जानिए क्यों दूसरे देशों का कचरा खरीदता है यह यूरोपीय देश

जानिए क्यों दूसरे देशों का कचरा खरीदता है यह यूरोपीय देश

स्वीडन क्यों खरीदता है दूसरे देशों से कचरा? जानिए कचरे से ऊर्जा बनाने का अनोखा मॉडल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पांच देशों की यात्रा के तीसरे चरण में रविवार को यूरोपीय देश स्वीडन पहुंच रहे हैं। तकनीक, ग्रीन एनर्जी, रिसर्च और इनोवेशन के क्षेत्र में अपनी पहचान रखने वाला स्वीडन दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जो दूसरे देशों से कचरा आयात करता है। यह बात सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन इसके पीछे एक बेहद आधुनिक और व्यवस्थित वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम काम करता है।

जहां दुनिया के कई देश बढ़ते कचरे और लैंडफिल की समस्या से परेशान हैं, वहीं स्वीडन ने कचरे को बोझ नहीं बल्कि संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने का तरीका विकसित किया है। वहां कचरे से बिजली और गर्मी पैदा की जाती है, जिससे लाखों लोगों की ऊर्जा जरूरतें पूरी होती हैं।

स्वीडन का मॉडल इस बात का उदाहरण है कि सही तकनीक और बेहतर योजना के जरिए कचरे को पर्यावरणीय समस्या से आर्थिक और ऊर्जा संसाधन में बदला जा सकता है। यही कारण है कि स्वीडन को दुनिया के सबसे प्रभावी वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम वाले देशों में गिना जाता है।

देश में लगाए गए अत्याधुनिक वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट्स को लगातार चलाने के लिए बड़ी मात्रा में कचरे की आवश्यकता होती है। जब घरेलू स्तर पर उपलब्ध कचरा इन प्लांट्स की जरूरत से कम पड़ने लगा, तो स्वीडन ने दूसरे देशों से कचरा मंगाना शुरू किया।

स्वीडन की रीसाइक्लिंग व्यवस्था इतनी मजबूत क्यों है?

99 प्रतिशत घरेलू कचरे का हो रहा इस्तेमाल

स्वीडन की सबसे बड़ी खासियत उसकी मजबूत रीसाइक्लिंग व्यवस्था है। वहां घरेलू कचरे के बड़े हिस्से को दोबारा उपयोग, रीसाइक्लिंग या ऊर्जा उत्पादन में इस्तेमाल किया जाता है। यही कारण है कि देश में लैंडफिल यानी कचरा फेंकने वाली जगहों पर निर्भरता बेहद कम हो गई है।

स्वीडन में कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उसका प्रबंधन किया जाता है। प्लास्टिक, कागज, धातु, कांच और जैविक कचरे को अलग-अलग प्रक्रिया के माध्यम से इस्तेमाल किया जाता है। इससे न केवल पर्यावरण को फायदा होता है बल्कि संसाधनों की बचत भी होती है।

जब किसी देश में कचरे का इतना बड़ा हिस्सा पहले ही उपयोग में आ जाता है, तो ऊर्जा उत्पादन करने वाले प्लांट्स के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं रहती। इसी कमी को पूरा करने के लिए स्वीडन दूसरे देशों से कचरा आयात करता है।

कचरे से बिजली और गर्मी बनाने की तकनीक

स्वीडन में वेस्ट-टू-एनर्जी तकनीक का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है। इसमें ऐसे कचरे को विशेष प्लांट्स में भेजा जाता है, जिसे सामान्य तरीके से रीसायकल करना संभव नहीं होता। इन प्लांट्स में कचरे को नियंत्रित तरीके से जलाकर ऊर्जा पैदा की जाती है।

इस प्रक्रिया से निकलने वाली गर्मी का उपयोग बिजली उत्पादन और हीटिंग सिस्टम में किया जाता है। सर्दियों के मौसम में यह व्यवस्था स्वीडन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वहां तापमान काफी नीचे चला जाता है और लोगों को घरों को गर्म रखने के लिए बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होती है।

डिस्ट्रिक्ट हीटिंग सिस्टम से गर्म रहते हैं लाखों घर

स्वीडन में डिस्ट्रिक्ट हीटिंग सिस्टम काफी लोकप्रिय है। इसमें वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट्स से पैदा होने वाली गर्मी को पाइपलाइन नेटवर्क के माध्यम से घरों, कार्यालयों और अन्य इमारतों तक पहुंचाया जाता है।

इस व्यवस्था के कारण अलग-अलग घरों में अलग हीटिंग सिस्टम लगाने की जरूरत कम हो जाती है। इससे ऊर्जा की बचत होती है और प्रदूषण को भी नियंत्रित करने में मदद मिलती है। सर्दियों के महीनों में यह सिस्टम लाखों लोगों के लिए बेहद उपयोगी साबित होता है।

कचरे से बनाई जाती है बिजली

स्वीडन में जो कचरा दोबारा उपयोग या रीसायकल नहीं किया जा सकता, उसे विशेष इंसिनरेशन प्लांट्स में भेजा जाता है। यहां वैज्ञानिक तरीके से कचरे को जलाकर उससे ऊर्जा प्राप्त की जाती है।

इस प्रक्रिया से उत्पन्न ऊर्जा को बिजली में बदला जाता है और फिर इसे घरों, व्यवसायिक संस्थानों तथा उद्योगों तक पहुंचाया जाता है। इस तरह कचरा केवल निपटाने वाली वस्तु नहीं रहता, बल्कि ऊर्जा उत्पादन का माध्यम बन जाता है।

कचरे से बची राख का भी होता है उपयोग

स्वीडन की वेस्ट मैनेजमेंट प्रणाली की खास बात यह है कि कचरा जलाने के बाद बचने वाले अवशेषों को भी बेकार नहीं छोड़ा जाता। राख और अन्य सामग्री को अलग-अलग प्रक्रियाओं से गुजारकर उपयोगी बनाया जाता है।

कुछ अवशेषों का इस्तेमाल सड़क निर्माण और अन्य औद्योगिक कार्यों में किया जाता है। इससे कचरे की मात्रा को और कम किया जाता है तथा उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जाता है।

दूसरे देश क्यों भेजते हैं स्वीडन को अपना कचरा?

कई यूरोपीय देशों में कचरा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती रहा है। कुछ देशों के पास कचरे को सुरक्षित तरीके से निपटाने के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। ऐसे में वे अपना कचरा उन देशों को भेजते हैं, जहां उसे बेहतर तकनीक के माध्यम से उपयोग में लाया जा सकता है।

स्वीडन के पास आधुनिक वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट्स और बेहतर प्रबंधन प्रणाली है। इसलिए दूसरे देश वहां कचरा भेजते हैं ताकि उसका वैज्ञानिक तरीके से निपटारा हो सके।

कचरे से स्वीडन को आर्थिक फायदा भी होता है

कचरा आयात करने से स्वीडन को केवल ऊर्जा का स्रोत ही नहीं मिलता, बल्कि आर्थिक लाभ भी होता है। दूसरे देश अपना कचरा भेजने के लिए स्वीडन को भुगतान करते हैं, जिसे आमतौर पर टिपिंग फीस कहा जाता है।

इस तरह स्वीडन को एक ही प्रक्रिया से दो फायदे मिलते हैं। पहला, उसके ऊर्जा संयंत्रों को लगातार चलाने के लिए जरूरी सामग्री मिलती है और दूसरा, कचरे के प्रबंधन से आर्थिक आय भी होती है।

पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार मॉडल

स्वीडन का कचरा प्रबंधन मॉडल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जाता है। कचरे को खुले में फेंकने या लैंडफिल में जमा करने के बजाय उसका उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जाता है। इससे जमीन की बचत होती है और प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

हालांकि वेस्ट-टू-एनर्जी तकनीक को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग विचार भी हैं। कुछ विशेषज्ञ रीसाइक्लिंग और कचरा कम करने को प्राथमिकता देने की बात करते हैं, जबकि कई लोग इसे उन कचरों के लिए उपयोगी मानते हैं जिन्हें अन्य तरीकों से इस्तेमाल करना संभव नहीं होता।

स्वीडन से क्या सीख सकते हैं दूसरे देश?

स्वीडन का अनुभव दिखाता है कि कचरे को सही तरीके से प्रबंधित करने के लिए केवल तकनीक ही नहीं बल्कि नागरिक भागीदारी, बेहतर नीतियां और लंबे समय की योजना भी जरूरी होती है। कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटना, रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना और ऊर्जा उत्पादन के विकल्प विकसित करना इस मॉडल के प्रमुख हिस्से हैं।

आज जब दुनिया के कई शहर कचरे की समस्या से जूझ रहे हैं, तब स्वीडन की व्यवस्था यह दिखाती है कि सही प्रबंधन के जरिए कचरे को उपयोगी संसाधन में बदला जा सकता है।