हाल के वैश्विक तनावों ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। खासकर पश्चिम एशिया में बढ़े संघर्ष और कच्चे तेल की आपूर्ति पर पड़े असर ने सरकार को भविष्य की रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। अब संकेत मिल रहे हैं कि भारत कच्चे तेल के भंडारण को लेकर अपनी नीति में बड़ा बदलाव कर सकता है, जिससे भविष्य में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर पड़ने वाले दबाव को कम किया जा सके।
जानकारों के मुताबिक, सरकार इस संभावना पर विचार कर रही है कि देश की रिफाइनरियों को पहले से कहीं अधिक मात्रा में कच्चा तेल स्टोर करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट, युद्ध या सप्लाई बाधा की स्थिति में देश की ऊर्जा जरूरतें प्रभावित न हों।
दरअसल, हाल में ईरान से जुड़े संघर्षों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था। भारत जैसे आयात-निर्भर देश को इसका सीधा असर झेलना पड़ा। महंगे दामों पर तेल खरीदने से आयात खर्च बढ़ा, चालू खाते का घाटा प्रभावित हुआ और भारतीय मुद्रा पर भी दबाव देखने को मिला। इसके विपरीत चीन ने अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहते हुए अपने विशाल तेल भंडार का लाभ उठाया।
चीन ने पहले से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल जमा कर रखा था। जब वैश्विक कीमतों में तेजी आई, तब उसने खुले बाजार से खरीदारी कम कर दी और अपने रिजर्व का उपयोग किया। इससे उसे महंगे तेल की खरीद से बचने में मदद मिली। यही मॉडल अब भारत के नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार, अभी देश की अधिकांश रिफाइनरियां अपनी नियमित परिचालन जरूरतों के लिए लगभग 15 दिनों का कच्चा तेल अपने पास रखती हैं। प्रस्तावित योजना के तहत इस भंडारण क्षमता को काफी बढ़ाया जा सकता है। हालांकि यह विचार अभी शुरुआती चरण में है और इस पर विस्तृत चर्चा चल रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत अपनी तेल सुरक्षा मजबूत करना चाहता है तो केवल रणनीतिक भंडारों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। निजी और सरकारी रिफाइनरियों को भी अधिक स्टॉक रखने के लिए प्रेरित करना पड़ सकता है। इससे किसी भी आपूर्ति संकट के दौरान देश के पास पर्याप्त बैकअप उपलब्ध रहेगा।
हालांकि इस योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती लागत है। अनुमान है कि यदि रिफाइनरियों को लगभग 30 दिनों की अतिरिक्त मांग के बराबर तेल स्टोर करना पड़े तो उन्हें करीब 150 मिलियन बैरल कच्चे तेल का भंडार बनाना होगा। भारत में प्रतिदिन लगभग 5 मिलियन बैरल तेल की खपत होती है, इसलिए इतनी बड़ी मात्रा का भंडारण आसान नहीं माना जा रहा।
वर्तमान अंतरराष्ट्रीय कीमतों और डॉलर-रुपया विनिमय दर को देखते हुए रिफाइनरियों को अतिरिक्त तेल खरीदने पर करीब 60 हजार करोड़ रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। इसके अलावा तेल रखने के लिए बड़े-बड़े स्टोरेज टैंक और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण पर भी भारी निवेश की आवश्यकता होगी। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि इस तरह की क्षमता विकसित करने में कई वर्ष लग सकते हैं।
इसी वजह से कुछ रिफाइनरियां इस प्रस्ताव को लेकर पूरी तरह उत्साहित नहीं दिखाई दे रही हैं। उनका मानना है कि अतिरिक्त भंडारण बनाए रखना वित्तीय रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। साथ ही लंबे समय तक तेल स्टोर करने के लिए आधुनिक सुविधाओं की भी जरूरत पड़ेगी।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का सुझाव है कि यदि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है तो कंपनियों को पर्याप्त लचीलापन देना चाहिए। उन्हें यह तय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि स्टोरेज सुविधाएं कहां बनाई जाएं और उनमें रखे तेल का प्रबंधन किस प्रकार किया जाए। इससे परियोजनाओं की व्यवहारिकता बढ़ सकती है।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बंदरगाहों के नजदीक बड़े स्टोरेज हब विकसित करना एक बेहतर विकल्प हो सकता है। ऐसे भंडार न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा करने में मदद करेंगे बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी उपयोगी साबित हो सकते हैं। इससे भारत क्षेत्रीय ऊर्जा कारोबार में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इस संदर्भ में सिंगापुर का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। सीमित भौगोलिक आकार के बावजूद सिंगापुर ने विशाल तेल भंडारण सुविधाओं और बेहतर व्यापारिक ढांचे के बल पर खुद को एशिया के प्रमुख ऊर्जा व्यापार केंद्रों में शामिल किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत भी अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर इसी दिशा में कदम बढ़ा सकता है।
हालिया घटनाओं ने भारत की ऊर्जा नीति से जुड़ी कुछ पुरानी धारणाओं पर भी सवाल खड़े किए हैं। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि फारस की खाड़ी के अपेक्षाकृत निकट होने के कारण भारत को बहुत बड़े रणनीतिक तेल भंडार की आवश्यकता नहीं है। लेकिन वैश्विक संघर्षों और समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम ने इस सोच को चुनौती दी है।
विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास पैदा हुई अनिश्चितता ने यह दिखाया कि तेल आपूर्ति श्रृंखला कितनी संवेदनशील हो सकती है। यदि किसी कारण से यह महत्वपूर्ण मार्ग प्रभावित होता है तो भारत जैसे बड़े आयातक देशों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
आंकड़े भी बताते हैं कि रणनीतिक भंडारण के मामले में भारत अभी कई बड़े देशों से पीछे है। 2025 के अंत तक भारत के पास लगभग 21 मिलियन बैरल का रणनीतिक कच्चा तेल भंडार था। तुलना करें तो चीन के पास 1,397 मिलियन बैरल, अमेरिका के पास 413 मिलियन बैरल और जापान के पास 263 मिलियन बैरल का भंडार मौजूद था।
यही कारण है कि अब ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने की दिशा में नए विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। यदि प्रस्तावित योजना आगे बढ़ती है तो भारत भविष्य में तेल की कीमतों में अचानक आने वाले उछाल और आपूर्ति संकटों का बेहतर तरीके से सामना कर सकेगा। इससे न केवल अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिलेगी बल्कि आम लोगों पर पड़ने वाला महंगाई का दबाव भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक जोखिमों के दौर में बड़े तेल भंडार केवल एक विकल्प नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता बनते जा रहे हैं। आने वाले वर्षों में भारत किस दिशा में कदम बढ़ाता है, यह देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा।
(Photo : AI Generated)




