आज से जैन धर्म का पवित्र अष्टान्हिका महापर्व आरंभ होने जा रहा है। आठ दिनों तक चलने वाले इस विशेष धार्मिक आयोजन के दौरान देशभर के जैन श्रद्धालु उपवास, पूजा, संयम और आत्मचिंतन के माध्यम से आध्यात्मिक साधना करेंगे। इस अवसर पर मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित पिसनहारी मढ़िया जैन तीर्थ में विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जहां निर्मित नंदीश्वर द्वीप श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र रहेगा। पर्व के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेंगे।
जैन धर्म में अष्टान्हिका पर्व को अत्यंत प्राचीन और शाश्वत पर्व माना जाता है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि आत्मशुद्धि, तप, संयम और तीर्थ आराधना का विशेष अवसर भी है। परंपरा के अनुसार यह पर्व वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन माह में आने वाले इस आठ दिवसीय आयोजन के दौरान जैन समाज के लोग विशेष पूजा-पाठ, विधान और उपवास करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इन दिनों किए गए आध्यात्मिक कार्यों का विशेष पुण्यफल प्राप्त होता है।
इस वर्ष भी 21 जुलाई से प्रारंभ होने वाले अष्टान्हिका महापर्व की तैयारियां जबलपुर के प्रसिद्ध पिसनहारी मढ़िया जैन तीर्थ में पूरी कर ली गई हैं। यहां प्रतिदिन सुबह से लेकर देर शाम तक धार्मिक गतिविधियां संचालित होंगी। श्रद्धालु सिद्धचक्र विधान, विशेष पूजन, महाआरती, अभिषेक, प्रवचन तथा अन्य आध्यात्मिक आयोजनों में शामिल होकर धर्म लाभ अर्जित करेंगे। आयोजन के दौरान दूर-दराज के राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
पिसनहारी मढ़िया जैन तीर्थ की सबसे बड़ी विशेषता यहां निर्मित भव्य नंदीश्वर द्वीप है, जिसे जैन समाज में अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह स्थल अपनी अनूठी वास्तुकला, विशाल निर्माण और धार्मिक महत्व के कारण देशभर में अलग पहचान रखता है। पर्वतों से घिरे इस तीर्थ परिसर में स्थित नंदीश्वर द्वीप श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव कराता है। यहां आने वाले श्रद्धालु इसे दिव्य आराधना स्थल के रूप में देखते हैं और विशेष श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं।
जैन समाज के अनुसार यह नंदीश्वर द्वीप अपनी निर्माण शैली के कारण भी विशेष महत्व रखता है। बताया जाता है कि इतने विशाल आकार का यह निर्माण बिना किसी केंद्रीय आधार स्तंभ के तैयार किया गया है, जो इसे स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण बनाता है। इसकी विशालता और कलात्मक स्वरूप देखने के लिए केवल श्रद्धालु ही नहीं बल्कि वास्तुकला में रुचि रखने वाले लोग भी यहां पहुंचते हैं।
पिसनहारी मढ़िया ट्रस्ट के पदाधिकारियों के अनुसार इस भव्य निर्माण का विचार कई दशक पहले सामने आया था। समाज के अनेक धर्मप्रेमी लोगों के सहयोग से वर्ष 1982 में नंदीश्वर द्वीप निर्माण का संकल्प लिया गया। इसके बाद वर्षों तक योजनाबद्ध तरीके से निर्माण कार्य चलता रहा। वर्ष 1992 में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के सान्निध्य में यहां पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसके बाद यह स्थान जैन धर्म की साधना और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बन गया। तब से यहां निरंतर धार्मिक गतिविधियां आयोजित होती रही हैं।
नंदीश्वर द्वीप का विशाल गुंबद यहां आने वाले लोगों का सबसे पहले ध्यान आकर्षित करता है। ग्रेनाइट और सफेद संगमरमर से निर्मित इस डोम का क्षेत्रफल लगभग 12 हजार वर्ग फीट बताया जाता है। भूमि तल से शिखर के कलश तक इसकी ऊंचाई लगभग 121 फीट है, जबकि मंदिर की सतह से गुंबद की ऊंचाई करीब 65 फीट मानी जाती है। इस पूरे निर्माण में आधुनिक इंजीनियरिंग और पारंपरिक शिल्पकला का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
मंदिर परिसर को चारों दिशाओं से भव्य तोरण द्वारों से सजाया गया है। इसके अलावा परिसर के बाहरी हिस्से में ग्रेनाइट के मजबूत और आकर्षक स्तंभ इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं। चारों ओर बनी सुंदर मंदरियां, नक्काशीदार संरचनाएं और शांत वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करते हैं। यहां का स्थापत्य देश के प्रमुख जैन धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान रखता है।
जैन धर्मग्रंथों में वर्णित नंदीश्वर द्वीप की कल्पना को इस परिसर में मूर्त रूप देने का प्रयास किया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह एक दिव्य स्थल है, जहां देवगण आराधना करते हैं। इसी अवधारणा के अनुरूप यहां संगमरमर की भव्य वेदियों पर विभिन्न पर्वतों और जिनालयों का निर्माण किया गया है। पूरे परिसर की रचना इस प्रकार की गई है कि श्रद्धालुओं को धार्मिक ग्रंथों में वर्णित स्वरूप का अनुभव हो सके।
इस परिसर में पांच प्रमुख मेरू पर्वत भी बनाए गए हैं। इनमें सुमेरु, विजय मेरू, मंदर मेरू, अचल मेरू और विद्युतमाली मेरू शामिल हैं। प्रत्येक मेरू पर 16-16 जिन प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। पूरे परिसर में कुल 132 जिनबिंब विराजमान हैं, जिनकी श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। इन प्रतिमाओं की स्थापना जैन धार्मिक परंपराओं के अनुरूप की गई है और पर्व के दौरान इनका विशेष अभिषेक एवं पूजन होगा।
धार्मिक जानकारों के अनुसार अष्टान्हिका पर्व का महत्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है। यह आत्मसंयम, तपस्या, त्याग और आध्यात्मिक उन्नति का भी पर्व माना जाता है। इन आठ दिनों में अनेक श्रद्धालु उपवास रखते हैं, कुछ लोग एक समय भोजन करते हैं, जबकि कई श्रद्धालु पूर्ण उपवास एवं विशेष धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। संयम और आत्मशुद्धि के माध्यम से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संदेश भी इस पर्व के माध्यम से दिया जाता है।
मढ़ियाजी से जुड़ी ब्रह्मचारिणी बबली दीदी के अनुसार जैन मान्यताओं में वर्णन मिलता है कि अष्टान्हिका पर्व के दौरान स्वर्ग के देव भी नंदीश्वर द्वीप में जाकर विशेष पूजा और विधान करते हैं। चूंकि सामान्य मनुष्य उस दिव्य स्थल तक नहीं पहुंच सकते, इसलिए पृथ्वी पर निर्मित इस नंदीश्वर द्वीप में श्रद्धालु उसी भावना और श्रद्धा के साथ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं। यही कारण है कि इस पर्व के दौरान यहां का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
पर्व के दौरान प्रतिदिन सुबह मंगल आरती, अभिषेक, पूजन और विभिन्न धार्मिक विधानों का आयोजन किया जाएगा। शाम के समय महाआरती, संगीतमय भक्ति कार्यक्रम तथा संतों के प्रवचन आयोजित होंगे। श्रद्धालु बड़ी संख्या में इन आयोजनों में भाग लेकर धर्म श्रवण करेंगे और आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव करेंगे। पूरे आठ दिनों तक मढ़ियाजी क्षेत्र धार्मिक भक्ति और साधना के रंग में रंगा रहेगा।
अष्टान्हिका महापर्व जैन समाज के लिए केवल परंपरा निभाने का अवसर नहीं बल्कि आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक प्रगति का माध्यम भी माना जाता है। यही वजह है कि देशभर से श्रद्धालु जबलपुर स्थित पिसनहारी मढ़िया पहुंचकर नंदीश्वर द्वीप में आराधना करते हैं। इस बार भी 21 जुलाई से शुरू होने वाले आठ दिवसीय आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है, जिससे यह तीर्थ एक बार फिर भक्ति, तप, संयम और धार्मिक उत्साह का केंद्र बनेगा।




