देश में चीनी की कीमतों में अचानक आई तेजी ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। आने वाले महीनों में त्योहारों के कारण चीनी की खपत और बढ़ने की संभावना है। ऐसे में केंद्र सरकार घरेलू बाजार में पर्याप्त सप्लाई बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कई नीतिगत विकल्पों पर विचार कर रही है। इनमें सीमित मात्रा में चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देना, आयात शुल्क में कटौती करना, थोक कारोबारियों के लिए स्टॉक रखने की सीमा घटाना और चीनी मिलों के मासिक बिक्री कोटे में बदलाव जैसे कदम शामिल हैं।
सरकार से जुड़े सूत्रों के अनुसार, फिलहाल किसी एक विकल्प पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। अधिकारियों और उद्योग से जुड़े लोगों के बीच अलग-अलग उपायों को लेकर चर्चा चल रही है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि त्योहारों के दौरान बाजार में चीनी की कमी न हो और इसकी बढ़ती कीमतों का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर न पड़े।
कुछ ही दिनों में कीमतों में करीब 20 फीसदी उछाल
चीनी की कीमतों में तेजी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र के कोल्हापुर जैसे प्रमुख चीनी व्यापार केंद्र में थोक भाव अगस्त की शुरुआत से लगभग 20 प्रतिशत बढ़ चुके हैं। यहां चीनी की कीमत करीब 5,350 रुपये प्रति 100 किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई है।
कीमतों में यह वृद्धि ऐसे समय हुई है जब देश में अगले चीनी सीजन की शुरुआत होने में अभी कुछ समय बाकी है। सरकारी अनुमान के मुताबिक मौजूदा घरेलू स्टॉक और उपलब्ध सप्लाई अगले सीजन तक देश की कुल जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त हो सकती है। इसके बावजूद बाजार में स्थानीय स्तर पर उपलब्धता कम होने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
एक सरकारी अधिकारी के मुताबिक कीमतों में हालिया तेजी को पूरी तरह सामान्य बाजार परिस्थितियों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। सरकार का मानना है कि अगर बाजार में अनावश्यक तेजी बनी रहती है तो उसे रोकने के लिए समय रहते हस्तक्षेप करना जरूरी होगा।
सरकार के सामने कई विकल्प
कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार कई विकल्पों को एक साथ देख रही है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण सीमित मात्रा में चीनी के आयात की अनुमति देना हो सकता है। यदि सरकार ऐसा फैसला करती है तो घरेलू बाजार में अतिरिक्त चीनी पहुंचाई जा सकेगी और सप्लाई की कमी को दूर करने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा आयात पर लगने वाली ड्यूटी में कमी करने का विकल्प भी मौजूद है। वर्तमान व्यवस्था में विदेशी चीनी भारतीय बाजार में आने पर उसकी लागत बढ़ जाती है। यदि आयात शुल्क कम किया जाता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार से चीनी खरीदना घरेलू कारोबारियों के लिए अपेक्षाकृत सस्ता हो सकता है।
सरकार थोक कारोबारियों के पास रखे जाने वाले चीनी के स्टॉक की सीमा की भी समीक्षा कर सकती है। स्टॉक लिमिट कम करने से कारोबारियों के पास लंबे समय तक बड़ी मात्रा में चीनी जमा रखने की गुंजाइश कम होगी। सरकार को उम्मीद है कि इससे बाजार में उपलब्ध स्टॉक बढ़ सकता है और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
त्योहारों से पहले बढ़ी सरकार की चिंता
चीनी की कीमतों में तेजी का समय सरकार के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में आने वाले महीनों में त्योहारों का सिलसिला शुरू होने वाला है। अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आते हैं। इन अवसरों पर मिठाइयों और अन्य खाद्य उत्पादों की मांग में काफी वृद्धि होती है।
त्योहारों के दौरान घरों में मिठाइयां बनाने के साथ-साथ बाजार में तैयार मिठाइयों, बेकरी उत्पादों, कन्फेक्शनरी और चीनी आधारित दूसरी चीजों की बिक्री भी बढ़ जाती है। इसका सीधा असर चीनी की खपत पर पड़ता है।
अगर इसी अवधि में बाजार में सप्लाई सीमित रहती है तो कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। यही वजह है कि सरकार त्योहारों का पीक सीजन शुरू होने से पहले ही स्थिति को संभालने के उपाय तलाश रही है।
व्यापारियों का दावा- बाजार में पर्याप्त सप्लाई नहीं
सरकारी अनुमानों में भले ही घरेलू स्तर पर उपलब्ध चीनी को मांग के मुकाबले पर्याप्त बताया जा रहा हो, लेकिन बाजार से अलग तस्वीर सामने आ रही है। व्यापारियों का कहना है कि कई स्थानीय बाजारों में चीनी की उपलब्धता जरूरत के मुताबिक नहीं है।
बॉम्बे शुगर मर्चेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक जैन के मुताबिक स्थानीय स्तर पर सप्लाई में कमी दिखाई दे रही है। उनके अनुसार त्योहारों के मौसम में मांग बढ़ने पर बाजार को अतिरिक्त चीनी की जरूरत होगी और आयात इस कमी को दूर करने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है।
व्यापारियों का तर्क है कि अगर विदेशी चीनी को सीमित मात्रा में भारतीय बाजार में लाया जाता है तो इससे सप्लाई बढ़ेगी। अतिरिक्त उपलब्धता के कारण घरेलू कीमतों पर भी दबाव कम किया जा सकता है।
करीब एक दशक बाद बदल सकती है रणनीति
भारत दुनिया में चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है और घरेलू मांग का बड़ा हिस्सा देश के भीतर होने वाले उत्पादन से पूरा किया जाता है। पिछले करीब एक दशक में भारत को बड़े पैमाने पर चीनी आयात पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ी है।
ऐसे में अगर सरकार आयात की अनुमति देती है तो इसे चीनी बाजार की नीति में एक अहम बदलाव माना जाएगा। खासकर तब जब आयात के साथ-साथ शुल्क में कटौती भी की जाती है।
हालांकि आयात का असर केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा। भारत की ओर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ी मात्रा में खरीदारी शुरू होने पर वैश्विक चीनी कीमतों को भी समर्थन मिल सकता है। दूसरी ओर, विदेशी सप्लाई भारतीय बाजार में पहुंचने से घरेलू कीमतों को नीचे लाने में मदद मिलने की संभावना है।
चीनी मिलों के बिक्री कोटे में भी बदलाव संभव
सरकार सिर्फ आयात पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू सप्लाई व्यवस्था में भी बदलाव करने पर विचार कर रही है। इसके तहत चीनी मिलों को हर महीने घरेलू बाजार में बेचने के लिए निर्धारित मात्रा की समीक्षा की जा सकती है।
मिलों के लिए मासिक बिक्री आवंटन में बदलाव होने पर बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा बढ़ सकती है। इससे उन इलाकों में सप्लाई सुधरने की उम्मीद है जहां फिलहाल कारोबारियों को कमी का सामना करना पड़ रहा है।
सरकार के सामने चुनौती यह है कि बाजार में अचानक बहुत ज्यादा चीनी भी न पहुंचाई जाए और दूसरी तरफ त्योहारों के दौरान मांग के मुकाबले सप्लाई कम भी न पड़े। इसलिए मासिक बिक्री कोटे में किसी भी बदलाव को बाजार की मौजूदा स्थिति और आने वाली मांग को ध्यान में रखकर करने की जरूरत होगी।
गन्ने का इस्तेमाल भी बन सकता है बड़ा मुद्दा
चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार उत्पादन पक्ष पर भी नजर रख रही है। हाल ही में ऐसी रिपोर्ट सामने आई थी कि अक्टूबर से शुरू होने वाले अगले सीजन में इथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले गन्ने की मात्रा में कटौती करने पर विचार किया जा रहा है।
अगर गन्ने की अधिक मात्रा चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध कराई जाती है तो मिलों को ज्यादा चीनी बनाने में मदद मिल सकती है। इससे अगले सीजन में घरेलू उत्पादन बढ़ने की संभावना बनेगी और बाजार में सप्लाई बेहतर हो सकती है।
यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत पिछले कुछ वर्षों में गन्ने से इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देता रहा है। गन्ने और उसके उत्पादों के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। एक तरफ इथेनॉल नीति के लक्ष्य हैं, तो दूसरी तरफ घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों को नियंत्रण में रखना जरूरी है।
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती कीमत और सप्लाई में संतुलन
फिलहाल सरकार के सामने मुख्य लक्ष्य त्योहारों के दौरान चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना है। अगर आयात की अनुमति दी जाती है तो इससे तत्काल सप्लाई बढ़ाने में मदद मिल सकती है। वहीं स्टॉक लिमिट और मिलों के बिक्री कोटे में बदलाव जैसे कदम घरेलू बाजार के भीतर उपलब्धता सुधार सकते हैं।
हालांकि आयात का फैसला घरेलू चीनी उद्योग पर भी असर डाल सकता है। इसलिए सरकार को उपभोक्ताओं के हित और चीनी मिलों के हितों के बीच संतुलन बनाना होगा।
आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है कि सरकार इन विकल्पों में से किसे लागू करती है। यदि कीमतों में तेजी जारी रहती है तो आयात और शुल्क में बदलाव जैसे कदम तेजी से उठाए जा सकते हैं। दूसरी ओर, घरेलू उत्पादन और सप्लाई में सुधार होने पर सरकार आयात को सीमित रखने का विकल्प भी चुन सकती है।
कुल मिलाकर चीनी की बढ़ती कीमतों ने सरकार को त्योहारों से पहले सतर्क कर दिया है। बाजार में सप्लाई बढ़ाने से लेकर स्टॉक पर नियंत्रण और उत्पादन बढ़ाने तक कई मोर्चों पर काम करने की तैयारी दिखाई दे रही है। अब नजर इस बात पर होगी कि सरकार इनमें से कौन-सा कदम उठाती है और उसका असर आने वाले त्योहारों के दौरान चीनी की कीमतों पर कितना पड़ता है।




