अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तेहरान के साथ बातचीत के लिए तय की गई 60 दिन की समयसीमा समाप्त होने के बाद इसे आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है। सोमवार को जब पत्रकारों ने उनसे बातचीत की अवधि बढ़ाने की संभावना के बारे में सवाल किया, तो ट्रम्प ने साफ संकेत दिया कि अमेरिका अब ऐसी किसी डील के लिए तैयार नहीं है, जिसमें उसकी प्रमुख शर्तें पूरी न हों।
ओवल ऑफिस में मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रम्प ने कहा कि ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन वह उस तरह की संधि स्वीकार करने को तैयार नहीं है, जिसे अमेरिका जरूरी मानता है। उनके बयान से साफ है कि वॉशिंगटन फिलहाल तेहरान के साथ किसी सामान्य या सीमित समझौते के बजाय अपनी प्रमुख मांगों को शामिल कराने पर जोर दे रहा है।
इस पूरे विवाद के केंद्र में ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिका चाहता है कि तेहरान अपने परमाणु कार्यक्रम को इस तरह सीमित करे कि उससे परमाणु हथियार बनाने की संभावना पूरी तरह खत्म हो जाए। दूसरी ओर, ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों, खासकर ऊर्जा और नागरिक इस्तेमाल के लिए है। यही अंतर दोनों देशों के बीच किसी स्थायी समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बना हुआ है।
60 दिन की समयसीमा की शुरुआत कैसे हुई?
अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून को एक समझौता ज्ञापन यानी MOU हुआ था। इसके तहत दोनों पक्षों को बातचीत के जरिए विवादित मुद्दों का समाधान खोजने के लिए 60 दिन का वक्त दिया गया था। उम्मीद थी कि इस अवधि में दोनों देश अपने मतभेदों को कम करेंगे और ऐसी व्यवस्था तैयार करेंगे, जिससे क्षेत्र में तनाव घटाया जा सके।
इस अवधि में कई अहम मुद्दों पर चर्चा होनी थी। इनमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा, होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति और दोनों देशों के बीच स्थायी शांति समझौते की संभावनाएं शामिल थीं। MOU में जरूरत पड़ने पर बातचीत की अवधि आगे बढ़ाने का विकल्प भी मौजूद था।
हालांकि, 60 दिन पूरे होने तक प्रमुख मुद्दों पर कोई निर्णायक सहमति नहीं बन सकी। बातचीत की प्रक्रिया कई हफ्तों से प्रभावी रूप से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। ऐसे में समयसीमा खत्म होने के बाद उसे बढ़ाने की संभावना भी कमजोर होती गई।
ट्रम्प के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिका अब केवल समयसीमा बढ़ाने के बजाय ईरान से ठोस रियायतें चाहता है। वॉशिंगटन का मानना है कि किसी भी नए समझौते में परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी उसकी सुरक्षा चिंताओं का समाधान होना जरूरी है।
तेहरान ने भी डेडलाइन को बताया बेअसर
दिलचस्प बात यह है कि ईरान की तरफ से भी 60 दिन की समयसीमा को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया गया। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने इस अवधि को ज्यादा महत्व देने से इनकार किया।
उनके मुताबिक दोनों देशों के बीच ऐसी वास्तविक बातचीत शुरू ही नहीं हुई थी, जिसे इस 60 दिन की अवधि से जोड़ा जा सके। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका ने शुरुआत से ही हुए समझ की भावना को कमजोर किया और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं किया।
ईरान का तर्क है कि जब बातचीत के लिए जरूरी परिस्थितियां ही मौजूद नहीं थीं, तो 60 दिन की अवधि को बातचीत की वास्तविक डेडलाइन मानने का कोई मतलब नहीं है। इस बयान से दोनों देशों की स्थिति में मौजूद गहरी दूरी का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यानी जहां अमेरिका मान रहा है कि तय अवधि में समझौते की दिशा में पर्याप्त प्रगति नहीं हुई, वहीं ईरान उस पूरी प्रक्रिया की वैधता और प्रभावशीलता पर ही सवाल उठा रहा है।
सैन्य कार्रवाई की जगह आर्थिक दबाव का विकल्प
अमेरिका की अगली रणनीति को लेकर भी महत्वपूर्ण संकेत सामने आए हैं। फिलहाल जुलाई के अंत के बाद ईरान के खिलाफ किसी नए अमेरिकी सैन्य हमले की सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है। इसके बजाय ट्रम्प प्रशासन आर्थिक मोर्चे पर दबाव बढ़ाने की तैयारी करता दिखाई दे रहा है।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया है कि ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के उद्देश्य से अगले सप्ताह नए कदमों की घोषणा की जा सकती है। उनके बयान को अमेरिका की रणनीति में संभावित बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
इसका मतलब यह हो सकता है कि वॉशिंगटन फिलहाल सीधे सैन्य टकराव को बढ़ाने के बजाय आर्थिक प्रतिबंधों और वित्तीय दबाव के जरिए तेहरान को बातचीत की मेज पर वापस लाने की कोशिश करे।
अमेरिकी रणनीति का उद्देश्य ईरान की आर्थिक क्षमता पर दबाव डालना और उसकी सरकार को ऐसी स्थिति में लाना हो सकता है, जहां उसे अमेरिकी शर्तों पर दोबारा बातचीत करने पर विचार करना पड़े। हालांकि, यह भी स्पष्ट नहीं है कि आर्थिक दबाव ईरान को झुकने पर मजबूर करेगा या इससे दोनों देशों के रिश्ते और ज्यादा खराब होंगे।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना अहम?
अमेरिका और ईरान के बीच विवाद का दूसरा बड़ा केंद्र होर्मुज स्ट्रेट है। यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए इसकी रणनीतिक अहमियत बेहद ज्यादा है, क्योंकि दुनिया के तेल और गैस व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
अगर इस मार्ग में लंबे समय तक बाधा आती है तो इसका असर सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है और एशिया, यूरोप सहित कई क्षेत्रों में ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।
ट्रम्प ने सोमवार को दावा किया कि अमेरिका नाकाबंदी के जरिए स्ट्रेट पर नियंत्रण बनाए हुए है। उन्होंने यहां तक कहा कि इसे अमेरिकी क्षेत्र घोषित करने के विचार पर भी विचार किया जा सकता है। इस बयान ने पहले से तनावपूर्ण स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, जुलाई के मध्य से अमेरिकी नाकाबंदी के दौरान 64 वाणिज्यिक जहाजों का मार्ग बदला गया है। समुद्री निगरानी से जुड़े संगठनों ने भी संकेत दिया है कि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है।
ओमान भी आया दबाव के दायरे में
होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ओमान के बीच भी मतभेद उभरते दिखाई दे रहे हैं। ओमान लंबे समय से ईरान और पश्चिमी देशों के बीच संवाद स्थापित करने में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। मौजूदा संकट में भी वह तनाव कम करने और समुद्री रास्ते को खुला रखने के प्रयास कर रहा है।
ट्रम्प ने फॉक्स न्यूज से बातचीत में ओमान को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वह इस मुद्दे पर अमेरिका के रास्ते में बाधा बनता है, तो उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
ओमान की कोशिश है कि ईरान के साथ मिलकर होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखा जाए और इसके संचालन तथा सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के बीच व्यवस्था बनाई जाए। हालांकि, अमेरिका इस व्यवस्था को किस नजर से देखता है, यह अब विवाद का एक अलग मुद्दा बनता जा रहा है।
ओमान का पहले भी अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थ के तौर पर इस्तेमाल होता रहा है। इसलिए अगर मौजूदा परिस्थितियों में मस्कट की भूमिका सीमित होती है, तो दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत के रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं।
अब बातचीत की राह कितनी मुश्किल?
60 दिन की अवधि समाप्त होने और ट्रम्प द्वारा इसे बढ़ाने से इनकार करने के बाद अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक रास्ता पहले की तुलना में और कठिन नजर आ रहा है। दोनों देशों की प्राथमिकताएं फिलहाल एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
अमेरिका परमाणु कार्यक्रम को लेकर कड़े आश्वासन चाहता है और आर्थिक दबाव बढ़ाने की तैयारी में है। दूसरी तरफ ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों को शांतिपूर्ण उपयोग का हिस्सा बताता है और अमेरिका पर समझौते की शर्तों का पालन नहीं करने का आरोप लगा रहा है।
इसके साथ ही होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति भी तनाव का नया केंद्र बन गई है। अगर समुद्री मार्ग को लेकर दोनों पक्षों के बीच टकराव बढ़ता है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिकी आर्थिक दबाव ईरान को नई बातचीत के लिए मजबूर कर पाएगा। दूसरा सवाल यह है कि अगर तेहरान अमेरिकी शर्तों को स्वीकार नहीं करता, तो ट्रम्प प्रशासन आगे कौन-सा कदम उठाएगा।
अगर दोनों देशों के बीच संवाद का कोई नया रास्ता नहीं निकलता, तो परमाणु विवाद के साथ-साथ समुद्री सुरक्षा और आर्थिक प्रतिबंधों का मुद्दा भी और गंभीर हो सकता है। आने वाले दिनों में अमेरिका की नई आर्थिक घोषणाएं और ईरान की प्रतिक्रिया यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी कि दोनों देश बातचीत की ओर लौटते हैं या टकराव का रास्ता और लंबा होता है।




