उदाहरण बताया जा रहा है। इन बैठकों में अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करते हुए साझा आधार तलाशने का प्रयास किया गया।
भारत की रणनीति यह रही कि मतभेद वाले विषयों के बावजूद ऐसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाया जाए जिन पर सभी सदस्य देश आगे बढ़ सकते हैं। यही वजह है कि सम्मेलन के संभावित नतीजों को लेकर भारतीय पक्ष सकारात्मक दिखाई दे रहा है।
पहली बार इतने व्यापक स्तर पर देशभर में कार्यक्रम
भारत की BRICS अध्यक्षता को सरकार ने पूरे देश की सामूहिक भागीदारी वाला प्रयास बताया है। केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों, संस्थानों, उद्योग जगत, शिक्षण संस्थानों, युवाओं, नागरिक समाज और विभिन्न समुदायों को भी इस प्रक्रिया से जोड़ा गया।
अध्यक्षता के दौरान देश के 30 से अधिक शहरों में अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसका उद्देश्य BRICS को केवल राजधानी तक सीमित न रखकर देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाना था।
इस दौरान आर्थिक सहयोग, तकनीक, शिक्षा, युवा भागीदारी और अन्य क्षेत्रों से जुड़े कार्यक्रमों के जरिए व्यापक स्तर पर संवाद स्थापित किया गया। सरकार का मानना है कि इससे BRICS की अध्यक्षता को एक व्यापक राष्ट्रीय पहल का स्वरूप मिला।
अब शिखर सम्मेलन के अंतिम फैसलों पर नजर
कुल मिलाकर भारत की अध्यक्षता में आयोजित BRICS Summit 2026 कई अहम मुद्दों को एक साथ सामने ला रहा है। आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख, वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार, UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए समर्थन और बहुपक्षवाद को मजबूत करना भारत की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
इसके अलावा साल भर हुई बैठकों से तैयार 50 से ज्यादा परिणामों को भी सम्मेलन के दौरान महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में पेश किया जा सकता है। हालांकि पश्चिम एशिया के मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच मतभेद अभी भी चुनौती बने हुए हैं, लेकिन भारतीय अधिकारियों को उम्मीद है कि बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए सकारात्मक नतीजा हासिल किया जा सकेगा।
भारत की अध्यक्षता का अंतिम मूल्यांकन इस बात से होगा कि शिखर सम्मेलन में कितने मुद्दों पर साझा सहमति बनती है और साल भर तैयार किए गए प्रस्ताव किस तरह आगे बढ़ाए जाते हैं। ऐसे में 12 और 13 सितंबर को होने वाली बैठकों के फैसले न केवल BRICS के भविष्य की दिशा तय करेंगे, बल्कि वैश्विक दक्षिण और बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में भारत की भूमिका का भी संकेत देंगे।




