झारखंड में छात्र आंदोलन से बढ़ा तनाव, क्या लग सकता है राष्ट्रपति शासन? जानिए अनुच्छेद-356 का पूरा नियम

झारखंड में छात्र आंदोलन से बढ़ा तनाव, क्या लग सकता है राष्ट्रपति शासन? जानिए अनुच्छेद-356 का पूरा नियम

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) समेत अन्य परीक्षाओं को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्र पिछले 17 दिनों से आंदोलनरत हैं। सोमवार को प्रदर्शनकारियों ने राज्य विधानसभा की ओर बढ़ने की कोशिश की, जिसके बाद प्रशासन के सामने स्थिति संभालने की चुनौती और बढ़ गई।

छात्र विधानसभा का घेराव करना चाहते थे। प्रदर्शनकारियों के बढ़ते दबाव के बीच पुलिस और प्रशासन ने उन्हें रोकने की कोशिश की। राज्य सरकार की तरफ से आंदोलन को शांत कराने के लिए कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन छात्रों का विरोध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

ऐसे माहौल में अब एक संवैधानिक सवाल भी चर्चा में आने लगा है। अगर प्रदर्शन लगातार बढ़ता गया और कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहद खराब हो गई तो क्या केंद्र सरकार झारखंड में हस्तक्षेप कर सकती है? क्या ऐसी स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है?

इस सवाल का जवाब केवल आंदोलन की तीव्रता से नहीं निकलेगा। इसके लिए यह देखना होगा कि क्या राज्य की संवैधानिक मशीनरी वास्तव में काम करने में असमर्थ हो गई है।

राष्ट्रपति शासन आखिर होता क्या है?

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 356 राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल होने की स्थिति से जुड़ा प्रावधान है। इसके तहत यदि राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि किसी राज्य की सरकार संविधान के अनुसार शासन चलाने की स्थिति में नहीं है, तो राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।

आमतौर पर ऐसी स्थिति में राज्यपाल की रिपोर्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राज्यपाल राज्य के प्रशासन और कानून-व्यवस्था की स्थिति का आकलन करके केंद्र को अपनी रिपोर्ट भेज सकते हैं। हालांकि केवल राज्यपाल की रिपोर्ट ही अंतिम आधार नहीं होती। केंद्र सरकार को परिस्थितियों का संवैधानिक आकलन करना होता है।

राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद राज्य सरकार की कार्यकारी शक्तियां केंद्र के अधीन आ जाती हैं और राज्य विधानसभा के अधिकारों पर भी संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार असर पड़ता है। इसलिए इसे सामान्य प्रशासनिक उपाय नहीं माना जाता।

क्या झारखंड में चल रहे मौजूदा आंदोलन 356 की वजह बन सकता है?

यही मौजूदा परिस्थिति का सबसे बड़ा सवाल है। छात्रों का बड़ा आंदोलन अपने आप में अनुच्छेद 356 लागू करने का आधार नहीं बनता।

किसी राज्य में हजारों या लाखों लोग किसी मांग को लेकर सड़कों पर उतर सकते हैं। प्रदर्शन लंबे समय तक चल सकता है। पुलिस के साथ टकराव हो सकता है और कुछ स्थानों पर हिंसा भी हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्य की संवैधानिक व्यवस्था विफल हो गई।

झारखंड में फिलहाल सबसे पहले यह देखा जाएगा कि राज्य सरकार प्रशासन चला पा रही है या नहीं। क्या पुलिस और प्रशासन कानून लागू करने में सक्षम हैं? क्या सरकारी संस्थान अपना काम कर रहे हैं? क्या विधानसभा संवैधानिक तरीके से काम कर रही है? क्या राज्य सरकार निर्णय लेने और उन्हें लागू करने की स्थिति में है?

अगर इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली जारी रहती है तो केवल छात्र आंदोलन को संवैधानिक तंत्र की विफलता बताना मुश्किल होगा।

कानून-व्यवस्था और संवैधानिक संकट में अंतर

अनुच्छेद 356 को समझने के लिए कानून-व्यवस्था की समस्या और संवैधानिक तंत्र के विफल होने के बीच अंतर समझना जरूरी है।

मान लीजिए किसी राज्य में किसी मुद्दे को लेकर बड़ा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। जगह-जगह पुलिस की तैनाती करनी पड़ी और कुछ इलाकों में हिंसक घटनाएं भी हुईं। ऐसी स्थिति गंभीर जरूर है, लेकिन इसका सीधा मतलब यह नहीं कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार काम करने में असफल हो गई।

दूसरी स्थिति तब बन सकती है जब प्रशासनिक व्यवस्था इतनी कमजोर पड़ जाए कि सरकार अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन ही न कर सके। कानून का शासन प्रभावी रूप से खत्म हो जाए, प्रशासनिक मशीनरी काम करना बंद कर दे या सरकार राज्य का शासन चलाने की स्थिति में न रहे।

यही वह अंतर है जो किसी बड़े आंदोलन को सामान्य कानून-व्यवस्था की चुनौती से संवैधानिक संकट में बदल सकता है।

अनुच्छेद 356 लगाने की प्रक्रिया क्या है?

अगर किसी राज्य में संवैधानिक व्यवस्था के गंभीर रूप से विफल होने की स्थिति सामने आती है तो राज्यपाल राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेज सकते हैं। इसके अलावा राष्ट्रपति उपलब्ध अन्य सूचनाओं के आधार पर भी स्थिति का आकलन कर सकते हैं।

इसके बाद केंद्र सरकार मामले पर विचार करती है। यदि केंद्र को लगता है कि राज्य में संविधान के अनुसार शासन चलाना संभव नहीं रह गया है, तो राष्ट्रपति शासन की घोषणा की जा सकती है।

हालांकि राष्ट्रपति शासन की घोषणा अंतिम रूप से संसद की निगरानी से बाहर नहीं होती। इसे संसद के दोनों सदनों के सामने रखना जरूरी होता है।

राष्ट्रपति की ओर से जारी उद्घोषणा को दो महीने के भीतर लोकसभा और राज्यसभा दोनों से मंजूरी मिलना आवश्यक है। यदि संसद से मंजूरी नहीं मिलती तो राष्ट्रपति शासन आगे जारी नहीं रह सकता।

इसलिए यह प्रक्रिया केवल केंद्र सरकार के एक फैसले से तुरंत और स्थायी रूप से लागू होने वाली व्यवस्था नहीं है।

कितने समय तक चल सकता है राष्ट्रपति शासन?

संसद की मंजूरी मिलने के बाद राष्ट्रपति शासन छह महीने तक जारी रह सकता है। परिस्थितियों के आधार पर इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए हर छह महीने में संसद की मंजूरी आवश्यक होती है।

संविधान में राष्ट्रपति शासन की सामान्य अधिकतम अवधि तीन वर्ष निर्धारित है। हालांकि तीन साल तक इसे जारी रखने के लिए अतिरिक्त संवैधानिक शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं।

एक वर्ष से आगे राष्ट्रपति शासन बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय आपातकाल का लागू होना और निर्वाचन आयोग का यह मत होना जरूरी है कि संबंधित राज्य में चुनाव कराना संभव नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि राष्ट्रपति शासन कोई ऐसा विकल्प नहीं है जिसे किसी आंदोलन के कुछ दिनों तक चलने मात्र से लागू किया जा सके।

एसआर बोम्मई केस ने बदले नियम

भारत में अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल को लेकर सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों में 1994 का एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ मामला शामिल है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाने की केंद्र की शक्ति पर महत्वपूर्ण सीमाएं स्पष्ट की थीं। अदालत ने माना कि अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति की संतुष्टि पूरी तरह न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं है।

इस फैसले का भारतीय संघीय व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इसके बाद केंद्र सरकार के लिए किसी राज्य की निर्वाचित सरकार को केवल राजनीतिक मतभेद या सामान्य प्रशासनिक समस्या के आधार पर हटाना आसान नहीं रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति शासन के फैसले के पीछे वास्तविक और पर्याप्त संवैधानिक आधार होना चाहिए। यदि किसी मामले में संवैधानिक प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया गया हो तो न्यायपालिका उसकी समीक्षा कर सकती है।

इसी वजह से आज किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला पहले की तुलना में कहीं अधिक संवैधानिक जांच के दायरे में आता है।

झारखंड में पहले भी लग चुका है राष्ट्रपति शासन

झारखंड के लिए अनुच्छेद 356 कोई नया प्रावधान नहीं है। राज्य का गठन 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर हुआ था। गठन के बाद राज्य को राजनीतिक अस्थिरता के कई दौर देखने पड़े।

झारखंड में पहली बार 2009 में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। इसके बाद 2010 में भी राष्ट्रपति शासन की स्थिति बनी। वर्ष 2013 में भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। इन मामलों में मुख्य वजह छात्र आंदोलन जैसी परिस्थितियां नहीं बल्कि सरकार गठन और राजनीतिक अस्थिरता से जुड़ी परिस्थितियां थीं।

इसलिए इतिहास यह जरूर बताता है कि झारखंड में राष्ट्रपति शासन पहले लागू हो चुका है, लेकिन पुराने मामलों को वर्तमान छात्र आंदोलन से सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा। हर बार परिस्थितियों का संवैधानिक और राजनीतिक मूल्यांकन अलग होता है।

अगर आंदोलन और बढ़ा तो क्या होगा?

झारखंड में छात्रों का आंदोलन यदि आगे भी बढ़ता है तो राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था को बनाए रखने की होगी। सरकार को प्रदर्शनकारियों की मांगों पर बातचीत के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था को भी सामान्य बनाए रखना होगा।

अगर आंदोलन विधानसभा, सरकारी कार्यालयों या अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों के कामकाज को प्रभावित करता है तो प्रशासन को स्थिति संभालने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़ सकते हैं। लेकिन केवल प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ने या आंदोलन के लंबे समय तक जारी रहने से अनुच्छेद 356 अपने आप लागू नहीं हो जाता।

केंद्र सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि क्या राज्य सरकार अभी भी संवैधानिक तरीके से शासन करने में सक्षम है। अगर जवाब हां है तो आंदोलन को मुख्य रूप से कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक चुनौती के रूप में ही देखा जाएगा।

इसके विपरीत यदि हालात इतने गंभीर हो जाएं कि राज्य सरकार संवैधानिक जिम्मेदारियां निभाने में असमर्थ हो जाए, प्रशासनिक मशीनरी प्रभावी रूप से काम न करे और संवैधानिक शासन का संचालन बाधित हो जाए, तब अनुच्छेद 356 पर गंभीरता से विचार की स्थिति बन सकती है।

अभी सबसे अहम है सरकार की संवैधानिक क्षमता

झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन को देखते हुए फिलहाल सबसे जरूरी बात यह समझना है कि राष्ट्रपति शासन का पैमाना केवल यह नहीं है कि प्रदर्शन कितना बड़ा है या कितने दिनों से चल रहा है। असल कसौटी राज्य सरकार की संवैधानिक क्षमता है।

जब तक राज्य सरकार प्रशासन चला रही है, कानून लागू करने की संस्थाएं काम कर रही हैं, विधानसभा अपना संवैधानिक काम कर रही है और सरकार निर्णय लेने में सक्षम है, तब तक केवल आंदोलन को आधार बनाकर अनुच्छेद 356 लागू करना आसान नहीं होगा।

इसलिए मौजूदा परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन की चर्चा एक संवैधानिक संभावना के रूप में जरूर की जा सकती है, लेकिन इसे तत्काल लागू होने वाला विकल्प मानना सही नहीं होगा।

आखिरकार अनुच्छेद 356 एक असाधारण संवैधानिक उपाय है। इसका उद्देश्य सामान्य राजनीतिक या सामाजिक विरोध को दबाना नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति से निपटना है जहां राज्य में संविधान के अनुसार शासन चलाना वास्तव में संभव न रह जाए।