पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में राजनीतिक अस्थिरता और जनआक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ दिनों से चल रहे विरोध प्रदर्शनों ने अब गंभीर रूप ले लिया है। विभिन्न स्थानीय स्रोतों के अनुसार, आंदोलन के दौरान अब तक 46 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 1100 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कई शहरों में सामान्य जनजीवन लगभग ठहर गया है।
इस पूरे विवाद की जड़ विधानसभा की उन 12 आरक्षित सीटों को माना जा रहा है, जिन्हें जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान के अन्य इलाकों में जाकर बसे शरणार्थियों के लिए सुरक्षित रखा गया है। स्थानीय संगठनों और आंदोलनकारियों का कहना है कि इन सीटों का वर्तमान राजनीतिक ढांचे में कोई औचित्य नहीं बचा है और इन्हें समाप्त किया जाना चाहिए। इसी मांग को लेकर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर आंदोलन जारी है।
आंदोलन का असर सबसे अधिक मुजफ्फराबाद, मीरपुर और आसपास के इलाकों में देखने को मिल रहा है। कई बाजार लगातार बंद हैं, स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई प्रभावित हुई है और सरकारी कार्यालयों का कामकाज भी सामान्य नहीं रह गया है। इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगाए जाने के कारण स्थानीय लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क भी काफी हद तक टूट गया है।
सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। प्रशासन ने आंदोलन के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। कई नेताओं पर देशद्रोह और राज्य विरोधी गतिविधियों के आरोप लगाए गए हैं। इनमें JAAC से जुड़े कुछ प्रमुख नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि सरकार विरोध की आवाज को दबाने के लिए कानूनी और प्रशासनिक दबाव का इस्तेमाल कर रही है।
वहीं दूसरी ओर, सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पाकिस्तानी प्रशासन ने अतिरिक्त अर्धसैनिक बलों की तैनाती के आदेश जारी किए हैं। पुंछ, मीरपुर और मुजफ्फराबाद जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में रेंजर्स और फ्रंटियर कॉन्स्टेबुलरी के जवानों की संख्या बढ़ा दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाया गया है, जबकि प्रदर्शनकारी इसे आंदोलन को कुचलने की रणनीति बता रहे हैं।
तनाव तब और बढ़ गया जब सरकार ने 5 जून को जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर आतंकवाद निरोधक कानूनों के तहत प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। प्रतिबंध के बाद संगठन से जुड़े कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया और उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई। इसके विरोध में विभिन्न इलाकों में प्रदर्शन और तेज हो गए।
रावलकोट में हाल ही में एक बड़ी सभा भी आयोजित की गई, जिसमें JAAC के वरिष्ठ नेता उमर नजीर कश्मीरी ने प्रशासन और सेना की नीतियों की आलोचना की। बताया जाता है कि वे पिछले कुछ समय से सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए थे, लेकिन आंदोलन के बीच उन्होंने लोगों को संबोधित किया। अपने भाषण में उन्होंने क्षेत्र से अतिरिक्त सुरक्षा बलों को हटाने की मांग की और आंदोलन को जारी रखने का आह्वान किया।
दिलचस्प बात यह रही कि इंटरनेट सेवाएं बाधित होने के बावजूद उनका भाषण लाइव प्रसारित होता दिखाई दिया। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई कि प्रसारण के लिए सैटेलाइट इंटरनेट सेवा का उपयोग किया गया होगा। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन इस घटना ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
लगातार बंद और प्रतिबंधों का असर अब आम नागरिकों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कई क्षेत्रों में दवाइयों की उपलब्धता प्रभावित हुई है और खाद्य सामग्री की सप्लाई भी बाधित बताई जा रही है। व्यापारिक गतिविधियां ठप पड़ने से छोटे कारोबारियों और दैनिक मजदूरी करने वाले लोगों को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि राजनीतिक टकराव का सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ रहा है।
PoK के हालात को लेकर विदेशों में भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। लंदन और न्यूयॉर्क जैसे शहरों में रहने वाले कश्मीरी और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन आयोजित किए। इन कार्यक्रमों में पाकिस्तान सरकार से बल प्रयोग रोकने और राजनीतिक समाधान तलाशने की मांग उठाई गई। प्रदर्शनकारियों ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मामले का संज्ञान लेने की अपील भी की।
इस बीच भारत के जम्मू-कश्मीर में भी PoK की घटनाओं को लेकर प्रतिक्रिया सामने आई है। श्रीनगर समेत कई स्थानों पर लोगों ने प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तान सरकार और सेना की आलोचना की। शहर के प्रमुख इलाकों में विरोध मार्च निकाले गए और प्रदर्शनकारियों ने कथित दमनकारी कार्रवाइयों के खिलाफ नारे लगाए।
लाल चौक सहित कई स्थानों पर लोगों ने मृतकों के लिए न्याय की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि राजनीतिक मतभेदों का समाधान बल प्रयोग से नहीं बल्कि संवाद के जरिए निकाला जाना चाहिए। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी PoK में हुई मौतों और गिरफ्तारियों पर चिंता व्यक्त करते हुए स्वतंत्र जांच की मांग उठाई।
कुछ सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन हो रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस विषय पर सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र से भी हस्तक्षेप की मांग की गई। श्रीनगर के सोनवार क्षेत्र स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के बाहर एक समूह ने प्रदर्शन कर ज्ञापन सौंपा, जिसमें घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की गई।
राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई नेताओं ने कहा कि यदि स्थिति पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया तो आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ सकते हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं से तथ्य जुटाने के लिए स्वतंत्र टीम भेजने का आग्रह किया।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब PoK में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 27 जुलाई को चुनाव प्रस्तावित हैं। चुनावी माहौल के बीच बढ़ता असंतोष प्रशासन के लिए नई चुनौती बन गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आरक्षित सीटों का मुद्दा चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।
PoK विधानसभा की संरचना पर नजर डालें तो कुल 53 सीटें मौजूद हैं। इनमें 45 सीटों पर सीधे जनता मतदान करती है, जबकि अन्य सीटें महिलाओं, धार्मिक विद्वानों और तकनीकी विशेषज्ञों सहित विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षित हैं। इन्हीं व्यवस्थाओं को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है, लेकिन इस बार मामला बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुका है।
फिलहाल पूरे क्षेत्र में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है। प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने में जुटा है, जबकि आंदोलनकारी अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। लगातार बढ़ती गिरफ्तारियां, मौतों के दावे, इंटरनेट प्रतिबंध और राजनीतिक टकराव ने PoK को एक गंभीर संकट के दौर में पहुंचा दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच कोई संवाद स्थापित होता है या फिर यह टकराव और अधिक गहरा हो जाता है।



