बांग्लादेश की राजनीति में करीब साढ़े तीन दशक बाद राष्ट्रपति पद के चुनाव में मुकाबला देखने को मिलेगा। 20 अगस्त को होने वाले इस चुनाव में पहली बार लंबे अंतराल के बाद दो उम्मीदवार आमने-सामने हैं। सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने अपने महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को उम्मीदवार बनाया है, जबकि विपक्षी खेमे से जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) के अध्यक्ष और पूर्व सैन्य अधिकारी कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद को मैदान में उतारा है।
हालांकि चुनाव में दो प्रत्याशियों के होने से मुकाबला दिलचस्प नजर आ रहा है, लेकिन फखरुल की जीत की संभावना काफी मजबूत मानी जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह संसद में BNP का मजबूत बहुमत है। बांग्लादेश में राष्ट्रपति का चुनाव जनता सीधे वोट देकर नहीं करती। यहां संसद सदस्य राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। फरवरी में हुए आम चुनाव में BNP को दो-तिहाई बहुमत हासिल हुआ था। ऐसे में संसद में पार्टी की संख्या को देखते हुए फखरुल का राष्ट्रपति बनना लगभग तय माना जा रहा है।
क्यों खास है इस बार का राष्ट्रपति चुनाव?
बांग्लादेश में राष्ट्रपति पद का चुनाव हमेशा राजनीतिक मुकाबले का केंद्र नहीं रहा है। देश में अब तक 12 राष्ट्रपति चुनाव हो चुके हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर चुनाव निर्विरोध रहे। कई मौकों पर विपक्ष ने उम्मीदवार ही नहीं उतारा, जिसके कारण सांसदों को वास्तविक चुनावी मुकाबले का सामना नहीं करना पड़ा।
1991 में आखिरी बार राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला हुआ था। उसके बाद लंबे समय तक राष्ट्रपति चुनाव में किसी तरह की प्रतिस्पर्धा देखने को नहीं मिली। इस लिहाज से 2026 का चुनाव खास है, क्योंकि करीब 35 साल बाद सांसदों के सामने दो नाम होंगे और उन्हें अपने मत का इस्तेमाल करना पड़ेगा।
बांग्लादेश में राष्ट्रपति पद की संवैधानिक व्यवस्था समय के साथ कई बार बदली है। संविधान लागू होने के बाद 1974 में पहला राष्ट्रपति चुनाव हुआ था। उस समय संसद के सदस्यों ने मतदान करके मोहम्मद मोहम्मदुल्लाह को राष्ट्रपति चुना था।
इसके बाद 1975 में संविधान में बदलाव किया गया और राष्ट्रपति के चुनाव को प्रत्यक्ष मतदान से जोड़ दिया गया। इस व्यवस्था के तहत 1978, 1981 और 1986 में जनता ने सीधे राष्ट्रपति का चुनाव किया। हालांकि बाद में देश की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था में फिर परिवर्तन हुआ।
1991 में संसदीय शासन व्यवस्था की वापसी के साथ राष्ट्रपति का चुनाव दोबारा संसद सदस्यों के जरिए होने लगा। इसी वर्ष दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला भी हुआ था। इसके बाद कई दशकों तक राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव निर्विरोध होते रहे।
फखरुल के सामने क्यों मजबूत है जीत की संभावना?
BNP के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर का नाम राष्ट्रपति पद के लिए सामने आने के बाद पार्टी ने उनके नामांकन की प्रक्रिया भी पूरी कर दी। गुरुवार को उनका नामांकन पत्र चुनाव आयोग में जमा किया गया।
फखरुल के पक्ष में सबसे बड़ा राजनीतिक समीकरण संसद में BNP की ताकत है। फरवरी में हुए आम चुनाव में पार्टी ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। चूंकि राष्ट्रपति का चुनाव सांसद करते हैं, इसलिए मौजूदा संख्या बल फखरुल के पक्ष में जाता है।
हालांकि दूसरी ओर से भी विपक्ष ने उम्मीदवार उतारकर चुनाव को औपचारिकता तक सीमित नहीं रहने देने का संकेत दिया है। जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद को अपना उम्मीदवार बनाया है।
फखरुल ने राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी स्वीकार करने के साथ BNP में अपने महत्वपूर्ण पदों से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने पार्टी महासचिव के पद के साथ-साथ BNP की स्थायी समिति की सदस्यता भी छोड़ दी। पार्टी में लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद अब उनका राजनीतिक सफर एक नए संवैधानिक पद की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ फखरुल का सफर
मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर का राजनीतिक जीवन काफी पुराना है। राजनीति में आने से कई वर्ष पहले ही उन्होंने छात्र आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी थी।
1960 में ढाका यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान वह छात्र राजनीति से जुड़े। उस समय उन्होंने ईस्ट पाकिस्तान स्टूडेंट्स यूनियन के साथ काम किया। 1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान के खिलाफ जब पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर छात्र और जन आंदोलन हुआ, तब फखरुल भी आंदोलन में सक्रिय रहे।
उस दौर में वह ढाका यूनिवर्सिटी की छात्र इकाई के अध्यक्ष पद पर थे। राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। हालांकि इसके बाद उन्होंने तत्काल पूर्णकालिक राजनीति का रास्ता नहीं चुना।
पढ़ाई पूरी करने के बाद फखरुल ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना करियर बनाया। 1972 में वह ढाका कॉलेज में लेक्चरर बने। इसके बाद उन्होंने सरकारी कॉलेजों में भी अध्यापन किया। यानी सक्रिय छात्र राजनीति के बाद उन्होंने कई वर्षों तक सरकारी शिक्षक के रूप में काम किया।
1986 में सरकारी नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति में आए
फखरुल ने 1986 में सरकारी नौकरी छोड़ दी और इसके बाद उनका राजनीतिक सफर नए चरण में पहुंचा। दो साल बाद 1988 में उन्होंने ठाकुरगांव नगरपालिका के चेयरमैन का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा और जीत हासिल की।
यही जीत उनके लिए स्थानीय राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ने का आधार बनी। 1990 के दशक की शुरुआत में वह BNP में शामिल हुए। 1992 में उन्हें BNP की ठाकुरगांव जिला इकाई का अध्यक्ष बनाया गया।
इसके बाद पार्टी के भीतर उनकी भूमिका लगातार बढ़ती गई। 2001 के आम चुनाव में उन्होंने ठाकुरगांव-1 सीट से BNP के टिकट पर चुनाव लड़ा और सांसद बने। BNP सरकार में उन्हें पहले कृषि राज्य मंत्री बनाया गया। बाद में उन्होंने नागरिक उड्डयन और पर्यटन राज्य मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली।
पार्टी संगठन में भी फखरुल का कद बढ़ता रहा। 2011 में वह BNP के कार्यवाहक महासचिव बने। इसके बाद 2016 में उन्हें पार्टी का आधिकारिक महासचिव नियुक्त किया गया। लगभग एक दशक तक उन्होंने इस महत्वपूर्ण पद को संभाला।
अब राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने के बाद उन्होंने पार्टी के दोनों प्रमुख पदों से दूरी बना ली है।
ओली अहमद कौन हैं, जिन्हें जमात गठबंधन ने मैदान में उतारा?
फखरुल के सामने उम्मीदवार बनाए गए कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद भी बांग्लादेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय चेहरा हैं। उनका राजनीतिक और सैन्य दोनों तरह का अनुभव रहा है।
ओली अहमद ने 1971 के बांग्लादेश लिबरेशन वॉर में हिस्सा लिया था। सैन्य सेवा से जुड़े रहने के बाद 1980 में उन्होंने सेना से रिटायरमेंट लिया और सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया।
वह BNP के शुरुआती दौर से जुड़े नेताओं में शामिल रहे और पार्टी प्रमुख खालिदा जिया के करीबी सहयोगियों में भी उनकी गिनती होती थी। 1991 में जब BNP की सरकार बनी, तब ओली अहमद को संचार मंत्री की जिम्मेदारी दी गई।
सरकार में रहते हुए उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। इनमें युवा विकास के अलावा बिजली और ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी शामिल रहे। वह कई बार संसद सदस्य चुने जा चुके हैं।
हालांकि समय के साथ उनके और BNP नेतृत्व के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ती गई। 2006 में उन्होंने BNP से अलग होकर लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी यानी LDP का गठन किया। इसके बाद वह पार्टी के अध्यक्ष बने और बांग्लादेश की राजनीति में अलग राजनीतिक धारा का प्रतिनिधित्व करते रहे।
20 अगस्त को होगा फैसला
अब राष्ट्रपति चुनाव के लिए 20 अगस्त की तारीख तय है। एक तरफ संसद में भारी बहुमत रखने वाली BNP के उम्मीदवार मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर हैं, तो दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन की तरफ से ओली अहमद चुनाव लड़ रहे हैं।
संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक आम जनता इस चुनाव में सीधे मतदान नहीं करेगी। राष्ट्रपति का चुनाव संसद सदस्य करेंगे। यही वजह है कि मौजूदा संसदीय संख्या को देखते हुए फखरुल को स्पष्ट बढ़त हासिल है।
फिर भी 35 साल बाद राष्ट्रपति पद पर दो उम्मीदवारों का आमने-सामने होना बांग्लादेश की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। लंबे समय से निर्विरोध होते रहे राष्ट्रपति चुनाव में इस बार विपक्ष की मौजूदगी ने राजनीतिक मुकाबले का स्वरूप बदल दिया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि 20 अगस्त को सांसद किस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करते हैं और क्या फखरुल अपेक्षित जीत के साथ देश के अगले राष्ट्रपति बनते हैं।




