किशोरों में बढ़ रही मानसिक परेशानी, कहीं आपका बच्चा भी इन लक्षणों से तो नहीं जूझ रहा?

किशोरों में बढ़ रही मानसिक परेशानी, कहीं आपका बच्चा भी इन लक्षणों से तो नहीं जूझ रहा?

किशोरावस्था जीवन का वह दौर है, जब बच्चों के शरीर के साथ-साथ उनकी सोच, भावनाओं और व्यवहार में भी कई तरह के बदलाव आते हैं। इस उम्र में पढ़ाई, परीक्षा, दोस्तों के बीच अपनी पहचान बनाने, परिवार की उम्मीदों पर खरा उतरने और भविष्य को लेकर कई तरह की चिंताएं पैदा हो सकती हैं। आमतौर पर इन बदलावों को उम्र का सामान्य हिस्सा समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन कई बार यही परेशानियां धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने लगती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में हर सात में से एक किशोर किसी न किसी मानसिक विकार से प्रभावित है। इनमें एंग्जायटी यानी चिंता से जुड़ी समस्याएं भी शामिल हैं। ऐसे में माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए यह समझना जरूरी है कि बच्चे की सामान्य चिंता और लगातार बनी रहने वाली एंग्जायटी के बीच अंतर कैसे किया जाए।

आज के समय में किशोरों की जिंदगी पहले के मुकाबले काफी बदल गई है। पढ़ाई का बढ़ता दबाव, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, सोशल मीडिया पर दूसरों से अपनी तुलना करना और हर समय बेहतर प्रदर्शन करने की अपेक्षा उनके मानसिक तनाव को बढ़ा सकती है। कई बच्चे अपनी परेशानियों को खुलकर जाहिर नहीं कर पाते। उन्हें डर रहता है कि परिवार उनकी बात को गंभीरता से नहीं लेगा या दोस्त उनका मजाक उड़ाएंगे। कुछ किशोर अपनी भावनाओं को समझने में भी कठिनाई महसूस करते हैं। यही वजह है कि उनके व्यवहार में बदलाव आने के बावजूद परिवार को समस्या का सही अंदाजा नहीं लग पाता। समय रहते इन संकेतों को पहचानना और बच्चे को सहयोग देना उसकी मानसिक सेहत के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

क्या है एंग्जायटी और कब बनती है चिंता की वजह?

एंग्जायटी को सामान्य भाषा में बेचैनी, घबराहट या किसी अनहोनी की आशंका से जुड़ी भावना कहा जा सकता है। किसी परीक्षा से पहले घबराना, नए स्कूल में जाने को लेकर चिंता करना या किसी महत्वपूर्ण प्रतियोगिता से पहले तनाव महसूस करना स्वाभाविक है। ऐसी परिस्थितियों में चिंता कुछ समय बाद कम हो सकती है। हालांकि, जब डर और बेचैनी लगातार बने रहें, छोटी-छोटी बातों पर जरूरत से ज्यादा चिंता होने लगे या बच्चा अपनी रोजमर्रा की गतिविधियां ठीक से न कर पाए, तो इस पर ध्यान देना जरूरी है।

एंग्जायटी की समस्या में किशोर को कई बार बिना किसी स्पष्ट कारण के भी घबराहट हो सकती है। वह भविष्य में होने वाली घटनाओं को लेकर बार-बार नकारात्मक संभावनाएं सोच सकता है। उसे लग सकता है कि परीक्षा में खराब प्रदर्शन होगा, दोस्त उससे दूर हो जाएंगे या परिवार के लोग उससे नाराज हो जाएंगे। ऐसी आशंकाओं के कारण पढ़ाई, नींद, सामाजिक संबंध और आत्मविश्वास प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, केवल चिंता महसूस करने या कुछ लक्षण दिखाई देने से किसी बच्चे को एंग्जायटी डिसऑर्डर से ग्रस्त नहीं माना जा सकता। इसकी सही पहचान के लिए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ का आकलन जरूरी होता है।

शरीर में दिखाई देने वाले बदलावों को न करें नजरअंदाज

एंग्जायटी का असर केवल विचारों और भावनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शरीर भी तनाव के प्रति प्रतिक्रिया देता है। कई बार किशोर अपनी परेशानी शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, लेकिन उनके शरीर में दिखाई देने वाले बदलाव इस ओर संकेत कर सकते हैं कि वे मानसिक दबाव से गुजर रहे हैं।

ऐसी स्थिति में दिल की धड़कन सामान्य से तेज हो सकती है। कुछ बच्चों को हाथों या पैरों में कंपन, अत्यधिक पसीना, सिरदर्द, चक्कर आने या सीने में जकड़न जैसी परेशानियां महसूस हो सकती हैं। कभी-कभी उन्हें ऐसा लगता है कि सांस लेने में कठिनाई हो रही है या गले में कुछ अटक रहा है। कुछ किशोरों की भूख कम हो जाती है, जबकि कुछ तनाव के दौरान ज्यादा खाने लगते हैं। पेट में दर्द, मतली, उल्टी जैसा महसूस होना, दस्त और कब्ज जैसी समस्याएं भी तनाव के साथ दिखाई दे सकती हैं।

इन लक्षणों के पीछे हमेशा एंग्जायटी ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। शारीरिक समस्याओं के दूसरे कारण भी हो सकते हैं। इसलिए यदि बच्चे को बार-बार ऐसी परेशानियां हो रही हैं, तो उन्हें केवल तनाव मानकर छोड़ने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। खासकर सीने में तेज दर्द, गंभीर सांस की परेशानी या बेहोशी जैसे लक्षणों को तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत हो सकती है।

जरूरत से ज्यादा सोचना और लगातार डर में रहना भी हो सकता है संकेत

किशोरों की मानसिक स्थिति में आने वाले बदलावों को समझना भी उतना ही जरूरी है। एंग्जायटी से परेशान बच्चा किसी एक बात के बारे में लंबे समय तक सोचता रह सकता है। उसे छोटी गलती के गंभीर परिणाम होने का डर सताता रहता है। वह बार-बार यह सोच सकता है कि दूसरे लोग उसके बारे में क्या राय बनाएंगे या भविष्य में उसके साथ कुछ गलत तो नहीं होगा।

कुछ बच्चों को पढ़ाई के दौरान ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होती है। वे किताब खोलकर बैठते हैं, लेकिन उनका ध्यान बार-बार चिंताओं की ओर चला जाता है। कभी उन्हें बिना किसी स्पष्ट वजह के डर लगने लगता है, तो कभी वे अचानक रोने लगते हैं या छोटी-छोटी बातों पर परेशान हो जाते हैं। रात में दिमाग शांत न होने के कारण नींद आने में भी कठिनाई हो सकती है। पर्याप्त नींद न मिलने से अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी बढ़ सकती है।

कुछ किशोर पुराने अप्रिय अनुभवों को बार-बार याद करते हैं या भविष्य की घटनाओं को लेकर लगातार आशंकित रहते हैं। यदि बच्चा अक्सर तनाव में दिखाई दे, अपनी भावनाओं को संभालने में कठिनाई महसूस करे या पहले पसंद आने वाली गतिविधियों में रुचि खोने लगे, तो उससे शांतिपूर्वक बातचीत करना जरूरी है। ऐसे बदलावों को केवल जिद, आलस या उम्र का असर समझना सही नहीं होगा।

व्यवहार में बदलाव से भी मिल सकते हैं अहम संकेत

कई बार एंग्जायटी के लक्षण बच्चे के व्यवहार में दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए, जो किशोर पहले दोस्तों के साथ समय बिताना पसंद करता था, वह धीरे-धीरे उनसे दूरी बनाने लग सकता है। वह पारिवारिक कार्यक्रमों में शामिल होने से बच सकता है या उन जगहों पर जाने से डर सकता है, जहां उसे असहज महसूस होता है। कुछ बच्चों को कक्षा में सवाल पूछने, लोगों के सामने बोलने या नए लोगों से मिलने में बहुत अधिक घबराहट होती है।

इसके अलावा, बच्चा नई गतिविधियों को आजमाने से बच सकता है। उसे गलती करने, असफल होने या दूसरों के सामने शर्मिंदा होने का डर हो सकता है। कुछ किशोर किसी काम को बार-बार जांचते हैं, बार-बार आश्वासन मांगते हैं या एक ही व्यवहार को दोहराते हैं। हालांकि, इन सभी आदतों का कारण एंग्जायटी होना जरूरी नहीं है। इनका अर्थ समझने के लिए बच्चे की उम्र, परिस्थितियों और व्यवहार में आए बदलावों पर ध्यान देना चाहिए।

माता-पिता को यह भी देखना चाहिए कि क्या बच्चा स्कूल जाने से बार-बार बच रहा है, उसके अंक अचानक गिर रहे हैं या वह सामान्य गतिविधियों में पहले की तरह हिस्सा नहीं ले रहा है। यदि ये बदलाव लंबे समय तक बने रहें और बच्चे के दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगें, तो विशेषज्ञ से परामर्श लेना उपयोगी होगा।

सोशल मीडिया और पढ़ाई का दबाव कैसे बढ़ा सकते हैं परेशानी?

किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर उनके आसपास का माहौल भी प्रभाव डाल सकता है। स्कूल में अच्छे अंक लाने की अपेक्षा, प्रतियोगिता में आगे निकलने का दबाव और भविष्य में करियर बनाने की चिंता कई बच्चों को तनाव में डाल सकती है। जब बच्चे को लगता है कि उससे हर समय अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद की जा रही है, तो असफलता का डर और बढ़ सकता है।

सोशल मीडिया भी इस स्थिति को प्रभावित कर सकता है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दूसरे लोगों की उपलब्धियां, तस्वीरें और जीवनशैली देखकर किशोर अपनी तुलना उनसे करने लगते हैं। उन्हें लग सकता है कि वे दूसरों से कम आकर्षक, कम लोकप्रिय या कम सफल हैं। लगातार ऑनलाइन रहने, नकारात्मक टिप्पणियां मिलने या साइबर बुलिंग का सामना करने से भी मानसिक दबाव बढ़ सकता है।

ऐसे में बच्चों के लिए संतुलित दिनचर्या बनाना जरूरी है। पढ़ाई के साथ आराम, खेलकूद, पर्याप्त नींद और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर भी मिलना चाहिए। माता-पिता को केवल अंकों और उपलब्धियों पर ध्यान देने के बजाय बच्चे की भावनात्मक स्थिति और प्रयासों को भी महत्व देना चाहिए।

एंग्जायटी से निपटने में बच्चों की कैसे मदद करें?

बच्चे की चिंता को कम करने की शुरुआत उससे खुलकर बातचीत करने से की जा सकती है। उसे ऐसा माहौल दें, जहां वह बिना डर के अपनी बात कह सके। जब बच्चा अपनी परेशानी साझा करे, तो तुरंत डांटने, तुलना करने या समस्या को छोटा बताने से बचें। उसकी बात ध्यान से सुनें और उसे यह महसूस कराएँ कि जरूरत पड़ने पर परिवार उसके साथ खड़ा है।

शारीरिक गतिविधियां भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकती हैं। टहलना, दौड़ना, साइकिल चलाना, तैरना या अपनी पसंद का कोई खेल खेलना तनाव कम करने और मन को बेहतर महसूस कराने में मदद कर सकता है। बच्चों को उनकी उम्र और क्षमता के अनुसार नियमित गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें। इसके साथ ही, धीमी और गहरी सांस लेने का अभ्यास तथा मेडिटेशन कुछ किशोरों को बेचैनी संभालने में मदद कर सकते हैं।

पर्याप्त नींद और संतुलित खानपान भी महत्वपूर्ण हैं। सोने और जागने का समय नियमित रखने, रात में सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल कम करने और चाय-कॉफी जैसे कैफीन वाले पेय सीमित रखने से नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। बच्चों को एक साथ बहुत सारे काम करने के लिए मजबूर करने के बजाय बड़े कामों को छोटे हिस्सों में बांटने और बीच-बीच में आराम करने की आदत सिखाएं।

किशोरों को यह समझाना भी जरूरी है कि हर काम में सर्वश्रेष्ठ होना आवश्यक नहीं है। गलती करना और असफलता का सामना करना सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। उनकी तुलना दूसरे बच्चों से करने के बजाय उनके व्यक्तिगत प्रयासों और प्रगति की सराहना करें। इससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

कब लेनी चाहिए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद?

यदि बच्चे की चिंता लगातार बनी हुई है, उसकी पढ़ाई या नींद प्रभावित हो रही है, वह दोस्तों और परिवार से कटने लगा है या सामान्य गतिविधियों में हिस्सा लेना बंद कर रहा है, तो मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या प्रशिक्षित काउंसलर से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। विशेषज्ञ बच्चे की परिस्थितियों और लक्षणों को समझकर उचित सहायता का सुझाव दे सकते हैं। जरूरत के अनुसार काउंसलिंग, मनोचिकित्सा या अन्य उपचार विकल्प अपनाए जा सकते हैं।

बच्चे को यह कहकर चुप कराने से बचें कि उसे बिना वजह से डर लगता है या उसे बस मजबूत बनने की जरूरत है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं कमजोरी का संकेत नहीं हैं और समय पर सहायता मिलने से उन्हें बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। यदि बच्चा खुद को नुकसान पहुंचाने या जीवन समाप्त करने की बात करता है, तो इसे गंभीरता से लें, उसे अकेला न छोड़ें और तुरंत स्थानीय आपातकालीन सेवा या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लें।

किशोरावस्था में बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत समझ, भरोसे और सहयोग की होती है। उनके व्यवहार में अचानक बदलाव, लगातार बेचैनी या भावनात्मक परेशानी दिखाई देने पर समय रहते ध्यान देना जरूरी है। सही बातचीत, स्वस्थ दिनचर्या और जरूरत पड़ने पर पेशेवर सहायता के जरिए बच्चों को अपनी भावनाओं को समझने और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने में मदद मिल सकती है।

(Photo: AI Generated)