चंडीगढ़ में भवन नियमों के उल्लंघन और छोटे स्तर के अतिक्रमणों पर लगाए जा रहे भारी-भरकम आर्थिक दंड को लेकर रिहायशी क्षेत्रों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। शहर की विभिन्न हाउसिंग सोसायटियों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (आरडब्ल्यूए) ने प्रशासन से अपील की है कि छोटे और तकनीकी प्रकृति के उल्लंघनों पर लगाई जा रही पेनाल्टी को लेकर पुनर्विचार किया जाए तथा ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जो नियमों के पालन के साथ-साथ आम नागरिकों की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखे।
इसी मुद्दे को लेकर वॉयस ऑफ हाउसिंग सोसाइटी और सेक्टर-48 आरडब्ल्यूए ने संयुक्त रूप से प्रशासन के समक्ष अपनी चिंताएं रखी हैं। संगठनों का कहना है कि वे शहर की सुंदरता, स्वच्छता और सुव्यवस्थित विकास के पक्षधर हैं और प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने तथा भवन नियमों को लागू करने की मुहिम का समर्थन करते हैं। हालांकि उनका मानना है कि छोटे-मोटे निर्माण संबंधी बदलावों और मामूली तकनीकी त्रुटियों के लिए अत्यधिक जुर्माना वसूलना न्यायसंगत नहीं है।
बढ़े हुए जुर्मानों से परिवारों पर पड़ रहा आर्थिक दबाव
रेजिडेंट संगठनों के प्रतिनिधियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में भवन नियमों के उल्लंघन पर लगने वाली पेनाल्टी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कई मामलों में यह राशि हजारों रुपये से बढ़कर लाखों रुपये तक पहुंच गई है। इससे मध्यम वर्गीय और वरिष्ठ नागरिक परिवार विशेष रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
उनका कहना है कि अधिकांश लोग जानबूझकर नियमों का उल्लंघन नहीं करते। कई बार घरों में परिवार का आकार बढ़ने, बुजुर्गों की जरूरतों, बच्चों के लिए अतिरिक्त स्थान बनाने या अन्य व्यावहारिक कारणों से छोटे स्तर के निर्माण बदलाव किए जाते हैं। ऐसे मामलों में यदि भारी आर्थिक दंड लगाया जाता है तो यह परिवारों के लिए अतिरिक्त बोझ बन जाता है।
संगठनों ने यह भी तर्क दिया कि कई भवनों में मौजूद कुछ निर्माण दशकों पुराने हैं और उस समय लागू नियम वर्तमान नियमों से अलग थे। ऐसे मामलों में आज की नीतियों के आधार पर भारी पेनाल्टी लगाना लोगों को अनुचित प्रतीत होता है।
छोटे और बड़े उल्लंघनों में हो स्पष्ट अंतर
हाउसिंग सोसायटियों की प्रमुख मांगों में से एक यह है कि प्रशासन भवन नियमों के उल्लंघनों को उनकी गंभीरता के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित करे। संगठनों का कहना है कि बड़े पैमाने पर किए गए अवैध निर्माण, व्यावसायिक उपयोग के लिए किए गए अतिक्रमण और सार्वजनिक भूमि पर कब्जा करने जैसे मामलों को गंभीर श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर, बालकनी में मामूली बदलाव, घर के भीतर छोटे निर्माण संशोधन, पुरानी संरचनाओं में तकनीकी विसंगतियां या प्रशासनिक मंजूरी मिलने में देरी के कारण उत्पन्न हुए मामलों को अलग श्रेणी में रखा जाए। इन मामलों में दंडात्मक कार्रवाई के बजाय सुधारात्मक और व्यावहारिक समाधान खोजे जाने चाहिए।
प्रतिनिधियों का कहना है कि एक समान नीति के तहत सभी प्रकार के मामलों पर एक जैसी सख्ती अपनाने से लोगों में असंतोष पैदा होता है और प्रशासन तथा नागरिकों के बीच दूरी बढ़ती है।
नियमितीकरण और एमनेस्टी योजना की मांग
संगठनों ने प्रशासन के समक्ष एक विशेष नियमितीकरण नीति लागू करने का सुझाव भी रखा है। उनका कहना है कि पुराने और छोटे स्तर के उल्लंघनों के लिए सीमित अवधि की एमनेस्टी योजना लाई जा सकती है, जिसके तहत नागरिक निर्धारित प्रक्रिया का पालन कर अपने निर्माण को नियमित करा सकें।
ऐसी योजना से प्रशासन को राजस्व भी प्राप्त होगा और लंबे समय से लंबित मामलों का समाधान भी निकल सकेगा। इसके अलावा हजारों परिवारों को कानूनी अनिश्चितता से राहत मिलेगी।
संगठनों का मानना है कि यदि लोगों को स्वेच्छा से अपने मामलों को नियमित कराने का अवसर दिया जाए तो नियमों के पालन की संस्कृति को भी बढ़ावा मिलेगा।
मंजूरी प्रक्रिया को बनाने की जरूरत अधिक सरल
रेजिडेंट वेलफेयर संगठनों ने भवन निर्माण और संशोधन से संबंधित अनुमतियों की प्रक्रिया को भी सरल बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि कई बार नागरिक आवश्यक मंजूरी लेने का प्रयास करते हैं, लेकिन प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली होने के कारण उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
कई मामलों में फाइलें लंबे समय तक लंबित रहती हैं, जिससे लोग असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं। बाद में इन्हीं मामलों को नियम उल्लंघन मानकर कार्रवाई की जाती है।
संगठनों का सुझाव है कि भवन संबंधी अनुमतियों के लिए ऑनलाइन व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाया जाए, समयबद्ध मंजूरी प्रणाली लागू की जाए तथा नागरिकों को स्पष्ट दिशा-निर्देश उपलब्ध कराए जाएं।
नियम बनाने से पहले नागरिकों की भागीदारी जरूरी
आरडब्ल्यूए और हाउसिंग सोसायटियों ने प्रशासन से यह भी आग्रह किया है कि भविष्य में भवन नियमों या दंड संबंधी प्रावधानों में कोई बड़ा बदलाव करने से पहले नागरिक संगठनों से परामर्श किया जाए।
उनका कहना है कि स्थानीय निवासी शहर की वास्तविक जरूरतों और जमीनी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं। यदि नीति निर्माण में उनकी राय शामिल की जाए तो नियम अधिक व्यवहारिक और स्वीकार्य बन सकते हैं।
संगठनों के अनुसार प्रशासन, विशेषज्ञों, आरडब्ल्यूए और हाउसिंग सोसायटियों के बीच नियमित संवाद की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि किसी भी नई नीति को लागू करने से पहले संभावित प्रभावों का आकलन किया जा सके।
पारदर्शी और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की अपील
निवासी संगठनों का कहना है कि किसी भी उल्लंघन के मामले में सीधे भारी जुर्माना लगाने के बजाय पहले संबंधित व्यक्ति को पर्याप्त समय और स्पष्ट सूचना दी जानी चाहिए। यदि व्यक्ति निर्धारित अवधि में त्रुटि को दूर कर देता है तो उस पर कठोर आर्थिक दंड लगाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने मांग की कि निरीक्षण, नोटिस जारी करने और दंड निर्धारण की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जाए। इससे लोगों में विश्वास बढ़ेगा और अनावश्यक विवादों से भी बचा जा सकेगा।
लोगों में बढ़ रही नाराजगी
वॉयस ऑफ हाउसिंग सोसायटी के अध्यक्ष आर.एस. थापर ने कहा कि शहर में नियमों का पालन आवश्यक है, लेकिन दंड की राशि इतनी अधिक नहीं होनी चाहिए कि आम नागरिकों के लिए उसे वहन करना मुश्किल हो जाए। उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था के कारण कई परिवार आर्थिक और मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि प्रशासन को ऐसे मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिससे नियमों की गरिमा भी बनी रहे और नागरिकों को अनावश्यक परेशानियों का सामना भी न करना पड़े।
वहीं संगठन के प्रतिनिधि जे.जे. सिंह ने कहा कि शहर के निवासी भी अतिक्रमण-मुक्त और सुव्यवस्थित चंडीगढ़ चाहते हैं। लेकिन किसी भी नीति की सफलता के लिए सख्ती के साथ संवेदनशीलता और व्यावहारिक सोच भी जरूरी होती है। उन्होंने कहा कि नागरिकों और प्रशासन के बीच विश्वास कायम रखना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना नियमों का पालन सुनिश्चित करना।
संतुलन की जरूरत पर जोर
रेजिडेंट संगठनों का मानना है कि शहर के विकास और नियोजित स्वरूप को बनाए रखने के लिए भवन नियम आवश्यक हैं, लेकिन इन नियमों का क्रियान्वयन ऐसा होना चाहिए जो लोगों की वास्तविक परिस्थितियों को भी समझे। उनका कहना है कि अत्यधिक दंडात्मक व्यवस्था के बजाय सहयोगात्मक और सुधारात्मक दृष्टिकोण अधिक प्रभावी साबित हो सकता है।
संगठनों ने उम्मीद जताई है कि प्रशासन उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करेगा और ऐसी नीति तैयार करेगा जिसमें शहर की नियोजित संरचना, नागरिक हित और प्रशासनिक उद्देश्यों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सके। इससे न केवल विवाद कम होंगे बल्कि नागरिकों का भरोसा भी मजबूत होगा और चंडीगढ़ को एक बेहतर एवं अधिक सहभागी शहरी मॉडल के रूप में विकसित करने में मदद मिलेगी।




